उमंग. मलिंगा का कैप हुआ सस्ता, कपड़ों की दुकानों पर जुट रही भीड़
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :21 Mar 2016 4:47 AM (IST)
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बाजार पर चढ़ा होली का रंग बक्सर : ली पर्व को लेकर बाजार में फुटपाथी दुकानें सज गयी हैं और लोग होली की तैयारियों में जुट गये हैं. रेडिमेड कपड़े की दुकान हो या फिर बच्चों के कपड़े की दुकान, हर जगह भीड़ उमड़ रही है. रविवार की छुट्टी के कारण बड़ी संख्या में लोगों […]
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बाजार पर चढ़ा होली का रंग
बक्सर : ली पर्व को लेकर बाजार में फुटपाथी दुकानें सज गयी हैं और लोग होली की तैयारियों में जुट गये हैं. रेडिमेड कपड़े की दुकान हो या फिर बच्चों के कपड़े की दुकान, हर जगह भीड़ उमड़ रही है. रविवार की छुट्टी के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने खरीदारी की. न सिर्फ कपड़े की खरीदारी हुई, बल्कि फुटपाथ पर सजे पिचकारी, रंग और गुलाल की भी लोगों ने जम कर खरीदारी की. बढ़ती महंगाई के बावजूद इस बार के होली में सभी चीजों की कीमत कमोवेश पिछले साल की तरह ही है. पिछले साल और इस साल में सिर्फ रेडिमेड कपड़ों के दाम बढ़े हैं. शहर के पीपी रोड, यमुना चौक, गोलंबर, सिंडिकेट, मुख्य बाजार समेत कई अन्य स्थानों पर होली को लेकर छोटी-छोटी फुटपाथी दुकानें खुल गयीं हैं, जिसमें पिचकारी, रंग और गुलाल बिक रहे हैं.
इस बार होली में पिछले साल 250 रुपये में बिकनेवाली मलिंगा बाल की टोपी मात्र 100 रुपये में ही बिक रही है. इसी तरह अन्य टोपी के दामों में भी कोई खास फर्क नहीं पड़ा और 20 रुपये से लेकर 40 रुपये तक ही टोपी बाजार में विभिन्न रंगों की बिक रही है.
होली में न करें हुड़दंग, घातक हैं रासायनिक रंग, संभल कर खेलें
होली भारत का एक प्रमुख त्योहार है. इसमें लोग एक दूसरे को रंग लगाते हैं. ऐसे में रंगों की बिक्री भी बढ़ जाती है. इसका फायदा उठा कर मुनाफाखोर खतरनाक केमिकल का उपयोग कर रहे हैं. यह ऑक्सीडाइज्ड मेटल या इंडस्ट्रियल डाइ रंगों में मिलाये जाते हैं. ऐसे केमिकल जो मानव शरीर में जाने के बाइ तमाम समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं. नहाने के बाद यही जहरीले केमिकल नालियों के जरिये नदियों और कृषि योग्य भूमि में प्रवेश कर उन्हें दूषित करते हैं. तत्पश्चात सब्जियों, फसल एवं पेयजल में प्रवेश कर जाते हैं. इसके कारण तमाम खतरनाक बीमारियों को बल मिलता है.
घातक केमिकल युक्त रंगों से होनेवाली बीमारियां
लाल रंग : इसमें मरकरी सल्फाइट केमिकल होता है, जिससे त्वचा कैंसर हो सकता है. आंखों की रोशनी जाने और लकवा का भी खतरा बढ़ जाता है.
काला रंग : इसमें लेड ऑक्साइड केमिकल होता है, जिससे गुरदा पर असर पड़ता है. इसके अलावा त्वचा में एलर्जी भी हो सकती है.
नीला रंग : इसमें प्रसियन ब्लू केमिकल होता है, जिसमें त्वचा में एलर्जी और डर्मेटाइटिस हो सकती है.
हरा रंग : इसमें कॉपर सल्फेट और मैलाचाइट ग्रीन केमिकल होता है, जिससे आंख में एलर्जी, अस्थाई अंधापन, आंखों से पानी आना व आंखें लाल हो जाने जैसी समस्या होती है.
बैगनी रंग : इसमें क्रोमियम आयोडाइड केमिकल होता है, जिसमें ब्रांकियल अस्थमा व एलर्जी हो सकती है.
सिल्वर रंग : इसमें एल्युमीनियम ब्रोमाइड केमिकल होता है. इसमें कैंसर पैदा करनेवाले तत्व होते हैं.
ऐसे बनाएं प्राकृतिक रंग
सूखा हरा रंग : मेहंदी पाउडर और मक्के का आटा बराबर मात्रा में मिला कर हरा रंग बनाया जा सकता है.
सूखा पीला रंग : हल्दी व बेसन को मिला कर पीला रंग बनाया जाता है. इसमें हल्दी की मात्रा बेसन से दोगुनी होती है. वैसे पीला रंग फूलों से भी बनाया जाता है. इसमें अमलताश, गेंदा, यलो क्राइसेंथेम आदि फूलों की पंखुड़ियों का पाउडर बना कर उचित मात्रा में बेसन मिलाया जाता है.
सूखा लाल रंग : लाल चंदन पाउडर का प्रयोग लाल रंग बनाने में होता है. लाल गुड़हल के फूल के पाउडर को उचित मात्रा में आटे मिल मिला कर सूखा लाल रंग बनाया जाता है.
सूखा नीला रंग : जकरंदा के फूल का पाउडर या नीले गुड़हल के फूल का पाउडर का उपयोग नीला रंग बनाने में होता है.
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