खाट पर लाद अस्पताल भेजे जाते मरीज
Updated at : 07 Jun 2015 8:06 AM (IST)
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सरकारें तो बहुत बदलीं, नहीं बदली तो बाढ़ी टोला की तसवीर रक्सौल : प्रखंड क्षेत्र के पलनवा जगधर पंचायत में एक ऐसा भी गांव है, जहां आजादी के 68 साल बीत जाने के बाद भी विकास की रोशनी नहीं पहुंच पायी है. इस गांव का नाम बाढ़ी टोला है जो आज भी मूलभूत सुविधाओं से […]
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सरकारें तो बहुत बदलीं, नहीं बदली तो बाढ़ी टोला की तसवीर
रक्सौल : प्रखंड क्षेत्र के पलनवा जगधर पंचायत में एक ऐसा भी गांव है, जहां आजादी के 68 साल बीत जाने के बाद भी विकास की रोशनी नहीं पहुंच पायी है. इस गांव का नाम बाढ़ी टोला है जो आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है. यह गांव गाद नदी के तट पर बसा है, जहां जाने के लिए सड़क नहीं पगडंडी ही एकमात्र रास्ता है.
गांव में आज तक विद्युत, सड़क, शिक्षा सहित अन्य विकासात्मक कार्यो का घोर अभाव दिखता है. बाढ़ के दिनों में बाढ़ी टोला गांव टापू में तब्दील हो जाता है. गांव के ग्रामीण प्रभा यादव, मुन्ना कुमार, भोला यादव, राधा यादव, बागड़ यादव, बिहारी साह, विपिन सिंह, शंकर साह, सिंगासन साह, चन्द्रिका साह, अर्शफी साह, हरिशंकर प्रसाद, मुन्ना आलम सहित अन्य लोगों ने बताया कि सरकारें तो बहुत बदली लेकिन नहीं बदली बाढ़ी टोला गांव की सूरत. ग्रामीणों ने बताया कि गांव की दुर्दशा की जानकारी सभी जनप्रतिनिधियों को दी गयी, लेकिन इस गांव के विकास को लेकर किसी भी जनप्रतिनिधि द्वारा सार्थक कदम नहीं उठाया गया.
बरसात के दिनों में यह गांव चोरों तरफ से पानी से घिर टापू में तब्दील हो जाता है, जिसके बाद लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो जाता है. बरसात के दिनों में मरीज को खाट पर लादकर भेलाही या प्रखंड मुख्यालय रक्सौल ले जाना होता है. लोगों का कहना है कि गांव के लोगों द्वारा चंदा एकत्रित कर चचरी पुल का निर्माण किया जाता है. जिसके बाद लोग पैदल अपने घरों को जा पाते हैं, लेकिन बरसात के दिनों में नदी के कटाव के कारण पगडंडी रास्ता भी पूर्णत: बंद हो जाता है.
चंदा से बनता है चचरी पुल
ग्रामीणों ने बताया कि प्रत्येक वर्ष बरसात में नदी पर बना चचरी पुल बह जाता है, जिसके बाद गांव में आने-जाने के लिए चंदा एकत्रित कर चचरी पुल का निर्माण किया जाता है. वहीं नदी के कटाव के बाद पगडंडी को भी दुरुस्त करने का काम किया जाता है.
गांव में मात्र सात शिक्षित
पंद्रह सौ आबादी वाले बाढ़ी टोला गांव में मात्र दो लोग बीए, एक इंटर व चार मैट्रिक पास लोग हैं. गांव की आबादी और शिक्षा के बीच का अंतर इस प्रकार है, जिससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि गांव में शैक्षणिक माहौल किस कदर है. हालांकि गांव के लोग अपने बच्चों के शिक्षा को लेकर इन दिनों काफी जगह है. इसको लेकर विद्यालयों में छात्रों की संख्या दिखने लगी है. गांव की शिक्षा का आलम यह है कि गांव में एक मात्र नौकरी पंचायत शिक्षक की है. जबकि बरसात के दिनों में रास्ता बंद हो जाने के कारण विद्यालय में पढ़ाई व्यवस्था भी ठप हो जाती है.
अस्पताल जाने में दिक्कत
बरसात के पूर्व ही गांव की गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव के लिए अन्यत्र भेज दिया जाता है. क्योंकि बरसात के दिनों गांव से निकलने के लिए रास्त नहीं बचता. ग्रामीणों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं को बरसात के दिनों अस्पताल ले जाने में भारी परेशानी होती है. वहीं गांव में रहने पर बच्चे का जन्म भगवान भरोसे होता है.
इलाज के अभाव में मौत
ग्रामीणों ने बताया कि बीते वर्ष बरसात के दिनों में गांव में चारों तरफ से पानी से घिर गया था.इसी बीच इलाज के लिए मरीजों का खाट पर लाद कर ले जाया जा रहा था. इस क्रम में 55 वर्षीय तपसी साह, संजय साह की 30 वर्षीय पत्नी रामावती देवी की मौत रास्ते में हो गयी. वहीं जनार्धन साह के पत्नी की मौत भी तीन वर्ष पूर्व अस्तपाल ले जाने के क्रम में रास्ते में हो गयी थी.
एसएसबी की कोशिश
ग्रामीणों ने बताया कि विकास के नाम पर सशस्त्र सीमा बल के उप सेनानायक अरविन्द कुमार सिंह द्वारा गांव का निरीक्षण किया गया था. इसके बाद गांव में एक सोलर व एक चापाकल एसएसबी के सहयोग से विकास के नाम लगाया गया.
किया था चुनाव बहिष्कार
बीते लोकसभा चुनाव में ग्रामीणों ने सड़क, बिजली व विकास नहीं तो वोट नहीं के नारे के साथ वोट का बहिष्कार कर दिया. इस पर मतदान को लेकर लगाये गये अधिकारी उक्त गांव पहुंचे और लोगों से वोट के नाम पर नोटा बटन का इस्तेमाल करने की बात कहीं. लेकिन ग्रामीणों ने पूर्णत: वोट का बहिष्कार कर दिया. इसके बाद गांव में बीते चुनाव के बाद राजीव गांधी विद्युत करण योजना के तहत कुछ विद्युत पोल गिराये गये हैं.
गांव की आवश्यकता
ग्रामीणों की माने तो मुख्य रूप से गाद नहीं पर पूल, गांव को जोड़ने वाली मुख्य सड़क, गांव के गलियों की सड़कें, प्राथमिक विद्यालय, विद्युत आदि को गांव के विकास के लिए अति आवश्यक बताया.
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