अधौरा में जल संकट : हजारों मवेशियों के साथ गंगा तट की ओर पलायन कर रहे पशुपालक

भीषण गर्मी व पानी के अभाव में चार माह के लिए अपना घर छोड़ने को मजबूर ग्रामीण
भीषण गर्मी व पानी के अभाव में चार माह के लिए अपना घर छोड़ने को मजबूर ग्रामीण नदियां व डैम सूखे, प्यास बुझाने के लिए यूपी के गाजीपुर व जमनिया जा रहे पशुपालक रामपुर. प्रखंड क्षेत्र के नक्सलाइट रोड बेलाव-भगवानपुर व सबार मुख्य सड़क पर इन दिनों पलायन का एक मार्मिक दृश्य देखने को मिल रहा है. अधौरा थाना क्षेत्र के दर्जनों गांवों के पशुपालक अपनी हजारों भैंसों के साथ अप्रैल के अंतिम सप्ताह में गंगा किनारे वाले इलाकों की ओर प्रस्थान कर गये हैं. ये पशुपालक सिंघी, मझिआंव, खजुरा व पसाई होते हुए पुसौली हाइवे पार कर सकलडीहा व सैयदराजा के रास्ते गाजीपुर (यूपी) के जमनिया स्थित गंगा तट पर चार माह के लिए डेरा डालेंगे. रविवार को प्रभात खबर प्रतिनिधि ने जब इन पशुपालकों से जानकारी ली, तो बभनी, रैता, विठोर, डुमरांव, सड़की, सुड़ा, बांधा, दुग्धा, आथन, बहेरा व शील सहित दर्जनों गांवों के पशुपालकों ने अपना दर्द साझा किया. मदन कुमार, शंकर यादव, शर्मा यादव व पलकधारी यादव सहित अन्य लोगों ने बताया कि अप्रैल शुरू होते ही अधौरा क्षेत्र में पानी के लिए हाहाकार मच जाता है. मनुष्यों के लिए तो जैसे-तैसे पानी का इंतजाम हो जाता है, लेकिन पशुओं के लिए जल का कोई स्रोत नहीं बचता. 25 दिनों की कठिन यात्रा, रास्तों में ही बसेरा पशुपालकों ने बताया कि वे विगत शुक्रवार को अपने गांवों से चले हैं व गाजीपुर पहुंचने में उन्हें 20 से 25 दिन लग जायेंगे. रास्ते में पड़ने वाले गांवों के बधारों, पेड़-बगीचों की छांव में भोजन बनाते व नदी के किनारे-किनारे भैंसों को चराते हुए वे अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं. बरसात शुरू होते ही ये सभी अपने गांवों की ओर वापस लौटेंगे. भैंस पालन ही इनकी जीविका का मुख्य साधन है, जिसे बचाने के लिए ये हर साल अपनों से दूर चार माह गंगा तट पर बिताते हैं. सरकारी योजनाओं की खुली पोल पशुपालकों ने बताया कि सरकार द्वारा वर्षा के पानी को रोकने के लिए जो छोटे-छोटे डैम व चेक डैम बनाये गये थे, वे भी गर्मी शुरू होते ही सूख गये हैं. जब सात निश्चय योजना के अंतर्गत ”नल-जल” के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने हंसते हुए जवाब दिया कि इसका लाभ जिसे मिला है वही जाने, हमारे पशुओं की प्यास बुझाने के लिए इसका कोई लाभ नहीं मिलता. गांवों में जो चापाकल हैं, उनका भी लेयर नीचे चला गया है. ऐसी स्थिति में अपने मवेशियों की जान बचाने के लिए पलायन ही एकमात्र रास्ता बच जाता है.
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