गया : शिक्षक को तीन बार ''मौत'' छूकर निकली

Updated at : 07 Mar 2019 8:44 AM (IST)
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गया : शिक्षक को तीन बार ''मौत'' छूकर निकली

आशीष जाको राखे साइयां मार सके न कोय शिक्षक सत्य प्रकाश हादसों के बाद भी शिक्षा की जगा रहे लौ गया : सामान्य कद काठी के सत्यप्रकाश से जब आप पहली बार मिलेंगे, तो लगेगा कि अरे इस आदमी में ऐसी क्या बात है. पेशे से शिक्षक हैेेें, इसलिए अनुशासन पसंद व्यक्ति हैं. अपने छात्रों […]

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आशीष
जाको राखे साइयां मार सके न कोय
शिक्षक सत्य प्रकाश हादसों के बाद भी शिक्षा की जगा रहे लौ
गया : सामान्य कद काठी के सत्यप्रकाश से जब आप पहली बार मिलेंगे, तो लगेगा कि अरे इस आदमी में ऐसी क्या बात है. पेशे से शिक्षक हैेेें, इसलिए अनुशासन पसंद व्यक्ति हैं. अपने छात्रों के बीच वह मुस्कुराते हुए पढ़ाने वाले शिक्षक के तौर पर चर्चित हैं.लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है. यह शिक्षक दूसरे शिक्षकों से थोड़े जुदा हैं.
एक ऐसे शिक्षक, जिन्हें तीन बार मौत छूकर निकली, लेकिन हर बार मौत को उनके आगे घुटने टेकने पड़े हैं. एक पल के लिए इसे मान लेना आसान नहीं होगा, लेकिन बात सौ फीसदी सच है. मूल रूप से कोंच थाना के बाली गांव निवासी स्व. वैद्यनाथ सिंह के पुत्र सत्य प्रकाश 1988 से शिक्षा के क्षेत्र में हैं. वह 2017 से गुरारू में अलकदेव मध्य स्कूल के प्राचार्य हैं.
1989 में किसी काम के सिलसिल में वह पटना में थे. एक रोज सुबह 10 बजे जब वह पैदल गर्दनीबाग जा रहे थे, तो इसी दौरान एक बस ने उन्हें टक्कर मार दी. टक्कर इतनी जबर्दस्त थी कि वह अचेत हो गये. आस-पास ने लोगों ने इसकी सूचना पुलिस को दी. उनके सिर से खून रिस रहा था. मौके पर पहुंची पुलिस उन्हें गंभीर हालत में पीएमसीएच नले गयी पुलिस यह मान चुकी थी कि यह व्यक्ति नहीं बचने वाला. पीएमसीएच में पूरे एक दिन वह भर्ती रहे. अगले दिन डॉक्टरों ने उनका चेकअप किया. संयोग कि इतनी जबरदस्त टक्कर के बाद भी उनके शरीर में जान बाकी थी. आखिरकार कुछ दिन रहने के बाद उनके परिवार वाले उन्हें अपने साथ ले गये.
पटना में ही 1990 में दुबारा वह मौत का शिकार होने से बचे. हुआ यूं कि वह कदमकुंआ से दोपहर 12 बजे पैदल ही दवाई लाने जा रहे थे. सब कुछ सामान्य था. कदमकुंआ के पास ही एक घर से कुछ लड़कों ने कोल्डड्रिंक की बोतलें सड़कों पर फेंकी.
उनका इरादा किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था, लेकिन बोतलें सीधे सत्य प्रकाश के सिर से जा टकरायीं. वह कुछ समझ पाते इससे पहले ही सिर से खून टपकने लगा और उन्हें चक्कर आने लगा. वह बेहोश होकर गिर पड़े. बोतल जिस गति से सिर से टकरायी थी उसने ब्रेन पर असर कर दिया. उन्हं एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां बड़ी मुश्किल से वह कोमा में जाने से बचे.
वर्ष 1991-92 में शेरघाटी में उनकी चुनाव के वक्त ड्यूटी लगायी गयी थी. पोलिंग एजेंट के तौर पर वह एक बूथ पर तैनात थे. मतदान समाप्त होने के बाद जब वह और उनके साथी मतपेटियों को सील करने में लगे थे, तभी नक्सलियों ने हमला बोल दिया. कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही पलक झपकते सभी को बंदी बना लिया गया
.
नक्सलियों ने मतपेटियों को लूट लिया और सभी को एक पेड़ से बांध कर उसमें आग लगा दी. सभी बुरी तरह से आग से घिर गये थे. एक पल के लिए लगा कि इस दफा तो जान चली ही जायेगी. लेकिन किसी तरह पुलिस को सूचना मिल गयी. इसके बाद पुलिस ने मौके पर पहुंच कर उन्हें और अन्य कर्मियों को बचाया.
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