लोकसभा चुनाव : बयानों के शोर में गुम हो गये स्थानीय मुद्दे

Updated at : 18 Apr 2019 6:42 AM (IST)
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लोकसभा चुनाव : बयानों के शोर में गुम हो गये स्थानीय मुद्दे

सूरज गुप्ता, कटिहार : लोकसभा चुनाव को लेकर कटिहार संसदीय क्षेत्र में प्रचार अभियान का शोर मंगलवार को थम गया. नामांकन प्रक्रिया के बाद से ही चुनाव प्रचार को लेकर बड़े-बड़े नेताओं का आना शुरू हो गया. बयानबाजी भी खूब हुआ. खासकर महागठबंधन एवं एनडीए के स्टार प्रचारक ने कटिहार संसदीय क्षेत्र के विभिन्न इलाके […]

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सूरज गुप्ता, कटिहार : लोकसभा चुनाव को लेकर कटिहार संसदीय क्षेत्र में प्रचार अभियान का शोर मंगलवार को थम गया. नामांकन प्रक्रिया के बाद से ही चुनाव प्रचार को लेकर बड़े-बड़े नेताओं का आना शुरू हो गया. बयानबाजी भी खूब हुआ. खासकर महागठबंधन एवं एनडीए के स्टार प्रचारक ने कटिहार संसदीय क्षेत्र के विभिन्न इलाके में जाकर बड़े-बड़े वादे किए.

वोटरों को लुभाने की कोशिश की. स्थानीय प्रत्याशियों की ओर से भी कई तरह की बातें कही गयी. प्रचार के शोर में स्थानीय मुद्दे पूरी तरह गायब रहा. कटिहार जिला तो कभी औद्योगिक नगरी के रूप में जाना जाता था.
पर अब औद्योगिक नगरी की जगह यहां वीरान पड़ा है. इसी तरह कई समस्याओं से भी यह जिला हर साल जूझता रहा है. पर इस दिशा में किसी स्टार प्रचारक ने उसे मुद्दा नहीं बनाया. स्थानीय प्रत्याशियों के लिए एजेंडा नहीं बना. बयानवीरों के बयानों से स्थानीय मुद्दा पूरी तरह ओझल रही.
केस स्टडी-01
नहीं बना 300 बेड का अस्पताल : सदर अस्पताल को जिला अस्पताल का दर्जा प्राप्त है. जिला अस्पताल का दर्जा प्राप्त होने की वजह से ही यहां 300 बेड के अस्पताल बनाने की स्वीकृति मिली हुयी है. फिलहाल 100 बेड से काम चलाया जा रहा है. करीब तीन वर्ष पूर्व 300 बेड का अस्पताल बनाने की स्वीकृति मिली थी. पर अब तक इस दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हुयी है.
मीडिया में यह मामला हमेशा उठता रहा है. विधानसभा के सदन में भी यह मामला उठाया गया है. उसके बावजूद स्थिति अभी जस की तस बनी हुयी है. 300 बेड का अस्पताल नहीं होने की वजह से मरीजों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. मरीज को फर्श पर रख कर का इलाज किया जाता है. बेड नहीं रहने पर बरामदे पर भी बेड रखकर मरीजों का उपचार कर दिया जाता है.
इससे कई तरह के संक्रमण फैलने की संभावना बनी रहती है. पर स्थानीय स्वास्थ्य प्रशासन को इसकी चिंता नहीं है. ऐसा नहीं है कि सदर अस्पताल परिसर में हाल के वर्षों में भवन नहीं बना है. कई नये भवन का निर्माण भी हुआ. पर 300 बेड अस्पताल के लिए कोई ठोस पहल नहीं हुयी.
केस स्टडी-02
60 विद्यालयों में शिक्षक नहीं : जिले में ऐसे 108 उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय है. इन विद्यालयों में करीब 114 शिक्षक पदस्थापित है. ऐसे विद्यालयों में से करीब 60 विद्यालय में एक भी शिक्षक नहीं है. इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय में बच्चे को किस तरह की शिक्षा दी जा रही होगी.
इसी तरह शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे करीब 290 से अधिक प्राथमिक विद्यालय है. जिनके पास अपना कोई भवन नहीं है. ऐसे विद्यालय या तो किसी हवा महल में चल रहा है. या फिर झोपड़ी में संचालित किया जा रहा है. भगवान भरोसे ही ऐसे बच्चों की शिक्षा है.
इन विद्यालयों में अधिकांश बच्चे गरीब मजदूर वर्ग के ही पढ़ते है. शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के बाद भी इतने बड़े तादाद में विद्यालय को अपना भवन नहीं होना कानून का उल्लंघन है. बाढ़ व बारिश के समय बच्चों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है.
ऐसे विद्यालय को भवन उपलब्ध कराने के लिये सरकार के पास कोई स्पष्ट नीति भी नहीं है. उच्च शिक्षा की स्थिति भी कमोवेश ऐसी ही है. चुनाव में स्थानीय शिक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर कोई मुद्दा नहीं बना.
केस स्टडी-03
बाढ़ व कटाव से विस्थापन की समस्या : कमोवेश कटिहार जिले के लोग हर साल बाढ़ व कटाव से जूझता है. वर्ष 2016 व 2017 में भी वर्ष 1987 में आयी बाढ़ का रिकॉर्ड तोड़ते हुए भारी तबाही मचायी. जान-माल का व्यापक नुकसान हुआ है. आधारभूत संरचना सहित आम लोग प्रभावित हुए हैं.
जान माल का व्यापक नुकसान हुआ. यह अलग बात है कि वर्ष 2018 में बाढ़ नहीं आयी. लेकिन इसके पूर्व आयी बाढ़ से लोग अब तक नहीं उबर सका है. जानकारी के मुताबिक पिछले दो वर्ष मे आयी प्रलयंकारी बाढ़ से 500 करोड़ से भी अधिक सरकारी राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा है. बाढ़ व कटाव से हजारों की आबादी अभी विस्थापित है. पुनर्वास को लेकर कोई ठोस पहल सरकार की ओर से नहीं हो सकी.
तमाम तरह के नुकसान के बावजूद बाढ़ का स्थायी समाधान को लेकर अब तक कोई ठोस बार नहीं हुयी है. शिक्षाविद व पूर्व प्राचार्य डॉ राजेंद्र नाथ मंडल ने आक्रोश प्रकट करते हुए कहते है कि इस जिले में बाढ़ व कटाव एक गंभीर समस्या है. हजारों की आबादी विस्थापित है.
इसके स्थायी समाधान को लेकर कोई पहल नहीं हुयी है. लोकसभा चुनाव में भी यह मुद्दा नहीं बन सका, जो दुर्भाग्यपूर्ण है.
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