सूरत-ए-हाल. नदी जगाने के नाम पर लूट ली जाती है लाखाें की मछलियां

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मछली पालक बने रहते हैं बेबस वैशाखी पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है. जिले के कुछ हिस्सों में इस पर्व में चूल्हा नहीं जलाने की परंपरा है. दूसरी तरफ इस पर्व के आने से नदी जगाने की परंपरा भी होती रही है. पिछले कुछ वर्षों से नदी जगाने के नाम पर […]

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मछली पालक बने रहते हैं बेबस

वैशाखी पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है. जिले के कुछ हिस्सों में इस पर्व में चूल्हा नहीं जलाने की परंपरा है. दूसरी तरफ इस पर्व के आने से नदी जगाने की परंपरा भी होती रही है. पिछले कुछ वर्षों से नदी जगाने के नाम पर तालाब व नदियों में जिस तरह मछली लूटी जाती है, वह चकित करने वाली है.
कटिहार : जिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में वैशाखी पर्व की तैयारी शुरू हो रही है. नयी रबी फसल आने व हिंदी के नववर्ष शुरू होने के बाद से ही लोग इस पर्व की तैयारी में जुट जाते हैं. वैशाखी पर्व को ग्रामीण क्षेत्रों में सतवानी भी कहा जाता है. अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से इस पर्व को मनाया जाता है.
जिले के कुछ हिस्सों में इस पर्व में चूल्हा नहीं जलाने की परंपरा है. दूसरी तरफ इस पर्व के आने से नदी जगाने की परंपरा भी होती रही है. पिछले कुछ वर्षों से नदी जगाने के नाम पर तालाब व नदियों में जिस तरह मछली लूटी जाती है, वह चकित करने वाली है. एक ओर सरकार मछली पालन को बढ़ाने के लिए तरह-तरह की योजनाएं शुरू की है.
वहीं दूसरी तरफ साल भर मछली पालने के बाद नदी व तालाब से गांव के लोग सामूहिक रूप से नदी जगाने के नाम पर मछली लूट लेते हैं. मछली पालक दिनदहाड़े नदी जगाने के नाम पर मछली लूट देख कर बेबस व लाचार हो जाते हैं, जबकि प्रशासन इस मामले में मूकदर्शक बना रहता है.
प्रशासन बना रहता है मूकदर्शक
इस मामले में जिला मत्स्य विभाग व प्रशासन की भूमिका भी जीरो रहती है. मछली पालकों ने बताया कि पिछले कई वर्षों से परंपरा के नाम पर नदी व तालाब से लोग मछली को लूट लेते हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन पूरी तरह मूकदर्शक बना रहता है. मछली पालकों की माने तो प्रशासन इस मामले में अगर सख्त रवैया अख्तियार करे,
तो परंपरा के नाम पर होने वाली मछली लूट पर रोक लग सकती है. मछली पालक यह भी कहते है कि दुर्गापूजा, होली, मुहर्रम, ईद आदि कई त्यौहारों पर समाज के लोगों के साथ प्रशासन शांति समिति की बैठक करता है, जबकि परंपरा की आड़ में लाखों करोड़ों की मछली लूट ली जाती है.
इस मामले में इसी तरह की बैठक कर प्रशासनिक स्तर से इसका समाधान निकालने का अब तक कोई प्रयास नहीं किया गया है. नदी जगाने के नाम पर न सिर्फ मछली लूटी जाती है, बल्कि मछली लूटने के क्रम में मखानों को भी व्यापक नुकसान पहुंचाया जाता है. वैशाखी पर्व का नाम सुनते ही खासकर मछली पालक व मखाना व्यवसायी दहशत में रहते हैं.
जब तक यह पर्व सम्पन्न नहीं हो जाता है, तब तक उनके भीतर डर समाया रहता है. हालांकि नदी जगाने के नाम पर हर साल तालाब व नदी से लाखों रुपये की मछली लूट ली जाती है. अगर यही स्थिति रही, तो लोग मछली पालन करने से परहेज करने लगेंगे. प्रशासनिक उदासीनता को मुख्य कारण बताते हुए मछली पालकों ने कहा कि प्रशासन की सक्रियता से इसे रोका जा सकता है.
परंपरा की आड़ में लूट की छूट
खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के तालाब व नदियों में मछली पालन करने वाले लोग वैशाखी पर्व आने से परेशान रहते हैं. कब सामूहिक रूप से लोग उनके तालाब व नदी में जबरन धावा बोल कर मछली लूट लेंगे यह कहा नहीं जा सकता है. मछली पालकों को यही चिंता खाये जा रही है. कई मछली पालकों की माने तो सालभर मछली पालने के बाद जब उनकी मछली लूट ली जाती है,
तब फिर साहस नहीं होता कि फिर से मछली पालन करें. मछली पालक रंजीत शर्मा, महेन्द्र निषाद आदि ने बताया कि वैशाखी पर्व पर नदी जगाने के नाम पर झुंड के झुंड लोग आते हैं और जबरन तालाब व नदी में घुसकर मछली लूटकर चलते बनते हैं.
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