56 कोड़े खाए, घर में आग और जेल की सही यातना, फिर थाने पर फहरा दिया तिरंगा, गोपालगंज के इन वीर सपूतों को जानिए

Updated:
विज्ञापन

स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति के बना शहीद स्मारक

Kateya Freedom Fighters : कटेया की वीर भूमि ने स्वतंत्रता संग्राम में अनेक सपूतों को जन्म दिया, जिन्होंने आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. अंग्रेज हुकूमत के जुल्मों का सामना करते हुए भी उन्होंने तिरंगा फहराया और देश के लिए संघर्ष जारी रखा. यह गाथा आज भी प्रेरणा देती है.

विज्ञापन

Kateya Freedom Fighters : चंपारण सत्याग्रह से लेकर असहयोग और भारत छोड़ो आंदोलन तक कटेया की धरती ने आजादी की लड़ाई में कई ऐसे वीर सपूत दिए, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने से इनकार कर दिया. किसी के घर में आग लगा दी गयी, किसी को जेल में यातनाएं दी गयीं और किसी को 56 कोड़ों की सजा मिली. इसके बावजूद इन सेनानियों का हौसला नहीं टूटा. कटेया की यह गौरवशाली गाथा आज भी देशभक्ति और बलिदान की प्रेरणा देती है.

कटेया की धरती ने दिए कई स्वतंत्रता सेनानी

आजादी के आंदोलन में कटेया थाना क्षेत्र के खुरहुरिया निवासी बाबू महादेव राय, बैकुंठपुर के फुलेश्वर दुबे, रूपीबगही के आगम पांडेय, लामीचौर के भुआल पांडेय, गहनी चकिया के रामनंदन लाल श्रीवास्तव, राम इकबाल राय और राधिका वर्णवाल समेत कई लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई. स्थानीय इतिहास और उपलब्ध विवरणों के अनुसार इन सेनानियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों को संगठित किया और आंदोलन को मजबूत किया.

16 अगस्त 1942 को कटेया थाने पर हुआ बड़ा आंदोलन

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 16 अगस्त 1942 को बाबू महादेव राय के नेतृत्व में हजारों लोग कटेया थाने की ओर बढ़े. आक्रोशित भीड़ ने थाने पर कब्जा कर लिया और डाकघर को भी निशाना बनाया. आंदोलनकारियों की भारी भीड़ देखकर तत्कालीन थाना प्रभारी चंद्रिका सिंह को वहां से हटना पड़ा.

थाने पर फहराया गया तिरंगा

कटेया थाने पर कब्जे के बाद बाबू महादेव राय, फुलेश्वर दुबे और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने थाना परिसर में तिरंगा फहराया. यह घटना अंग्रेजी शासन के लिए खुली चुनौती मानी गयी. स्थानीय विवरणों के अनुसार आंदोलनकारियों ने कई दिनों तक थाने पर अपना नियंत्रण बनाए रखा.

अंग्रेजों ने महादेव राय का घर जला दिया

कटेया थाने पर हुए आंदोलन की खबर ब्रिटिश अधिकारियों तक पहुंची तो उन्होंने बाबू महादेव राय को पकड़ने के लिए विशेष टॉमी फोर्स भेजी. 29 अगस्त 1942 की सुबह खुरहुरिया गांव को घेर लिया गया और गांव के बाहर मशीनगनें तैनात कर दी गयीं. हालांकि तब तक महादेव राय वहां से निकल चुके थे. उसी दिन शाम करीब चार बजे उनके घर में पेट्रोल डालकर आग लगा दी गयी.

दो महीने बाद गिरफ्तार हुए महादेव राय

घर जलाए जाने के बाद भी महादेव राय का संघर्ष जारी रहा. स्थानीय विवरण के अनुसार करीब दो महीने बाद अंग्रेज उन्हें गिरफ्तार करने में सफल हुए. गिरफ्तारी के बावजूद उनके आंदोलन और देशभक्ति के संकल्प में कमी नहीं आयी.

आगम पांडेय का घर भी तीन बार जलाया गया

रूपीबगही निवासी आगम पांडेय भी अंग्रेजी हुकूमत के निशाने पर रहे. स्थानीय जानकारों के अनुसार उनके घर को अंग्रेजों ने तीन बार आग के हवाले किया. इसके बावजूद आगम पांडेय ने आजादी की लड़ाई से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया. उनकी पत्नी पैजनी देवी ने भी आंदोलन में पति का साथ दिया.

फुलेश्वर दुबे ने अंग्रेजों की संचार व्यवस्था को चुनौती दी

बैकुंठपुर निवासी फुलेश्वर दुबे भी अंग्रेजों के लिए बड़ी चुनौती बने रहे. स्थानीय विवरणों के अनुसार बाबू जगजीवन राम, डॉ राजेंद्र प्रसाद, गिरीश तिवारी और झूलन बाबू जैसे नेताओं के साथ वह गांव के पूरब स्थित डीघा जंगल में आंदोलन की रणनीति तैयार करते थे.

सड़क काटकर अंग्रेजी फौज का रास्ता रोका

जब अंग्रेजों को आंदोलनकारियों की गतिविधियों की जानकारी मिली तो फुलेश्वर दुबे के घर को निशाना बनाने की तैयारी हुई. बताया जाता है कि उन्होंने ग्रामीणों की मदद से रातोंरात सड़क काटकर अंग्रेजी फौज का रास्ता रोक दिया. कई मौकों पर तार काटकर अंग्रेज अधिकारियों की संचार व्यवस्था भी बाधित की गयी.

कटेया थाना, जहां 1942 में ही लहराया गया था आजादी का तिरंगा  स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में बना शहीद स्मारक | Prabhat Khabar Network
कटेया थाना, जहां 1942 में ही लहराया गया था आजादी का तिरंगा

कई दिनों तक दारोगा बनकर थाने पर बनाया प्रभाव

फुलेश्वर दुबे के बारे में स्थानीय इतिहास में यह भी उल्लेख मिलता है कि उन्होंने कई दिनों तक दारोगा का रूप धारण कर कटेया थाने पर अपना प्रभाव बनाए रखा. आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका के कारण उन्हें कई बार जेल की यातनाएं भी झेलनी पड़ीं. इसके बावजूद उनका संघर्ष स्वतंत्रता मिलने तक जारी रहा.

महज 18 साल की उम्र में आंदोलन में कूदे भुआल पांडेय

लामीचौर निवासी भुआल पांडेय ने महज 18 वर्ष की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया. कम उम्र में ही उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी. उनकी गतिविधियों से परेशान ब्रिटिश अधिकारियों ने वर्ष 1932 में उन्हें गिरफ्तार कर पटना जेल भेज दिया.

56 कोड़ों की सजा भी नहीं तोड़ सकी हिम्मत

जेल में भुआल पांडेय को अंग्रेजी शासन के सामने झुकाने के लिए अमानवीय यातनाएं दी गयीं. स्थानीय विवरण के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 56 कोड़े मारने की सजा सुनायी और पानी तक नहीं देने का आदेश दिया. यातनाओं के बीच उनका शरीर जवाब देने लगा, लेकिन उन्होंने अंग्रेजों के सामने समर्पण नहीं किया.

अंतिम सांस तक गूंजता रहा भारत माता का जयघोष

स्थानीय इतिहास में दर्ज विवरण के अनुसार पानी के अभाव और यातना के कारण भुआल पांडेय की हालत बेहद गंभीर हो गयी थी. इसके बावजूद अंतिम समय तक उनके मुख से भारत माता की जय का उद्घोष निकलता रहा. उनकी यह गाथा कटेया के स्वतंत्रता आंदोलन के साहसिक अध्यायों में गिनी जाती है.

इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिला, लेकिन यादें आज भी जिंदा

कटेया के इन स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान स्थानीय लोगों की स्मृतियों में आज भी जीवित है. बाबू महादेव राय से लेकर फुलेश्वर दुबे, आगम पांडेय और भुआल पांडेय तक कई सेनानियों ने व्यक्तिगत नुकसान और यातनाओं की परवाह किए बिना देश की आजादी के लिए संघर्ष किया.


विज्ञापन
अजित द्विवेदी

लेखक के बारे में

By अजित द्विवेदी

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन