मिलावट ने छीनी नालंदा की मिठास, कभी देशभर में मशहूर थीं ये मिठाइयां, अब पहचान बचाने की जंग
Published by : Vivek Singh Updated At : 03 Jun 2026 9:39 AM
सांकेतिक तस्वीर
Nalanda News : नालंदा जिले की पारंपरिक मिठाइयां, जो कभी अपनी गुणवत्ता और स्वाद के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थीं, आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं. मिलावटखोरी, गुणवत्ता में गिरावट और बदलती उपभोक्ता पसंद के कारण कई ऐतिहासिक मिठाइयों की लोकप्रियता लगातार कम हो रही है.
Nalanda News : (कंचन कुमार) नालंदा जिले की पारंपरिक मिठाइयां, जो कभी अपनी गुणवत्ता और स्वाद के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थीं, आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं. मिलावटखोरी, गुणवत्ता में गिरावट और बदलती उपभोक्ता पसंद के कारण कई ऐतिहासिक मिठाइयों की लोकप्रियता लगातार कम हो रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो जिले की यह खाद्य विरासत धीरे-धीरे इतिहास बन सकती है.
राजभोग, रेवड़ी और पेड़ा की चमक पड़ने लगी फीकी
गिरियक का राजभोग, बिहारशरीफ की रेवड़ी, इस्लामपुर का लाई-मुकंद दाना और निचलंगज का पेड़ा कभी नालंदा की पहचान माने जाते थे. शादी-विवाह, त्योहार और सामाजिक आयोजनों में इन मिठाइयों की विशेष मांग रहती थी. लेकिन अब इनकी बिक्री और लोकप्रियता दोनों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है.
ब्रांडेड मिठाइयों ने बढ़ाई स्थानीय कारोबारियों की मुश्किलें
पारंपरिक मिठाई कारोबारियों का कहना है कि पहले उनके उत्पादों की मांग दूसरे जिलों और राज्यों तक रहती थी. अब उपभोक्ता बेहतर पैकेजिंग और शुद्धता के भरोसे के कारण ब्रांडेड मिठाइयों को प्राथमिकता देने लगे हैं. इसका सीधा असर स्थानीय दुकानदारों और कारीगरों की आय पर पड़ा है.
रेवड़ी और पेड़ा की घटती मांग से बढ़ी चिंता
तीन दशक पहले बिहारशरीफ की रेवड़ी और निचलंगज का पेड़ा क्षेत्र की पहचान हुआ करते थे. बाहर से आने वाले लोग भी इन मिठाइयों को विशेष रूप से खरीदकर ले जाते थे. लेकिन वर्तमान समय में इनकी बिक्री में आई गिरावट ने मिठाई व्यवसाय से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है.
मोरातालाब का खोवा बना नई पसंद
जहां पारंपरिक पेड़ा और खोवा की लोकप्रियता में कमी आई है, वहीं बिहारशरीफ के मोरातालाब क्षेत्र का खोवा उपभोक्ताओं की पहली पसंद बनकर उभरा है. ग्राहकों का मानना है कि यहां मिलने वाला खोवा अपेक्षाकृत अधिक शुद्ध और बेहतर गुणवत्ता वाला होता है.
बदल गया रेवड़ी का पारंपरिक स्वाद
पुराने कारीगरों के अनुसार पहले रेवड़ी तैयार करने में केवल शुद्ध चीनी, पारंपरिक मसाले और विशेष तकनीक का उपयोग किया जाता था. अब लागत कम करने और अधिक मुनाफा कमाने की होड़ में कई स्थानों पर निम्न गुणवत्ता की सामग्री और कृत्रिम तत्वों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे स्वाद और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं.
मिलावटखोरी पर निगरानी कमजोर होने के आरोप
मिठाई कारोबारियों और उपभोक्ताओं का आरोप है कि खाद्य सुरक्षा विभाग की नियमित जांच और सख्त कार्रवाई के अभाव में मिलावटखोरों का मनोबल बढ़ा है. इसका असर सीधे स्थानीय मिठाइयों की साख और बाजार पर पड़ा है. लोगों का कहना है कि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो कई पारंपरिक मिठाइयां बाजार से गायब हो सकती हैं.
सिलाव का खाजा अब भी बना हुआ है ब्रांड
जहां कई पारंपरिक मिठाइयां संघर्ष कर रही हैं, वहीं सिलाव का खाजा आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है. शादी-विवाह और विशेष अवसरों पर इसे उपहार स्वरूप देने की परंपरा आज भी कायम है. इसकी खास 52 परतों वाली बनावट और अनोखा स्वाद इसे अन्य मिठाइयों से अलग बनाता है.
सरकारी मान्यता मिलने के बाद बढ़ी मांग
दो वर्ष पहले भारत सरकार द्वारा उत्कृष्ट मिठाई का दर्जा मिलने के बाद सिलाव खाजा की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से इसकी पहुंच देश के विभिन्न हिस्सों तक हो गई है. इससे स्थानीय कारोबारियों को नया बाजार मिला है.
नकली खाजा बना नई चुनौती
खाजा कारोबारियों का कहना है कि कई बाजारों में सिलाव के नाम पर अन्य जगहों के उत्पाद बेचे जा रहे हैं. इससे असली सिलाव खाजा की पहचान और विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है. व्यापारियों ने ब्रांड संरक्षण और गुणवत्ता मानकों को लागू करने की मांग की है.
सांस्कृतिक विरासत को बचाने की जरूरत
खाद्य विशेषज्ञों का मानना है कि नालंदा की पारंपरिक मिठाइयां केवल खाद्य उत्पाद नहीं, बल्कि जिले की सांस्कृतिक पहचान भी हैं. इनके संरक्षण के लिए गुणवत्ता नियंत्रण, नियमित जांच, आधुनिक पैकेजिंग और प्रभावी मार्केटिंग की आवश्यकता है. साथ ही मिलावटखोरी पर सख्त कार्रवाई कर उपभोक्ताओं का विश्वास फिर से मजबूत करना होगा.
भविष्य की पहचान बचाने की चुनौती
यदि पारंपरिक मिठाइयों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां नालंदा की इस समृद्ध मिठास भरी विरासत को केवल इतिहास के पन्नों में ही पढ़ पाएंगी. आज जरूरत है कि प्रशासन, कारोबारी और उपभोक्ता मिलकर इस विरासत को बचाने की दिशा में प्रयास करें.
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लेखक के बारे में
By Vivek Singh
विवेक सिंह माता सीता की धरती और मिथिला का द्वार कहे जाने वाले समस्तीपुर जिले से आते हैं. वर्तमान में प्रभात खबर में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. इससे पहले #The_Newsdharma के साथ डिजिटल मीडिया, ग्राउंड रिपोर्टिंग , और न्यूज़ लेखन के क्षेत्र में कार्य करने का अनुभव रहा है. सामाजिक, राजनीतिक, शिक्षा, युवा, महिला सुरक्षा और जनता से जुड़े मुद्दों पर विशेष रुचि रखते हैं. सरल, तथ्यात्मक और प्रभावी लेखन शैली के माध्यम से पाठकों तक महत्वपूर्ण खबरें और मुद्दे पहुंचाने का निरंतर प्रयास करते हैं. NGO अमर शहीद बिपिन सिंह फाउंडेशन के साथ जुड़कर सामाजिक, स्वास्थ्य, पर्यावरण ,रोजगार और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर भी कार्य करने का अनुभव हैं.
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