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आध्यात्मिकता व पौराणिकता के साथ ही छठ पर्व का है सामाजिक व प्राकृतिक महत्व

Updated at : 25 Oct 2025 10:41 PM (IST)
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आध्यात्मिकता व पौराणिकता के साथ ही छठ पर्व का है सामाजिक व प्राकृतिक महत्व

एक मात्र प्रत्यक्ष देव भगवान भास्कर की आराधना व उपासना का महापर्व है छठ

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विनय कुमार मिश्र,

सोनो

एक मात्र प्रत्यक्ष देव भगवान भास्कर के आराधना का महापर्व छठ शनिवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया. रविवार को खरना के साथ ही सोमवार की शाम अस्ताचलगामी और मंगलवार की सुबह उदीयमान भगवान सूर्य को अर्घ देकर उनकी पूजा आराधना की तैयारी की जा रही है. सूर्योपासना का यह लोकपर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला आस्था का महापर्व है जो इस क्षेत्र की संस्कृति से जुडा हुआ है और वैदिक काल से चला आ रहा है. सूर्य भगवान की आराधना व उपासना के इस महापर्व का आध्यात्मिक, पौराणिक, सामाजिक व प्राकृतिक महत्व है. चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में 36 घंटे निर्जला व्रत रख सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की जाती है. बिहार की संस्कृति, परंपरा और आस्था का जिक्र होते ही सबसे पहले जिस पर्व का स्मरण होता है, वह है छठ पूजा. यह सिर्फ़ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवन का दर्शन, पर्यावरण से जुड़ाव और सामाजिक एकता का प्रतीक है. यही कारण है कि छठ पूजा को बिहार की आत्मा कहा जाता है.

माता सीता ने पहली बार मुंगेर में किया था छठ पर्व

छठ पूजन को लेकर सरस्वती अर्जुन एकलव्य महाविद्यालय जमुई में इतिहास के सहायक प्राध्यापक डॉ सुबोध कुमार गुप्ता बताते है कि इस त्योहार को लेकर कुछ मान्यताएं हैं, जो हिंदू महाकाव्यों से जुड़ी हैं. रामायण व महाभारत दो महाकाव्य हैं जो छठ पूजा से जुड़े हैं. ऐसा माना जाता है कि छठ पूजा की शुरुआत भगवान राम से जुड़ी है. ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान राम अयोध्या लौटे तो उन्होंने और उनकी पत्नी सीता ने सूर्य देव के सम्मान में व्रत रखा और उसे डूबते व उगते सूर्य की आराधना के साथ ही तोड़ा. पौराणिक कथाओं की मानें तो माता सीता ने पहली बार मुंगेर (बिहार) में छठ पर्व किया था. इसी स्थान पर माता सीता को समर्पित सीता चरण (सीताचरण मंदिर) भी है. महाभारत में सूर्य देव और कुंती की संतान कर्ण के बारे में कहा जाता है कि कर्ण आमतौर पर पानी में खड़े होकर सूर्यदेव की आराधना करते थे. वहीं द्रौपदी और पांडवों के द्वारा भी अपना राज्य वापस पाने के लिए इसी तरह की पूजा की चर्चा कहीं कहीं मिलती है. इसके अलावा छठी मैया की पूजा से जुड़ी एक कथा राजा प्रियंवद की भी है, जिन्होंने सबसे पहले छठी मैया की पूजा की थी. श्री गुप्ता ने कहा कि छठ पूजा और व्रत परिवार की खुशहाली, स्वास्थ्य और संपन्नता के लिए रखा जाता है. चार दिन के इस व्रत पूजन के कुछ नियम बेहद कठिन होते हैं. सनातन धर्म में छठ पूजा का विशेष महत्व माना गया है.

महापर्व में मिट जाती हैं सामाजिक विषमताएं

वहीं चुरहेत निवासी इतिहास के जानकर शिक्षाविद कामदेव सिंह बताते है कि छठ लोक आस्था के साथ साथ पर्यावरण संतुलन व प्रकृति से जुड़ाव का भी पर्व है. यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष चतुर्थी से शुरू होकर सप्तमी तक पूरे चार दिनों तक श्रद्धा व समर्पण से मनाया जाता है. यह पर्व सादगी व स्वच्छता के साथ-साथ सामाजिक समरसता की भी सीख देता है.वे कहते हैं कि रामायण काल में माता सीता और महाभारत काल में पांचो भाई पांडव सहित द्रोपदी द्वारा छठ व्रत किये जाने की चर्चा पुराणों में की गयी है. यह महापर्व बिहार झारखंड और हिंदी पट्टी राज्यों में विशेष महत्व रखता है. यह पर्व सूर्य उपासना से संबंधित है और समस्त पारितंत्र के लिए सूर्य अहम माने जाते हैं. सूर्य साक्षात दृष्टिगोचर होने वाले देवता हैं, जिनमें असीम प्रकाश पुंज भी है. सूर्य के प्रकाश से ही समस्त जैव मंडल का अस्तित्व टिका हुआ है. छठ जैसे पारंपरिक पर्व में हम तालाब नदियों व अन्य जल स्रोतों की सफाई करते हैं सरोवरों और नदियों से मानव जीवन का गहरा रिश्ता रहा है. जल संरक्षण और प्राकृतिक स्थान की सुरक्षा से इस पर्व का संबंध रहा है. इसमें सामाजिक विषमताएं मिट जाती हैं समाज का संपन्न वर्ग हो या विपणन सभी लोग समान रूप से अपने सर पर छठ कि डलिया लेकर घाटों की ओर बढ़ते देखे जाते हैं. यह पर्व वैचारिक शुद्धता भी प्रदान करता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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