बिहार के इस 101 बीघा जमीन वाले कॉलेज में सिर्फ सात कोर्स में होती है पढ़ाई, सुविधाओं का भी घोर अभाव
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 29 Aug 2022 2:12 PM
एचएस कॉलेज (HS College) में सुविधाओं का घोर अभाव है. सरकार और विश्वविद्यालय के उदासीनता का कोप भाजन बने इस कॉलेज में कई विसंगतियां हैं. जिसे दूर करने का कभी प्रयास नहीं किया. एचएस कॉलेज की स्थापना वर्ष 1956 में हुई थी
मधेपुरा: अनुमंडल मुख्यालय के एक मात्र सरकारी हरिहर साहा महाविद्यालय में नामांकित लगभग तीन हजार छात्र व छात्राएं है. जिसके पठन-पाठन के लिए शिक्षकों की संख्या तीन नियमित और आठ अतिथि शिक्षक के सहारे संचालन होती है. महाविद्यालय के भवन की बात की जाये तो कार्यालय कक्ष से लेकर वर्ग कक्ष के सभी भवन जर्जर होकर धूमिल होने के कगार पर हैं. महाविद्यालय में रखें अभिलेख व सरकार द्वारा प्राप्त कंप्यूटर बारिश के समय में सड़ गलकर बर्बाद हो चुका है. वहीं महाविद्यालय के परिसर में निर्माणधीन भवन की पूर्ण राशि लेकर ठेकेदार द्वारा आधा-अधूरा भवन बनाकर फरार हैं, लेकिन इस पर कोई संज्ञान लेने वाला नहीं है.
बता दें कि महाविद्यालय को अपना 101 बीघा जमीन रहते हुए आज तक मात्र 7 विषयों में एप्लीकेशन है. जबकि एफीलिएशन हेतु महाविद्यालय लगातार कला के सभी विषयों के साथ विज्ञान व वाणिज्य संकाय के संबंधन हेतु कई बार विश्वविद्यालय से लेकर उच्च शिक्षा विभाग को पत्र भेजा गया, लेकिन आज तक कोई भी संज्ञान नहीं लिया गया. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इंटरमीडिएट में नामांकन हेतु सबसे कम अंकों वाले छात्र-छात्राओं का चयन इस महाविद्यालय में होता है. जिसका नतीजा अधिकतर छात्र-छात्राएं फेल हो जाते हैं या पास तो होते हैं, लेकिन उच्च शिक्षा की प्राप्ति नहीं कर पाते क्योंकि महाविद्यालय में ऐसे विषय हैं. जिसमें एक भी प्रायोगिक विषय नहीं है और स्टूडेंट को ऐसे विषय मिलता है जो पढ़ने में सक्षम नहीं है.
एचएस कॉलेज में सुविधाओं का घोर अभाव है. सरकार और विश्वविद्यालय के उदासीनता का कोप भाजन बने इस कॉलेज में कई विसंगतियां हैं. जिसे दूर करने का कभी प्रयास नहीं किया. एचएस कॉलेज की स्थापना वर्ष 1956 में हुई थी. महाविद्यालय जो एक समय मे उदाकिशुनगंज के लिए एक धरोहर हुआ करता था लेकिन समय के साथ साथ इस महाविद्यालय की तस्वीर ही कुछ उल्टी सी हो गई है. जहां क्लास रूम में छात्र-छात्राओं की आवाज व शिक्षकों की डांट प्यार दुलार सुनाई देती थी वहीं अब सिर्फ कागजों पर खनक सुनाई पड़ती है. हां अभी भी फॉर्म भरने के समय भीड़ दिखाई जरूर पड़ती है.
इतना सब होने के बाबजूद भी कॉलेज प्रशासन मूक दर्शक मात्र बनकर रह गई है. महाविद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों का भविष्य अब भी अंधकारमय बना हुआ है. वही बताया जाता है कि हरिहर साहा महाविद्यालय के नाम से लगभग एक सौ एक एकड़ जमीन उपलब्ध है. बावजूद यहां के लोग एक अच्छे कॉलेज के लिए लालायित हैं. टूटा-फूटा गिरा हुआ ये महाविद्यालय किसी खंडहर से कम नहीं दिखता है.
महाविद्यालय में वर्ग संचालन के लिए पर्याप्त भवन नहीं. हरिहर साहा महाविद्यालय में वर्ग संचालन के लिए उपयुक्त रूप से कमरे के साथ साथ विषय के अनुसार शिक्षक भी उपलब्ध नहीं है. जबकि महाविद्यालय में लगभग तीन हजार छात्र-छात्राएं नामांकित है. जो कॉलेज में फॉर्म भरते वक्त ही नजर आते हैं. कॉलेज के सभी कमरा पूर्णत: जर्जर हो चुका है. जर्जर स्थिति रहने के कारण कभी भी छात्र-छात्राओं के लिए जानलेवा साबित हो सकता है. वही अगर ऐसा ही चलता रहा तो भविष्य में किसी बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता है.
वहीं, स्थानीय समाजसेवी ने कॉलेज भवन की जर्जर स्थिति को देखकर विभाग के अधिकारियों से मिलकर कई बार व्यवस्था बेहतर करने की मांग कर चुके हैं. वही अभिभावकों ने कहा की वर्षों से महाविद्यालय भवन की स्थिति जर्जर बनी हुई है. बरसात के समय मे जोखिम और बढ़ जाती है. ऐसे में अभिभावकों की चिता बढ़ जाती है. स्थानीय लोगों व शिक्षाविद ने कहा कि कई बार क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों से मिलकर समस्या को रखा गया है, लेकिन अबतक कोई निदान नहीं हो पाया है. महाविद्यालय में नामांकित छात्रों ने कहा कि कोरोना से पूर्व कॉलेज की जर्जर स्थिति के कारण पढ़ाई नहीं हो पाती है. वही जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है.
उदाकिशुनगंज के लिए एक धरोहर हुआ करता था कॉलेज वर्तमान राष्ट्रीय क्षितिज में शिक्षा के गुणात्मक विकास व प्रसार की प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हुए उदाकिशुनगंज मुख्यालय स्थित हरिहर साहा महाविद्यालय की स्थापना की गई है. महाविद्यालय जो एक समय मे उदाकिशुनगंज के लिए एक धरोहर हुआ करता था, लेकिन कुछ सालों में इसकी तस्वीर ही कुछ उल्टी सी हो गई है. एक धरोहर को मिटाने की हो रही साजिश विवि प्रशासन की उपेक्षा का दंश झेल रहा कॉलेज अनुमंडल क्षेत्र का एक मात्र अंगीभूत हरिहर साहा महाविद्यालय विश्वविद्यालय प्रशासन के उदासीनता और सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति का शिकार हो रहा है. इतना ही नहीं महाविद्यालय स्थापना काल से ही अपेक्षा का दंश झेल रहा है. जबकि यह कॉलेज बीएनएमयू विवि का एक अंगीभूत इकाई है.
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