पंचर बनाने वाले सरफराज ने अपनी कमाई से बनवाई 15 लाख की पुलिया, दादी के जनाजे की घटना बनी प्रेरणा

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तैयार पुल का उद्घाटन करते हुए विधायक अख्तरुल इमाम

तैयार पुल का उद्घाटन करते हुए विधायक अख्तरुल इमाम

Jamui News: जमुई के झाझा प्रखंड के सरफराज ने अपनी मेहनत की कमाई से गांव के लिए 15 लाख की पुलिया बनवाई है. अपनी दादी के जनाजे के समय नाला पार करने में हुई परेशानी से प्रेरित होकर, उन्होंने 6 साल तक पैसे बचाए. यह पुलिया अब गांव वालों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही है.

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झाझा(जमुई) से ऋतांबर सिंह की रिपोर्ट

Jamui News: क्या कोई ऐसा इंसान, जिसके पास खुद रहने और खाने की पक्की व्यवस्था न हो, अपने गांव के लिए 15 लाख रुपये की पुलिया बनवा सकता है? जमुई जिले के झाझा प्रखंड के घोरिकवा गांव के सरफराज ने यह असंभव लगने वाला काम सच कर दिखाया. सड़क किनारे पंचर बनाकर दो जून की रोटी कमाने वाले इस युवक ने छह साल तक एक-एक पैसा बचाया और गांव लौटकर अपने खर्च से 35 फीट लंबी पुलिया बनवा दी. इस पुलिया की शुरुआत किसी सरकारी योजना से नहीं, बल्कि एक ऐसी घटना से हुई जिसने सरफराज की पूरी जिंदगी बदल दी.

दादी के जनाजे के सामने लिया गया एक संकल्प, जो छह साल बाद पूरा हुआ

सरफराज की कहानी वर्ष 2019 की एक बरसाती दोपहर से शुरू होती है.

तेज बारिश के दौरान उनकी दादी का निधन हो गया था. परिवार के लोग जनाजा लेकर नाले तक पहुंचे, लेकिन पानी इतना अधिक था कि उसे पार करना संभव नहीं था. मजबूरी में दादी के शव को करीब चार घंटे तक नाले के किनारे इंतजार करना पड़ा. बारिश कम होने के बाद किसी तरह जनाजा पार कराया गया.

सरफराज बताते हैं कि उसी दिन उन्होंने मन में ठान लिया कि गांव में फिर कभी किसी परिवार को ऐसी पीड़ा नहीं झेलनी पड़ेगी. उन्होंने तय किया कि चाहे जितना समय लगे, इस नाले पर पुलिया जरूर बनेगी.

पंचर की दुकान से शुरू हुई पुलिया बनाने की कहानी

संकल्प लेने के बाद सरफराज गांव छोड़कर महाराष्ट्र के पुणे चले गए. वहां उन्होंने सड़क किनारे बैठकर पंचर बनाने का काम शुरू किया.

दिनभर मेहनत करते और कमाई का हर संभव हिस्सा बचाते रहे. छह वर्षों तक उन्होंने अपनी जरूरतों को सीमित रखा. जब पर्याप्त राशि इकट्ठी हुई तो इस वर्ष गांव लौटे और अपने निजी खर्च से पुलिया का निर्माण शुरू करा दिया.

जिस व्यक्ति के लिए रोज की कमाई से परिवार चलाना चुनौती थी, उसी ने गांव के लिए लाखों रुपये खर्च कर मिसाल कायम कर दी.

Jamui News: 35 फीट लंबी पुलिया से बदली गांव की तस्वीर

सरफराज ने लगभग 12 से 15 लाख रुपये की लागत से 35 फीट लंबी और 14 फीट चौड़ी पुलिया का निर्माण कराया है. पुलिया के दोनों ओर 25-25 फीट लंबी सुरक्षा दीवार भी बनाई गई है.

शनिवार को एआईएमआईएम के बिहार प्रदेश अध्यक्ष एवं विधायक अख्तरुल इमाम ने पुलिया का उद्घाटन किया.

अब बरसात के दिनों में ग्रामीणों को नाला पार करने के लिए जान जोखिम में नहीं डालनी पड़ेगी. खासकर अंतिम यात्रा, बीमार लोगों की आवाजाही और दैनिक आवागमन पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो जाएगा.

सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए, लेकिन समाधान नहीं मिला

सरफराज का कहना है कि उन्होंने पुलिया निर्माण के लिए पंचायत से लेकर सांसद तक कई बार गुहार लगाई.

उन्हें उम्मीद थी कि प्रशासन या जनप्रतिनिधि इस समस्या का समाधान करेंगे, लेकिन कोई ठोस पहल नहीं हुई. जब उन्होंने खुद पुलिया बनवाने का निर्णय लिया तो स्थानीय स्तर पर विरोध और धमकियों का भी सामना करना पड़ा.

लोगों ने उन्हें हतोत्साहित किया, लेकिन दादी से किया गया वादा उनके लिए किसी भी मुश्किल से बड़ा था.

यह घटना ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करती है. यदि समय पर पुलिया बन जाती, तो शायद एक आम नागरिक को अपनी जीवनभर की कमाई खर्च नहीं करनी पड़ती.

अब गांव वालों के लिए सरफराज सिर्फ पंचर बनाने वाले नहीं रहे

घोरिकवा गांव के ग्रामीण एहसान, गुड्डू और शाहिद बताते हैं कि सरफराज के पास खुद रहने और खाने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. इसके बावजूद उन्होंने गांव के लोगों के लिए इतना बड़ा काम कर दिया.

गांव वालों का कहना है कि बरसात में सबसे ज्यादा परेशानी इसी नाले के कारण होती थी. अब पुलिया बनने से बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और अंतिम यात्रा तक सभी को राहत मिलेगी.

गांव में अब सरफराज की पहचान सिर्फ पंचर बनाने वाले युवक की नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्ति की है जिसने अपने संकल्प को समाज की सुविधा में बदल दिया.

Jamui News: एक युवक ने साबित किया कि बदलाव के लिए सिर्फ इच्छा नहीं, जिद भी चाहिए

पुलिया के उद्घाटन के दौरान विधायक अख्तरुल इमाम ने सरफराज की सराहना करते हुए कहा कि दूसरों का दर्द अपना मानकर काम करने वाले लोग ही समाज के लिए प्रेरणा बनते हैं.

सरफराज की कहानी यह बताती है कि संसाधनों की कमी हमेशा सबसे बड़ी बाधा नहीं होती. कई बार एक मजबूत संकल्प और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव वह काम कर देता है, जो वर्षों तक सरकारी फाइलों में अटका रह जाता है.

आज जिस युवक के हाथ में कभी पंचर बनाने का औजार था, उसके घर लोगों की दुआएं पहुंच रही हैं. यह कहानी केवल एक पुलिया बनने की नहीं, बल्कि इंसानी संवेदना, संघर्ष और सामाजिक जिम्मेदारी की भी मिसाल है.

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प्रत्युष प्रशांत

लेखक के बारे में

By प्रत्युष प्रशांत

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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