ग्लेशियर पृथ्वी के थर्मामीटर, उनका संरक्षण मानव अस्तित्व के लिए जरूरी : प्रो सिद्धार्थ सिंह

Published by : Aditya Kumar Ravi Updated At : 21 May 2026 6:08 PM

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वक्तव्य देते कुलपति

Nalanda News: नव नालंदा महाविहार में 'बढ़ते तापमान वाली दुनिया में हिमनद' विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया. कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह और विशेषज्ञ हिमांशु कौशिक ने बदलते ग्लेशियरों, जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित पर्यावरणीय दोहन से मानव अस्तित्व पर मंडराते खतरों के प्रति आगाह किया.

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Nalanda News (राम विलास): विश्व पर्यावरण दिवस प्री-कैम्पेन के अंतर्गत नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय, नालंदा में गुरुवार को ‘बढ़ते तापमान वाली दुनिया में हिमनद : पृथ्वी के जमे हुए भंडारों से पर्यावरणीय संकेत’ विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में हिमालयी पर्यावरण एवं ग्लेशियर अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञ हिमांशु कौशिक ने हिमनदों की बदलती स्थिति, जलवायु परिवर्तन और उससे उत्पन्न पर्यावरणीय खतरों पर विस्तृत व्याख्यान दिया. कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने की.

ग्लेशियरों का लगातार पिघलना वैश्विक तापमान वृद्धि का स्पष्ट प्रमाण

अपने व्याख्यान में हिमांशु कौशिक ने कहा कि ग्लेशियर पृथ्वी के जलवायु तंत्र के महत्वपूर्ण संकेतक हैं. उनका लगातार पिघलना वैश्विक तापमान वृद्धि का स्पष्ट प्रमाण है. वैज्ञानिक उपग्रह चित्रों, तापमान परिवर्तन, बर्फ की मोटाई तथा जल प्रवाह के विश्लेषण के माध्यम से यह अध्ययन किया जाता है कि कोई ग्लेशियर स्थिर स्थिति में है या तेजी से पीछे हट रहा है. पिछले कुछ दशकों में हिमालयी ग्लेशियरों में लगातार कमी दर्ज की गई है, जिसका सीधा प्रभाव जल संसाधनों, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन पर पड़ रहा है.

लेक बर्स्ट जैसी घटनाएं बन रही हैं केदारनाथ जैसी विनाशकारी आपदाओं का कारण

उन्होंने ग्लेशियरों के अत्यधिक पिघलने से बनने वाली झीलों और ‘लेक बर्स्ट’ जैसी घटनाओं को गंभीर खतरा बताते हुए कहा कि जब ये झीलें अचानक टूटती हैं, तो विनाशकारी बाढ़ और बड़े पैमाने पर तबाही का कारण बनती हैं. इस संदर्भ में उन्होंने केदारनाथ त्रासदी, हिमाचल प्रदेश और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में हाल के वर्षों में हुई ग्लेशियर आपदाओं का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि अनियंत्रित पर्यावरणीय दोहन, जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप इन आपदाओं की तीव्रता बढ़ा रहे हैं.

विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना समय की सबसे बड़ी मांग: कुलपति

अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि ग्लेशियर पृथ्वी के ‘थर्मामीटर’ के समान हैं. उनका पिघलना केवल बर्फ का घटना नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और मानव अस्तित्व के लिए गंभीर चेतावनी है. विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है. यदि प्रकृति सुरक्षित नहीं रहेगी तो मानव समाज और अन्य जीवों का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा. उन्होंने बौद्ध दर्शन के प्रतीत्यसमुत्पाद सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि समस्त जीवन और प्रकृति परस्पर गहराई से जुड़े हुए हैं.

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों का नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का सामूहिक दायित्व

कुलपति ने कहा कि विज्ञान तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट कर चुका है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग आने वाले समय में जल संकट, पारिस्थितिक असंतुलन और प्राकृतिक आपदाओं को और गंभीर बना सकते हैं. पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों या वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का सामूहिक दायित्व है. उन्होंने वैश्विक जलवायु संधियों से पीछे हटने वाले शक्तिशाली देशों की अप्रत्यक्ष आलोचना करते हुए कहा कि विश्व समुदाय को समान रूप से प्रतिबद्ध होना होगा. कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रियंका कुमारी तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. तपस सरकार ने किया. इसमें शोधार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय सहभागिता की.

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