मवेशियों के साथ मैदानी भागों में पहुंचे पशुपालक

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मवेशियों के साथ मैदानी भागों में पहुंचे पशुपालक फोटो :-1. दोपहर में पेड़ की छाया में बैठे पशु. पहाड़ पर पशुओं को नहीं मिला चारा व पीने का पानीमैदानी क्षेत्रों में भी बरकरार है जलसंकट मोहनिया (सदर). जैसे-जैसे गरमी का बढ़ रही है, वैसे-वैसे जलसंकट भी गहराने लगा है. अप्रैल माह के प्रथम सप्ताह में […]

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मवेशियों के साथ मैदानी भागों में पहुंचे पशुपालक फोटो :-1. दोपहर में पेड़ की छाया में बैठे पशु. पहाड़ पर पशुओं को नहीं मिला चारा व पीने का पानीमैदानी क्षेत्रों में भी बरकरार है जलसंकट मोहनिया (सदर). जैसे-जैसे गरमी का बढ़ रही है, वैसे-वैसे जलसंकट भी गहराने लगा है. अप्रैल माह के प्रथम सप्ताह में ही भीषण गरमी ने लोगों को घरों में दुबकने पर मजबूर कर दिया. कैमूर पहाड़ी पर स्थित अधौरा प्रखंड के जमुनीनार, सारोदाग व डिहगुल्ड़िया सहित कई गांवों के पशुपालक अपने मवेशियों के साथ पानी की तलाश में मैदानी क्षेत्रों में पलायन कर पहुंच चुके हैं. अपने कई दर्जन गायों व भैंसों के साथ करीब 70 किमी की दूरी तय कर ये पशुपालक दुर्गावती नदी के तट पर स्थित मोहनिया प्रखंड के अमरपुरा गांव के सिवान में पहुंच चुके हैं. पशुपालक दिनेश कुमार ने बताया कि गरमी के शुरू होते ही पहाड़ों पर पशुओं के चरने व पानी पिलाने की समस्या विकट रूप ले लेती है. पत्थरों के तपने से जहां पशुओं के चरने वाली घास जल जाती है, वहीं पानी की समस्या भी बढ़ जाती है. साथ ही भोजन व पानी की तलाश में भटकते हुए हिंसक जंगली पशु भी आसपास के क्षेत्रों में आ जाते हैं. इससे मवेशियों के साथ खुद के लिए भी काफी खतरा बढ़ जाता है. हम सभी पशुपालक अपने मवेशियों को लेकर गरमी शुरू होते ही उन मैदानी भागों में चले जाते हैं, जहां चरागाह के साथ पशुओं को पीने व नहाने के लिए नदी व बड़े तालाब हों. बरसात के शुरू होते ही पुन: अपने घरों के लिए वापसी शुरू कर देते हैं. उन्होंने बताया कि अमरपुरा के पास दुर्गावती नदी का पानी भी सूखने लगा है. अब हमलोग कुदरा नदी से लगे गांवों की तरफ चलें जायेंगे. इस मौसम में काफी कष्ट का सामना करना पड़ता है. मवेशियों को तेज धूप से बचाने के लिए पेड़ों की छांव में रख दोपहर बिताना पड़ता है. कभी-कभी तो गांव से इतना दूर निकल जाते हैं कि हम लोगों को भी नदी व तालाब के पानी से अपनी प्यास बुझानी पड़ती है. हालांकि, यदि तालाब, पोखर, नदी व नहरों में जल संरक्षण की व्यवस्था नहीं की गयी, तो पहाड़ी क्षेत्र क्या, मैदानी भागों में भी जल संकट गहराने लगा है. जहां तालाब, पोखर सूखने लगे हैं, वही पानी का लेयर नीचे भागने से चापाकलों ने भी जवाब देना शुरू कर दिया है. मई व जून की भीषण तपिश व गरमी अभी आनी बाकी है. ग्लोबल वार्निंग के बाद भी लोग सुधरने का नाम नहीं ले रहे है और अपने स्वार्थ के लिए तालाब, पोखरों को अतिक्रमण कर उन्हें समाप्त करने में लगे हुए हैं.

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