बगैर एग्रीमेंट के ही छह वर्षों से चल रहीं 20 दुकानें

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लापरवाही. नप की लापरवाही से लाखों के राजस्व की हानि आवंटन की शर्त को ताक पर रख कर चलायी जा रही हैं दुकानें भभुआ कार्यालय : सदर अस्पताल परिसर में सड़क के किनारे बनी 20 दुकानें विगत छह वर्षों से अवैध तरीके से चल रही है. सभी 20 दुकानों का एग्रीमेंट छह वर्ष पहले 2010 […]

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लापरवाही. नप की लापरवाही से लाखों के राजस्व की हानि
आवंटन की शर्त को ताक पर रख कर चलायी जा रही हैं दुकानें
भभुआ कार्यालय : सदर अस्पताल परिसर में सड़क के किनारे बनी 20 दुकानें विगत छह वर्षों से अवैध तरीके से चल रही है. सभी 20 दुकानों का एग्रीमेंट छह वर्ष पहले 2010 में ही समाप्त हो चुका है. बावजूद इसके दुकान आवंटन के शर्तों को ताक पर रख कर सभी दुकानें चल रही हैं और प्रतिवर्ष सरकार को लाखों रुपये के राजस्व का चुना नगर पर्षद की लापरवाही के कारण लग रहा है.
नगर पर्षद अपने आंतरिक संसाधन को बढ़ाने की बात तो रोज करता है और पैसे के अभाव का हवाला देकर नगरवासियों को आज भी कई सुविधाओं से वंचित रखे हुए है. लेकिन, नगर पर्षद अपने आंतरिक संसाधन व राजस्व को लेकर कितना गंभीर है, इसका अंदाजा सदर अस्पताल परिसर में शहर के मुख्य सड़क एकता चौक से पटेल चौक वाले रास्ते पर बनी 20 दुकानों को आवंटन के शर्तों को देखने के बाद साफ तौर पर झलक जाता है.
दरअसल, 2000 में सदर अस्पताल परिसर स्थित बनी 20 दुकानों को नगर पर्षद ने 10 वर्षों के लिए विभिन्न तरह के शर्तों के आधार पर आवंटित किया था. नगर पर्षद द्वारा आवंटन के शर्त पर जो दुकानदारों के साथ एग्रीमेंट है, उन शर्तों में से शायद ही किसी शर्त का अनुपालन हो रहा है. इसके बावजूद नगर पर्षद की इसकी कोई परवाह नहीं है. 2000 में नगर पर्षद ने एक दुकान के लिए 96 हजार रुपये के अग्रिम राशि पर 2010 तक के लिए 20 दुकानों को आवंटित किया था. आवंटन की समयसीमा 2010 में ही समाप्त हो गयी है.
आवंटन की समयसीमा समाप्त होने पर दुकानदार आवंटन के नवीनीकरण के लिए नगर पर्षद में आवेदन करने का प्रावधान था. उस समय एक दुकान का किराया 500 रुपये निर्धारित किया गया था, जिसमें ढाई सौ रुपये प्रत्येक माह किराया देना था और ढाई सौ रुपये अग्रिम जमा किये गये राशि में से काटी जानी थी. शर्त के मुताबिक जिसे दुकान आवंटित हुआ था वह किसी दूसरे को किराया पर नहीं दे सकता. प्रत्येक पांच वर्ष पर दुकान के किराये का बाजार दर के आधार पर बढ़ोतरी की जानी थी. 20 दुकानों में जो भी दवा की दुकानें होंगी, उन्हें 24 घंटा दुकान खुला रखना है. मासिक किराया हर माह के 10 तारीख तक जमा करना था. अन्यथा 35 रुपये जुर्माने का प्रावधान था. लगातार तीन माह तक किराया नहीं देने पर दुकान के आवंटन को रद्द करने का प्रावधान था. लेकिन, उक्त सभी शर्तों का खुला उल्लंघन करते हुए नप की लापरवाही के कारण अवैध तरीके से कब्जा जमाये दुकानदार सरकारी राजस्व को चूना लगा रहे हैं. एक तरफ जहां आवंटन की समय सीमा 2010 में समाप्त होने के बावजूद बगैर आवंटन के ही दुकानदार छह वर्षों से अवैध तरीके से दुकान चला रहे हैं.
दूसरी तरफ आवंटन के शर्तों को ठेंगा दिखाते हुए छह साल तक मासिक किराया तक नहीं जमा किया. शायद 2010 तक भी सभी दुकानों का किराया जमा हो चुका है. यह भी कह पाना मुश्किल है. हालात यह है कि अभी तक नगर पर्षद की लापरवाही के कारण लाखों रुपये राजस्व की हानि हो चुकी है, लेकिन विभाग इन सब से बेखबर राजस्व का रोनारोता ही हमेशा
दिखता है.
क्या कहते हैं िजलािधकारी
डीएम राजेश्वर प्रसाद सिंह ने कहा कि उक्त मामले में नगर पर्षद की लापरवाही साफ तौर पर दिख रही है. सरकार के राजस्व के नुकसान के लिए कौन जिम्मेवार हैं, इस पूरे मामले की जांच करायी जायेगी और जांच में दोषी पाये जानेवाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जायेगी.
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