गंदगी व अतिक्रमण की चपेट में गांव के तालाब-पोखर

जलाशयों में गिर रहा नालियों का गंदा पानी, संक्रमित बीमारियों के फैलने की आशंका
जलाशयों में गिर रहा नालियों का गंदा पानी, संक्रमित बीमारियों के फैलने की आशंका तालाबों की बदहाली से स्वच्छता अभियान पर उठे सवाल दुर्गावती. स्वच्छता अभियान को लेकर स्थानीय प्रशासन कितना गंभीर है, इसका अंदाजा क्षेत्र के तालाबों में फैल रही गंदगी व बढ़ते अतिक्रमण को देखकर लगाया जा सकता है. स्वच्छता के नाम पर कई बार अभियान चलाये गये, लेकिन इनका असर जमीनी स्तर पर दिखायी नहीं देता है. गांवों के तालाबों की स्थिति देखकर यह सहज ही समझा जा सकता है कि शासन-प्रशासन व जनप्रतिनिधि कितने गंभीर हैं. तालाबों से कभी-कभी उठने वाली सड़ांध दुर्गंध से आसपास के लोगों को भारी परेशानी होती है, जबकि संक्रमित बीमारियों का भय भी बना रहता है. ग्रामीणों की मानें तो पूर्वकाल में जल संसाधनों के अभाव में लोग अपने दैनिक कार्य के लिये इन्हीं तालाबों के पानी का उपयोग करते थे, लेकिन आज ऐसे साफ तालाब-पोखर कम ही नजर आते हैं. स्थानीय प्रखंड क्षेत्र के खामीदौरा, भेरिया, महमुदगंज, कर्मनाशा, कुल्हड़िया, रोहुआ खुर्द समेत कई गांवों के तालाब व पोखरों की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है. ग्रामीण बताते हैं कि तालाबों व पोखरों में फैली गंदगी को सही मायनों में साफ करने की पहल कभी की ही नहीं गयी. पंचायत स्तर पर सफाई अभियान भले ही चलाये गये हों, लेकिन नतीजा यह रहा कि गंदगी जस की तस बनी रही व बढ़ते अतिक्रमण से तालाबों का क्षेत्रफल सिमटता चला गया. ग्रामीणों का कहना है कि पहले जब तालाबों की नीलामी नहीं होती थी, तब गांव के लोग मिलकर समय-समय पर साफ-सफाई करते थे. उस समय तालाबों के आसपास घनी आबादी नहीं थी व नालियों का गंदा पानी भी तालाबों में नहीं गिरता था. नालियों का पानी आहर-पइन के सहारे बाहर निकल जाता था, लेकिन आज आहर-पइन पट गये हैं व तालाबों के निकट घनी आबादी बस गयी है. देखरेख के अभाव में तालाबों की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है. ग्रामीण बताते हैं कि जब तालाबों की नीलामी शुरू हुई तो लगा कि अब तालाबों का सौंदर्यीकरण होगा व मनरेगा जैसी योजनाओं से जीर्णोद्धार किया जायेगा, लेकिन यह सपना साकार नहीं हो सका. हालत यह है कि तालाबों की मछलियां खाना तो दूर, पशुओं को भी उनका दूषित पानी पिलाने से लोग कतराते हैं. कूड़ा-कचरा फेंकने से भी हालात बदतर तालाबों के आसपास बसे घरों की जलनिकासी के लिए कहीं नालियां बनी ही नहीं हैं, तो कहीं पुरानी नालियां टूटकर ध्वस्त हो गयी हैं. ऐसे में नालियों का गंदा पानी तालाबों में गिराना सबसे आसान उपाय बन गया है. वहीं, तालाबों के किनारे बसे लोगों द्वारा अतिक्रमण व कूड़ा-कचरा फेंकने से भी हालात और बदतर हो गये हैं. सरकार द्वारा तालाबों की सफाई को लेकर निर्देश जारी हैं, लेकिन मछलियों से हजारों रुपये कमाने वाले लोग भी साफ-सफाई पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. इस संबंध में मछुआ समिति के सदस्य सूबेदार राम कहते हैं कि हम लोग अपनी ओर से तालाबों की साफ-सफाई करते रहते हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि आसपास नालियां नहीं बनी हैं. इससे घरों का गंदा पानी सीधे तालाबों में गिराया जा रहा है. क्या कहते हैं ग्रामीण –खामीदौरा गांव निवासी समशेर सिंह का कहना है कि सरकार की सात निश्चय व स्वच्छता अभियान इस मायने में फेल साबित हो रही है. तालाबों में घरों का गंदा पानी न गिरे, इस पर पंचायत का ध्यान नहीं है. जलकुंभी व गंदगी से तालाब मच्छरों का बसेरा बन गये हैं इससे बीमारियों का खतरा बढ़ गया है. –भेरिया गांव निवासी धनंजय सिंह बताते हैं कि कभी यह तालाब गांव की जीवनरेखा था. पूर्व में नालियां बनी थीं, लेकिन अब कुछ घरों का गंदा पानी इसी तालाब में गिरता है. तालाब का जीर्णोद्धार कब होगा, यह कोई नहीं बता सकता. बोलीं बीडीओ– इस संबंध में पूछे जाने पर प्रखंड विकास पदाधिकारी ऋचा मिश्रा ने बताया कि जानकारी लेकर ऐसे तालाबों को योजनाओं में शामिल किया जायेगा.
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