जेपी की कहानी गुलाब यादव की जुबानी, हर राेज सेविंग और जूते में पॉलिश खुद करते थे जेपी

Updated at : 01 Jan 2020 8:03 AM (IST)
विज्ञापन
जेपी की कहानी गुलाब यादव की जुबानी, हर राेज सेविंग और जूते में पॉलिश खुद करते थे जेपी

आेमकार सिन्हा, डाेभी : लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ आठ साल साथ गुजारा. वह मेरे जीवन का स्वर्णिम काल था, जब ऐसे युग पुरुष के साथ रहने का अवसर मिला हाे, वह भी घरेलू कामकाज व देखरेख करने के लिए. मैं उनका बेटा ताे नहीं, पर उससे कहीं बढ़ कर दीदी व दादाजी प्यार करते […]

विज्ञापन

आेमकार सिन्हा, डाेभी : लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ आठ साल साथ गुजारा. वह मेरे जीवन का स्वर्णिम काल था, जब ऐसे युग पुरुष के साथ रहने का अवसर मिला हाे, वह भी घरेलू कामकाज व देखरेख करने के लिए. मैं उनका बेटा ताे नहीं, पर उससे कहीं बढ़ कर दीदी व दादाजी प्यार करते थे. मैं अंतिम समय में साये की तरह उनके साथ रहता था. उनकी दिनचर्या का ख्याल रखता था. अपनी यादाें काे ताजा करते हुए गुलाब प्रसाद यादव यह सब एक सांस में कहते चले जा रहे थे.

जिले के बाराचट्टी थाने के गोसाइं पेसरा निवासी गुलाब प्रसाद यादव बैंक खचांजी के पद से रिटायर्ड हाेकर इन दिनाें अपने घर पर रह रहे हैं. ‘प्रभात खबर’ ने उनसे मुलाकात की आैर जय प्रकाश नारायण के साथ बिताये स्मृतियाें काे साझा किया. गुलाब यादव ने कहा कि जेपी को दादा जी व उनकी धर्मपत्नी प्रभावती देवी को वह दीदी कह कर पुकारते थे.
पहली बार ताे जेपी के साथ जाने से मना किया, पर दूसरी बार साथ हाे लिये : 1957 में बाराचट्टी के गोसाइं पेसरा में जन्मे गुलाब यादव जिनके पिता स्वतंत्रता सेनानी गिरधारी गोप व माता वसिया देवी थीं. बकाैल गुलाब यादव 10 वर्ष की आयु में बोधगया स्थित समन्वय आश्रम में पढ़ाई के लिए पिताजी ने भेजा. यहीं पर पहली बार लोकनायक जयप्रकाश नारायण व उनकी पत्नी प्रभावती देवी से मुलाकात हुई. जेपी जी जब गया आते थे, मानपुर स्थित भूपेंद्र नारायण सिंह उर्फ भूप बाबू के निवास या फिर समन्वय आश्रम में ठहरते थे.
1970 में जब जेपी व पत्नी साथ गया आये, तो इसी आश्रम में ठहरे. उनके साथ उनके गांव सिताब दियारा का ही एक शिवशंकर नाम का लड़का घरेलू कामकाज के लिए साथ रहता था. बोधगया में मंदिर देखने के लिए आश्रम के लड़कों के साथ वह चला गया. इधर, कुछ काम के लिए दीदी ने उसकी खाेज की. मेरे पास आयीं और उसके बारे में पूछा.
मैंने लड़कों के साथ मंदिर देखने जाने की बात बतायी. इस पर दीदी ने कहा जरा मेरे कुछ काम में हाथ बंटा दो. मैं हाथ बंटाने चला गया. दीदी ने मेरा परिचय पूछा, तो मैंने बताया गिरधारी गोप का लड़का हूं. इस पर दीदी ने दादा से कहा कि अपने गोप जी का लड़का है. मेरे काम से वह काफी प्रभावित हुईं. द्वारिकाे सुंदरानी से मेरी मांग की.
उन्हाेंने जब मुझसे मेरी राय मांगी, ताे मैंने मना कर दिया. 1971 में द्वारिकाे जी व शिक्षक शर्मा जी मुजफ्फरपुर में एक सेमिनार में हमें साथ लेकर गये. तब मैं 14 साल का हो गया था. वहां पहुंच कर मैं फिर दीदी से मिला आैर उसके बाद से उनके साथ पटना कदमकुआं स्थित निवास पर चले आये. घरेलू काम में दीदी का सहयोग करने लगे.
दीदी के जाने के बाद दादाजी की सेहत का रखता था ख्याल : कुछ दिन बाद दीदी काे कैंसर हाे गया. इलाज के लिए दिल्ली, मुंबई आदि जगहों पर ले जाया गया, जहां मैं भी साथ जाता. दीदी व दादाजी मुझे अपने बेटे की तरह मानने लगे. 1973 में दीदी चल बसीं. जेपी जी की दिनचर्या- प्रात: उठकर क्रियाकर्म से निवृत हाेकर छत पर टहलने की आदत थी. उसके बाद लेमन टी फिर सेविंग स्वयं प्रतिदिन करते थे. जूता में पॉलिस भी स्वयं करते थे. सुबह नाै बजे नाश्ते में फुला हुआ मूंग,चना,गुड़ आदि लेते थे.
दोपहर दो बजे खाना, जिसमें रोटी–दाल, सब्जी व चार बजे कॉफी के साथ चार बिस्कुट लेते थे. रात में रोटी–दाल, सब्जी व सोते समय दूध जरूर लेते थे. उनसे मिलने वालों को तांता लगा रहता था. मिनिस्टर से लेकर प्राइम मिनिस्टर, राष्ट्रपति तक आते थे. नीतीश कुमार, लालू यादव, जार्ज फर्नांडीस,अब्दुल बारी सिद्दिकी, लालमुनी चौबे, रामविलास पासवान, सुशील मोदी आदि आते रहते थे. गया आने पर दयानंद सहाय, सुशीला सहाय से जरूर मिलते थे.
जेपीजी ने चंडीगढ़ जेल से भेजा था मुलाकात करने के लिए पत्र : 1974 में जेपी आंदोलन हुआ. 1975 में आपातकाल लागू कर उन्हें पंजाब के चंडीगढ़ जेल में डाल दिया. जहां से उन्होंने मेरे नाम चिट्ठी भेजी आैर मिलने के लिए बुलाया.
उनके भाई राजेश्वर प्रसाद, साला शिवनाथ प्रसाद के साथ मिलने के लिए चंडीगढ़ जेल गया. वहां पर उनको जेनरल जेल में नहीं रख कर अस्पताल को घेरकर जेल बना दिया था, जहां पर दादाजी को रखा गया था. मैं उनके परिवार का नहीं था, इसलिए मिलने नहीं दिया गया. जेल के मेन्यु में सिर्फ परिवार ही उनसे मुलाकात कर सकता था. उन्होंने इसका जिक्र अपनी ‘जेल डायरी’ में किया.
जब चंदा कर डायलिसिस का हुआ इंतजाम
जेल में ही उनकी तबीयत बिगड़ने लगी. छह माह के बाद जेल से रिहा हुए. उसके बाद दादा भारत यात्रा के लिए निकल पड़े. भारत यात्रा के बाद उनकी तबीयत काफी बिगड़ गयी, तो उन्हें मुंबई के यशलोक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उन्हें किडनी खराब होने की बात बतायी गयी.
अस्पताल में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद आदि पहुंचे और उनका हालचाल पूछा. तबीयत कुछ ठीक होने पर वह पटना पहुंचे, जहां पर उनके पारिवारिक डॉक्टर सीपी ठाकुर ने देखरेख की. उस समय दादाजी का उम्र 70वर्ष हो चुका था.
पटना के डॉक्टर मणी ने कहा कि ज्यादा उम्र होने के कारण किडनी ट्रांसप्लांट नहीं किया जा सकता हैै, इनको डायलिसिस पर रखना होगा. डायलिसिस की कीमत एक लाख रुपये थी, पैसा नहीं होने के कारण चंदा कर पैसा इंतजाम किया गया. डायलिसिस खरीद लाया गया और पटना में स्थित घर पर डॉक्टर उत्पाल कांत की देखरेख में रखा गया.
दादाजी के गांव सारण जिला क्षेत्र के सितावदियारा के जगदीश बाबू जो तत्कालीन एमएलसी थे, साथ अब्राहम साहेब, शंकर बहादुर, सच्चिदानंद सिन्हा, अमृत कुमार आदि रहते थे. पटना के कदमकुआं स्थित आवास पर आठ अक्तूबर 1979 को उन्होंने अंतिम सांस ली. खुद के संदर्भ में गुलाब यादव ने कहा, इतने राजनीतिक लाेगाें के साथ सराेकार हाेने के बाद भी उन्हें काेई राजनीतिक या प्रशासनिक लाभ नहीं मिला. खुद से पढ़ाई कर बैंक की नाैकरी की. लेकिन, दीदी व दादाजी हमेशा दिल में बसे रहते हैं.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन