बोधगया : नारी की स्थिति को और सुदृढ़ बनाने की है जरूरत : आयुक्त
Updated at : 31 Jan 2019 6:53 AM (IST)
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बोधगया : नारी की स्थिति को और सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है. बौद्ध धर्म ने अधिकार व समानता के सिद्धांत को बढ़ावा दिया है और महिलाओं के विकास का द्वार न केवल सामाजिक, बल्कि धार्मिक क्षेत्र में भी खोला है. भिक्षुणी संघों के कार्य भी कई देशों में सराहनीय हैं. ये बातें बुधवार को महाबोधि […]
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बोधगया : नारी की स्थिति को और सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है. बौद्ध धर्म ने अधिकार व समानता के सिद्धांत को बढ़ावा दिया है और महिलाओं के विकास का द्वार न केवल सामाजिक, बल्कि धार्मिक क्षेत्र में भी खोला है. भिक्षुणी संघों के कार्य भी कई देशों में सराहनीय हैं.
ये बातें बुधवार को महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया (श्रीलंका मठ) में ‘बुद्धिज्म एंड वूमेंस लिबरेशन’ विषय पर आयोजित इंटरनेशनल सेमिनार के उद्घाटन सत्र में मगध की आयुक्त टीएन बिंधेश्वरी ने कहीं. उन्होंने कहा कि महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में बौद्ध धर्म के माध्यम से एक महत्वपूर्ण पहल शुरू कर दी गयी है और इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है.
समाज में पुरुष व नारी की समान भागीदारी: सेमिनार में नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो वैद्यनाथ लाभ ने कहा कि हमें मानसिक स्तर पर विकास का प्रयास करना चाहिए. पुरुष व नारी की समाज में बराबर की भागीदारी है. इस कारण उनके अधिकार भी बराबर हों. ऐसी मानसिकता पुरुष व नारी में सहयोग की भावना के विकसित हो, तो बौद्ध विचार के साथ-साथ मानवता के प्रसार को भी बल मिलेगा.
सेमिनार में स्वागत भाषण करते हुए महाबोधि सोसाइटी ऑफ इंडिया के महासचिव भंते पी सिवली थेरो ने कहा कि हमने प्रथम बौद्ध वैश्विक सम्मेलन 2018 के जनवरी में ‘वैश्विक समस्याएं एवं बौद्ध धर्म की प्रासंगिकता’ विषय पर किया था. इस वर्ष का विषय बुद्धिज्म एंड वूमेंस लिबरेशन रखा गया है. उन्होंने कहा कि ढाई हजार वर्ष पहले बुद्ध शासन के चार स्तंभ थे.
इनमें भिक्षु-भिक्षुणी, उपासक व उपासिकाएं शामिल थीं. इन्होंने धर्म के मुख्य संदेश शांति, धैर्य, समता व स्वतंत्रता का प्रचार-प्रसार सुदूर क्षेत्र व प्रदेशों तक किया था व पीड़ित मानवता की मुक्ति का मार्ग दिखाया था. सम्राट अशोक का अपने पुत्र-पुत्री महेंद्र व संघमित्रा को भिक्षु-भिक्षुणी बना कर धर्म प्रचारार्थ श्रीलंका भेजना महान धर्म सेवा का उदाहरण है.
मैं समझता हूं कि विद्वानों की चर्चा से विषय पर नया प्रकाश पड़ेगा व नारी समाज की स्थिति और बेहतर होने का मार्गदर्शन मिलेगा. सेमिनार में चीन के भिक्षु वूपसम, थाइलैंड की भिक्षुणी धम्मानंदा, पूर्व कुलपति विमलेंदू मोहंती, आइटीबीपी के कमांडेंट नरेंद्र सिंह, महाबोेधि सोसाइटी ऑफ इंडिया के उपसभापति हेमेंदू विकास चौधरी व बीटीएमसी के सचिव एन दोरजी ने भी अपने विचारों से अवगत कराया. दो दिवसीय सेमिनार का समापन गुरुवार को होगा.
प्रतिस्पर्धा की जगह सहयोग की भावना अपनाएं
सेमिनार में मुख्य वक्ता अमेरिका के बौद्ध भिक्षु बोधि ने कहा कि महिलाओं के शोषण व प्रताड़ना का उल्लेख प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक मिलते हैं. बौद्ध धर्म में महिलाओं को लौकिक व आध्यात्मिक धरातल पर विशेष सम्मान दिया गया है. उन्होंने कहा कि भिक्षुणी संघ (महिला संन्यासिनी का संगठन) में उच्चस्तरीय ज्ञान से संपन्न अनेक भिक्षुणियों का उल्लेख है. कुछ ग्रंथों में उनके कुछ नकारात्मक छवि के भी उदाहरण मिलते हैं.
भिक्षु बोधि ने सवाल खड़ा किया कि समाज में व्याप्त नारी से संबंधित बुराई यथा यौन दुराचार व वेश्यावृत्ति आदि के लिए क्या केवल महिलाएं ही उत्तरदायी हैं. उत्तर स्पष्ट नहीं है, क्योंकि इसमें पुरुषों की भी भागीदारी है. उन्होंने कहा कि बौद्ध थेरोवाद परंपरा में भिक्षुओं को भिक्षुणियों के प्रति उदारवादी नीति अपनाने की आवश्यकता है.
मेरी नजर में नारी व पुरुष के बीच प्रतिस्पर्धा से संघर्ष की संभावना हो सकती है. प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग की भावना से परस्पर प्रेम व आदर का विकास होगा. महिलाओं की प्रगति के लिए राजकीय प्रयास भी सराहनीय कदम है. इसे और गति दी जानी चाहिए.
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