दक्षिणी गढ़ में दफन है सैकड़ों वर्ष पुराना इतिहास, नहीं हुआ उत्खनन

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 17 Jan 2020 2:06 AM

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जहानाबाद : स्टेट हाइवे-71 जहानाबाद-घोसी पथ पर जिला मुख्यालय से करीब चार किलोमीटर दूर सड़क के किनारे दक्षिणी गांव में प्राचीन गढ़ स्थित है. वर्तमान में इस गढ़ पर भीम राव आंबेडकर आवासीय बालिका विद्यालय स्थित है तथा पूरे गढ़ को विद्यालय की चहारदीवारी में घेर लिया गया है. करीब 52 एकड़ में फैला यह […]

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जहानाबाद : स्टेट हाइवे-71 जहानाबाद-घोसी पथ पर जिला मुख्यालय से करीब चार किलोमीटर दूर सड़क के किनारे दक्षिणी गांव में प्राचीन गढ़ स्थित है. वर्तमान में इस गढ़ पर भीम राव आंबेडकर आवासीय बालिका विद्यालय स्थित है तथा पूरे गढ़ को विद्यालय की चहारदीवारी में घेर लिया गया है.

करीब 52 एकड़ में फैला यह गढ़ अपने सीने में कई ऐतिहासिक तथ्यों को समेटे हुए है लेकिन न तो प्रशासन और न ही पुरातात्विक विभाग द्वारा इस गढ़ के इतिहास को जानने के लिए शोध और खुदाई की गयी है. गढ़ पर 1914 से निर्मित राम-लक्ष्मण-जानकी का मंदिर स्थित है जिसे ठाकुरबाड़ी के नाम से जाना जाता है.
वहीं गढ़ के उत्तर दिशा में किनारे पर तालाब तथा सूर्य मंदिर स्थित है. मंदिर में भगवान सूर्य के उत्तरायन और दक्षिणायन दोनों रूपों में मूर्ति स्थित है जहां पर ग्रामवासियों के द्वारा मंदिर को भव्य रूप प्रदान किया गया है. आस-पास के इलाकों में सूर्य मंदिर की काफी मान्यता है. लोक आस्था के महापर्व छठ मनाने के लिए साल में दो बार भारी भीड़ जुटती है.
गढ़ के दक्षिणी छोर पर सूर्य मंदिर में स्थापित हैं कई मूर्तियां
गढ़ के दक्षिणी छोर पर स्थित सूर्य मंदिर में उजला एवं चमकीला बालुकामयी पत्थर का दो फुट ऊंचा स्तंभ स्थित है जिसमें भगवान सूर्य का प्रतीक बना हुआ है. वहीं मंदिर में उत्तरायन सूर्य, दक्षिणायन सूर्य, भगवान विष्णु की मूर्तियां, नंदी स्थित है.
पुरातात्विक विशेषज्ञों के अनुसार बालुकामयी पत्थर के स्तंभ 1840 में ही प्राप्त हुआ था. गढ़ से प्राप्त कई अन्य मूर्तियां इलाके के विभिन्न गांवों के मंदिरों में भी स्थित हैं. पुरातात्विक शोधकर्ता सत्येंद्र कुमार पाठक के अनुसार अभी भी गढ़ की खुदाई कराने पर प्राचीन काल की बने दीवारों के अवशेष, बर्तन और मूर्तियां प्राप्त हो सकती हैं. इसके लिए गढ़ की वर्तमान ऊंचाई से करीब 10-15 फुट नीचे तक खुदाई करनी होगी.
आजादी के बाद गढ़ के ऐतिहासिकता की खोज के प्रति सरकार की उदासीनता के कारण दक्षिणी गढ़ उपेक्षित रह गया और साथ ही यहां का इतिहास भी अभी तक दफन है. यह गढ़ चेरो राजवंश से लेकर पंडूई राज तक के कब्जे में रह चुका है. प्राचीन इतिहास होने के बावजूद सरकारी लापरवाही का आलम यह है कि अब इस गढ़ पर जिला प्रशासन द्वारा आवासीय बालिका विद्यालय की स्थापना कर कई इमारतें खड़ी कर दी गयी हैं.
मौर्यकालीन गढ़ से निकली थीं प्राचीन मूर्तियां
इतिहास के जानकारों का मानना है कि दक्षिणी स्थित गढ़ मौर्यकालीन है. अंग्रेजों के समय में मगध की विभिन्न इलाकों में स्थित गढ़ों के अध्ययन एवं खुदाई का कार्य सर विलियम टेलर, बुकानन, हिमिलटन, ग्रियर्शन ने किया था और अनेक पुरातात्विक मूर्तियों और वस्तुओं को खोजकर मगध के गौरवशाली विरासत को प्रकाशित किया था.
1862 ई में कनिंगम द्वारा जहानाबाद और अरवल के पुरातात्विक स्थलों की खुदाई का काम प्रारंभ किया गया था जो 1901 तक चलता रहा. जहानाबाद के दक्षिणीगढ़ से खुदाई के क्रम में कई प्राचीन मूर्तियां निकली थीं जिनमें से कुछ पटना और गया के संग्रहालय में हैं. वहीं कुछ मूर्तियां दक्षिणीगढ़ के समीप स्थित सूर्यमंदिर में विराजमान हैं.
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