एक साल बाद भी उपभोक्ता फोरम में नहीं शुरू हुआ काम
Updated at : 15 Nov 2017 4:44 AM (IST)
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मेंबर की नियुक्ति नहीं होने के चलते लंबित हैं मामले उच्च न्यायालय के आदेश का भी नहीं हुआ असर बक्सर कोर्ट : वर्ष 1986 में त्वरित गति से न्याय दिलाने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का गठन किया गया था. उक्त अधिनियम ऐसे लोगों को राहत दिलाने के लिए बनाया गया था जो ग्राहकों की […]
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मेंबर की नियुक्ति नहीं होने के चलते लंबित हैं मामले
उच्च न्यायालय के आदेश का भी नहीं हुआ असर
बक्सर कोर्ट : वर्ष 1986 में त्वरित गति से न्याय दिलाने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का गठन किया गया था. उक्त अधिनियम ऐसे लोगों को राहत दिलाने के लिए बनाया गया था जो ग्राहकों की श्रेणी में आते हैं. इसके बाद प्रत्येक जिले में उपभोक्ता अदालत बना दी गयी. उक्त अदालत में एक जज के अलावा दो सदस्यों की नियुक्ति की जाती है, जिसमें एक सदस्य महिला होती हैं. कोई भी आदेश पारित करने के लिए दो लोगों का होना आवश्यक है.
वर्ष 2015-16 में उपभोक्ता फोरम में सैकड़ों मामले निष्पादित किये गये. उस समय अध्यक्ष के पद पर सेवानिवृत्त अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश नारायण पंडित कार्यरत थे. जिनका अक्तूबर, 2016 में फास्ट ट्रैक कोर्ट मुंगेर में पदस्थापना के बाद उक्त पद रिक्त हो गया, जिसके बाद उपभोक्ता अदालत की कार्यवाही न्यायाधीश एवं सदस्यों की नियुक्ति नहीं होने के चलते पूर्णत: बंद हो गयी.
खाली है सदस्य का पद : अगस्त, 2017 में जिला उपभोक्ता फोरम में अध्यक्ष के पद पर नियुक्ति कर दी गयी. बावजूद इसके कोई कार्य नहीं शुरू हो सका. इसका कारण सदस्यों के पद का रिक्त होना है. बताते चलें कि उपभोक्ता फोरम में महिला सदस्य का पद वर्ष,2015 से ही रिक्त है. वहीं पुरुष सदस्य ने सितंबर, 2016 में अपना त्याग पत्र दे दिया, जिसके बाद सदस्यों की नियुक्ति नहीं की गयी. आश्चर्यजनक पहलू यह है कि सदस्यों के चयन के लिए नवंबर,2016 में ही साक्षात्कार लिया गया था लेकिन लालफीताशाही में अटक कर नियुक्ति की प्रक्रिया फंस गयी.
कई महत्वपूर्ण मामले हैं लंबित : स्पीडी ट्रायल के तर्ज पर निष्पादित करनेवाले उपभोक्ता अधिनियम से उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिल जाती थी, जिसका मुख्य कारण त्वरित गति से होनेवाला न्याय था. फोरम में कई तरह के मामले दाखिल किये गये हैं, जो काफी महत्वपूर्ण है. सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मामले बैंक एवं विद्युत के विपत्र से संबंधित हैं. कई उपभोक्ताओं के द्वारा विद्युत विभाग के विरुद्ध गलत विपत्र को लेकर मामला दर्ज कराया गया है, जिसमें अरुण कुमार सिंह एवं दीपक सिंह के मामले हैं. जिनको विभाग ने महज एक माह का विपत्र चार लाख एवं एक लाख का बतौर बकाया के रूप में थमा दिया था.
वहीं उनका दावा है कि कोई राशि बकाया नहीं है. वहीं डुमरांव निवासी राजकुमार अपनी पुत्री की शादी के लिए परेशान हैं. क्योंकि सहारा इंडिया जमा रकम का भुगतान नहीं हुआ था, जिसके बाद उनका मामला उपभोक्ता अदालत में लंबित है.
नियुक्ति के लिए उच्च न्यायालय ने भी दिया था आदेश : बिहार के कई उपभोक्ता अदालतों में कार्यवाही बंद होने को लेकर उच्च न्यायालय में भी रिट पिटीशन दाखिल किया गया था. याचिकाकर्ता ने न्यायालय से गुहार लगाते हुए कहा था कि बिहार के दो दर्जन उपभोक्ता अदालतों में अध्यक्ष या सदस्य नहीं रहने के चलते सुनवाई स्थगित पड़ी हुई है, जिसके चलते उपभोक्ताओं की परेशानी जटिल होती जा रही है. उक्त याचिका की सुनवाई के बाद माननीय उच्च न्यायालय ने सरकार को आदेश देते हुए निर्देशित किया था कि वो तत्काल अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति करें. बावजूद इसके उपेक्षित रवैये के चलते सरकार द्वारा वर्ष बीत जाने के बाद भी नियुक्ति नहीं की गयी.
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