चौथी मंजिल से अमृता ने लगा दी छलांग
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :29 Apr 2015 6:29 AM (IST)
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बगहा/वाल्मीकिनगर : हौसले से मौत भी मात खा जाती है. इसको साबित किया है वाल्मिकीनगर के पास नेपाल के त्रिवेणी की रहनेवाली अमृता (20) ने. इंटर की छात्र अमृता ने 25 अप्रैल की दोपहर में काठमांडू के होराजन हायर सेकेंड्री स्कूल की चौथी मंजिल पर थीं. इसी दौरान भूकंप आया, तो उन्होंने वहीं से छलांग […]
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बगहा/वाल्मीकिनगर : हौसले से मौत भी मात खा जाती है. इसको साबित किया है वाल्मिकीनगर के पास नेपाल के त्रिवेणी की रहनेवाली अमृता (20) ने. इंटर की छात्र अमृता ने 25 अप्रैल की दोपहर में काठमांडू के होराजन हायर सेकेंड्री स्कूल की चौथी मंजिल पर थीं.
इसी दौरान भूकंप आया, तो उन्होंने वहीं से छलांग लगा दी. इसमें उनके पैर में मोच आयी. वो सही-सलामत मंगलवार को अपने घर पहुंच गयी. इस दौरान तीन दिन तक उन्हें सही तरीके से खाना नहीं मिला. त्रासदी को मात देकरपरिजनों के पास पहुंची अमृता चौथे दिन खाना खाया.
वह इस बात को लेकर दुखी हैं कि जिस कमरे में वह थी, उसी कमरे में करीब 40 लड़कियां और थी. संभवत: ज्यादातर लड़कियां मलबे में दब गयीं. अमृता ने बताया कि मैं इंटर की परीक्षा देने के लिए गयी थी. मेरी मां बोल रही थी, कि मैं भी तुम्हारी साथ चलूंगी, लेकिन मेरी जिद के कारण वह नहीं गयी. मैं अकेली ही परीक्षा देने के लिए चली गयी. वो कहती हैं कि उनकी जिद ने काम किया. वरना, भूकंप के समय वो अपनी मां के साथ शायद सुरक्षित नहीं निकल पातीं.
गिरने लगा भवन
अमृता ने बताया कि मैं स्कूल की चौथी मंजिल पर परीक्षा दे रही थी. अचानक धरती हिलने लगी. परीक्षा ले रहे शिक्ष सकते में आ गये. सभी छात्र अपनी जगह खड़े हो गये. किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था. कमरे में भगदड़ मच गयी. पलक झपकते में स्कूल की दीवारें गिरने लगी. सहसा मुङो मम्मी की याद आयी. लगा कि अब मैं नहीं बचूंगी. मेरे बगल में स्कूल की छत का एक हिस्सा गिर गया. इसके बाद मैंने बिना सोचे-समङो आंख बंद करके चौथी मंजिल से छलांग लगा दी. मैं तो पूरी तरह से डर गयी थी, कि अब बचना मुश्किल है. जब मैं जमीन पर गिरी तो लगा , किसी ने मुङो उठा लिया हो. आंख खुली तो मैं धरती पर थी.
अगल-बगल से लोग भाग रहे थे. मैं भी भागने लगी. करीब एक किलोमीटर भागने के बाद खुला मैदान दिखा , वहां जब पहुंची तो मुङो एहसास हुआ कि मेरा पैर टूट गया है. दर्द होने लगा. अब चलने में दिक्कत हो रही थी.
अधेड़ महिला की मदद
तभी मेरे पास अधेड़ महिला अपने तीन छोटे बच्चों के साथ आयी. उसने मुङो सहारा दिया. फिर मैं खुले मैदान में सुरक्षित पहुंच गयी. 25 अप्रैल (4 बजे के आसपास) उसने देखा तो उसका मोबाइल सुरक्षित था, लेकिन नेटवर्क फेल था. अमृता अपने घर बात करना चाहती थी, लेकिन बात नहीं हुई.
एक व्यक्ति बताया कि एसएमएस जा रहा है. उसने अपने पिता को एसएमएस किया. फिर किसी तरह से बचते – बचाते वह बस स्टैंड पहुंची. फिर वहां बस में चढ़ने के लिए मशक्कत करनी पड़ी. 26 अप्रैल को किसी तरह से वह बस में सवार हुई. वहां से सीधे बस त्रिवेणी नहीं आ रही थी. रास्ते में बस बदलना पड़ा. अपनों के बीच पहुंची अमृता कहती है कि उसे नया जीवन मिला है.
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