गिद्धौर में करोड़ों की स्वच्छता योजना दम तोड़ रही, डंपिंग यार्ड बदहाल और ई-रिक्शा जंग खा रहे

फोटो- अपशिष्ट प्रसंस्करण यूनिट की तस्वीर अव्यवस्था के अभाव में सड़क किनारे जंग खा सड़ रहा ई. रिक्शा | Prabhat Khabar Network
गिद्धौर प्रखंड में करोड़ों की लागत से शुरू की गई स्वच्छ भारत मिशन की ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन योजना बदहाली का शिकार है. कचरा उठाव की व्यवस्था ठप होने से ग्रामीण फिर खुले में कचरा फेंकने को मजबूर हैं.
Swachh Bharat Mission: गिद्धौर प्रखंड में स्वच्छ भारत मिशन के तहत लाखों रुपये की लागत से शुरू की गई ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन योजना आज बदहाली का शिकार हो गई है. पंचायतों में बनाए गए डंपिंग यार्ड, कचरा उठाव के लिए उपलब्ध कराए गए ई-रिक्शा और घर-घर वितरित डस्टबिन उपयोग के अभाव में बेकार पड़े हैं. स्वच्छता कर्मियों को कई महीनों से मानदेय नहीं मिलने के कारण योजना पूरी तरह ठप हो चुकी है, जिससे सरकार की महत्वाकांक्षी योजना पर सवाल खड़े हो गए हैं.
लाखों रुपये खर्च कर बनाई गई थी व्यवस्था
राज्य सरकार ने मनरेगा एवं 15वीं वित्त योजना के तहत लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान फेज-02 के अंतर्गत पंचायत स्तर पर ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाइयों का निर्माण कराया था. योजना के तहत डंपिंग यार्ड, कचरा संग्रहण के लिए ठेला रिक्शा और बैटरी चालित ई-रिक्शा उपलब्ध कराए गए. साथ ही प्रत्येक परिवार को गीले और सूखे कचरे के लिए हरे और नीले रंग का डस्टबिन भी दिया गया था.
कुछ महीनों बाद ही ठप पड़ गई योजना
Swachh Bharat Mission: ग्रामीणों के अनुसार शुरुआती दिनों में योजना का संचालन ठीक ढंग से हुआ, लेकिन कुछ महीनों बाद स्वच्छता कर्मियों को मानदेय मिलना बंद हो गया. इसके बाद घर-घर कचरा संग्रहण की व्यवस्था पूरी तरह बंद हो गई. अब डंपिंग यार्ड बदहाल हैं और ई-रिक्शा रखरखाव के अभाव में जंग खा रहे हैं.
ग्रामीणों ने बताई जमीनी हकीकत
ग्रामीण अरुण साव, रोहित यादव, अरुण रावत, रंजीत यादव, दरोगी पासवान, बेनी यादव, मिथिलेश यदुवंशी, सचिन कुमार और सुमन कुमार ने बताया कि पंचायतों में वितरित डस्टबिन और कचरा उठाव की व्यवस्था अब पूरी तरह समाप्त हो चुकी है. उनका कहना है कि महीनों से कोई स्वच्छता कर्मी कचरा लेने नहीं आता, जिससे लोग फिर खुले में कचरा फेंकने को मजबूर हैं.
आठ पंचायतों में लागू थी योजना
प्रखंड के पूर्वी गुगुलडीह, कुंधुर, कोल्हुआ और मौरा पंचायत में 15वीं वित्त योजना से तथा पतसंडा, सेवा, गंगरा और रतनपुर पंचायत में मनरेगा के तहत अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाइयों का निर्माण कराया गया था. योजना के अनुसार स्वच्छता कर्मियों को 3000 रुपये तथा सुपरवाइजर को 7500 रुपये मानदेय दिया जाना था. साथ ही प्रत्येक परिवार से 30 रुपये तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठानों से 90 रुपये मासिक शुल्क लेकर व्यवस्था को सुचारू रखना था.
अधिकारियों की उदासीनता पर उठे सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि जिला स्तर पर कई बार स्वच्छता व्यवस्था को सक्रिय रखने के निर्देश दिए गए, लेकिन स्थानीय स्तर पर किसी ने गंभीरता नहीं दिखाई. परिणामस्वरूप करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद योजना धरातल पर पूरी तरह विफल हो गई है.
क्या कहते हैं अधिकारी
उप विकास आयुक्त सुभाष चंद्र मंडल ने बताया कि पूरे मामले की एक सप्ताह के भीतर जांच कर आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी.जिलाधिकारी नवीन कुमार ने भी कहा कि योजना में अनियमितता की जांच कर दोषियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी.
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लेखक के बारे में
By कुमार सौरभ
कुमार सौरभ प्रिंट माध्यम में 15 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. गिद्धौर (जमुई) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक गतिविधि, खेल, इतिहास और राजनीतिक गतिविधियों की खबरों में रुचि रखते हैं.
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