buxar news : सतयुग में नागकन्या के कहने पर सुकन्या ने चौसा में की थी छठ पूूूूजा

buxar news : छठ पूजा के प्रताप से स्वस्थ हो गया था महर्षि च्यवन ऋषि का दीमक लगा शरीर
चौसा. जिला मुख्यालय से पश्चिम पवित्र गंगा तट पर अवस्थित चौसा महादेवा गंगा घाट पर महर्षि च्यवन मुनि का स्थल है, जहां पर हजारों व्रती दूरदराज से छठ करने आते हैं. बताया जाता है कि सतयुग में सर्याति नामक एक राजा थे, जिनकी एक हजार स्त्रियां थीं, जिनसे एक ही कन्या उत्पन्न हुई थी. बाल्यावस्था से ही चंचला वह कन्या राजा को प्राण प्रिय थी, जिसका नाम सुकन्या था. एक समय राजा सर्याति (जिनके नाम का अपभ्रंंश होते-होते आज सरेंजा गांव है, जो एक टीलेनुमा भूखंंड पर बसा है) अपने सिपाहियों के साथ जंंगल मेें शिकार करने चले गये. 10 दिन बीत गये. इसी दौरान अपने सखियों के संग सुकन्या फुल लेने जंगल में चली गयी, वहां पर च्यवनमुनी का आश्रम था. हजारों वर्ष तपस्या में लीन भार्गववंशी महर्षि च्यवन ऋषि के शरीर में दीमक लगे थे. वह देखती है कि मिट्टी के मध्य में मुनि के दोनों नेत्र जुगनू की भांति चमक रहे हैं, कौतुकवश सुकन्या ने विस्मित हो एक तिनके से उनकी दोनों आंखें फोड़ दीं, तब मुनि के नेत्रों से रुधिर की धारा बहने लगी, जिसे देख सुकन्या भाग खड़ी हुई. च्यवन मुनि के नेत्र सुकन्या द्वारा फोड़ दिये गये, जिससे राजा और सेना का मल-मूत्र आदि सब बंद हो गया और सभी हाहाकार करने लगे. इसी तरह जब तीन दिन बीत गये, तो पुरोहित से राजा ने कारण पूछा. पुरोहित ने राजा से कहा कि हजारों वर्ष से तपस्यालिन भार्गववंशी च्यवन नामक एक ऋषि इसी वन में घोर तपस्या कर रहे हैं, जिनके शरीर में दीमक लगकर मांस खा गये हैं. हड्डी मात्र में मिट्टी लिपटी है. आपकी कन्या अज्ञानता वश उनके दोनों नेत्र कांटों से फोड़ दी है, जिससे रुधिर बह रहा है. उन्हीं के क्रोध से यह कष्ट उत्पन्न हो गया है. आप उनको प्रसन्न करिये और अपनी कन्या उन्हें दे दीजिये. राजा शर्याति सुकन्या को साथ लेकर ऋषि के पास गये और जल छोड़ने पर हड्डी मात्र के दर्शन हुए. नेत्रहीन ऋषि को देखकर राजा बोले हे प्रभु मेरी कन्या से अनजाने में यह अपराध हुआ है, जिससे आपके यह नेत्र फूट गये. आपकी सेवा के लिए हम अपनी कन्या आपको देते हैं, ताकि आपको कष्ट न हो. राजा के वचन को सुनकर ऋषि प्रसन्न हुए और राजा ने सुकन्या का दान कर दिया. वह सुकन्या नेत्रहीन च्यवन मुनि की सेवा करने लगी. अतिसुंदर सुकन्या कार्तिक मास में एक दिन जल लेने नदी में गयी, वहां उसने सूर्य भगवान की पूजा करते हुए एक नागकन्या को देखकर सुकन्या धीरे से पास जाकर उससे पूछी इस पूजा से क्या फल प्राप्त होता है. नागकन्या ने कहा कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सप्तमी युक्त होने पर सर्वमनोरथ सिद्धि के लिए यह व्रत किया जाता है. नागकन्या के इस वचन को सुनकर सुकन्या ने रवि षष्ठी (छठ पूजा) व्रत किया. इसी व्रत के प्रभाव से च्यवन महाराज के नेत्र पुनः पूर्ववत हो गये. च्यवनजी का शरीर निरोग हो गया और दोनों सुखी से रहने लगे. यौवन शक्ति पाने के लिए महर्षि ने जंगल की 54 जड़ी-बुटियों को मिलाकर एक अवलेह तैयार किया, जो आज च्यवनप्राश के नाम पर प्रसिद्ध है.
डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए




