मिलावट ने छीनी नालंदा की मिठास, कभी देशभर में मशहूर थीं ये मिठाइयां, अब पहचान बचाने की जंग

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Nalanda News: Adulteration has taken away the sweetness of Nalanda, these sweets were once famous across

सांकेतिक तस्वीर

Nalanda News : नालंदा जिले की पारंपरिक मिठाइयां, जो कभी अपनी गुणवत्ता और स्वाद के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थीं, आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं. मिलावटखोरी, गुणवत्ता में गिरावट और बदलती उपभोक्ता पसंद के कारण कई ऐतिहासिक मिठाइयों की लोकप्रियता लगातार कम हो रही है.

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Nalanda News : (कंचन कुमार) नालंदा जिले की पारंपरिक मिठाइयां, जो कभी अपनी गुणवत्ता और स्वाद के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थीं, आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं. मिलावटखोरी, गुणवत्ता में गिरावट और बदलती उपभोक्ता पसंद के कारण कई ऐतिहासिक मिठाइयों की लोकप्रियता लगातार कम हो रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो जिले की यह खाद्य विरासत धीरे-धीरे इतिहास बन सकती है.

राजभोग, रेवड़ी और पेड़ा की चमक पड़ने लगी फीकी

गिरियक का राजभोग, बिहारशरीफ की रेवड़ी, इस्लामपुर का लाई-मुकंद दाना और निचलंगज का पेड़ा कभी नालंदा की पहचान माने जाते थे. शादी-विवाह, त्योहार और सामाजिक आयोजनों में इन मिठाइयों की विशेष मांग रहती थी. लेकिन अब इनकी बिक्री और लोकप्रियता दोनों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है.

ब्रांडेड मिठाइयों ने बढ़ाई स्थानीय कारोबारियों की मुश्किलें

पारंपरिक मिठाई कारोबारियों का कहना है कि पहले उनके उत्पादों की मांग दूसरे जिलों और राज्यों तक रहती थी. अब उपभोक्ता बेहतर पैकेजिंग और शुद्धता के भरोसे के कारण ब्रांडेड मिठाइयों को प्राथमिकता देने लगे हैं. इसका सीधा असर स्थानीय दुकानदारों और कारीगरों की आय पर पड़ा है.

रेवड़ी और पेड़ा की घटती मांग से बढ़ी चिंता

तीन दशक पहले बिहारशरीफ की रेवड़ी और निचलंगज का पेड़ा क्षेत्र की पहचान हुआ करते थे. बाहर से आने वाले लोग भी इन मिठाइयों को विशेष रूप से खरीदकर ले जाते थे. लेकिन वर्तमान समय में इनकी बिक्री में आई गिरावट ने मिठाई व्यवसाय से जुड़े लोगों की चिंता बढ़ा दी है.

मोरातालाब का खोवा बना नई पसंद

जहां पारंपरिक पेड़ा और खोवा की लोकप्रियता में कमी आई है, वहीं बिहारशरीफ के मोरातालाब क्षेत्र का खोवा उपभोक्ताओं की पहली पसंद बनकर उभरा है. ग्राहकों का मानना है कि यहां मिलने वाला खोवा अपेक्षाकृत अधिक शुद्ध और बेहतर गुणवत्ता वाला होता है.

बदल गया रेवड़ी का पारंपरिक स्वाद

पुराने कारीगरों के अनुसार पहले रेवड़ी तैयार करने में केवल शुद्ध चीनी, पारंपरिक मसाले और विशेष तकनीक का उपयोग किया जाता था. अब लागत कम करने और अधिक मुनाफा कमाने की होड़ में कई स्थानों पर निम्न गुणवत्ता की सामग्री और कृत्रिम तत्वों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे स्वाद और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए हैं.

मिलावटखोरी पर निगरानी कमजोर होने के आरोप

मिठाई कारोबारियों और उपभोक्ताओं का आरोप है कि खाद्य सुरक्षा विभाग की नियमित जांच और सख्त कार्रवाई के अभाव में मिलावटखोरों का मनोबल बढ़ा है. इसका असर सीधे स्थानीय मिठाइयों की साख और बाजार पर पड़ा है. लोगों का कहना है कि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो कई पारंपरिक मिठाइयां बाजार से गायब हो सकती हैं.

सिलाव का खाजा अब भी बना हुआ है ब्रांड

जहां कई पारंपरिक मिठाइयां संघर्ष कर रही हैं, वहीं सिलाव का खाजा आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है. शादी-विवाह और विशेष अवसरों पर इसे उपहार स्वरूप देने की परंपरा आज भी कायम है. इसकी खास 52 परतों वाली बनावट और अनोखा स्वाद इसे अन्य मिठाइयों से अलग बनाता है.

सरकारी मान्यता मिलने के बाद बढ़ी मांग

दो वर्ष पहले भारत सरकार द्वारा उत्कृष्ट मिठाई का दर्जा मिलने के बाद सिलाव खाजा की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से इसकी पहुंच देश के विभिन्न हिस्सों तक हो गई है. इससे स्थानीय कारोबारियों को नया बाजार मिला है.

नकली खाजा बना नई चुनौती

खाजा कारोबारियों का कहना है कि कई बाजारों में सिलाव के नाम पर अन्य जगहों के उत्पाद बेचे जा रहे हैं. इससे असली सिलाव खाजा की पहचान और विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है. व्यापारियों ने ब्रांड संरक्षण और गुणवत्ता मानकों को लागू करने की मांग की है.

सांस्कृतिक विरासत को बचाने की जरूरत

खाद्य विशेषज्ञों का मानना है कि नालंदा की पारंपरिक मिठाइयां केवल खाद्य उत्पाद नहीं, बल्कि जिले की सांस्कृतिक पहचान भी हैं. इनके संरक्षण के लिए गुणवत्ता नियंत्रण, नियमित जांच, आधुनिक पैकेजिंग और प्रभावी मार्केटिंग की आवश्यकता है. साथ ही मिलावटखोरी पर सख्त कार्रवाई कर उपभोक्ताओं का विश्वास फिर से मजबूत करना होगा.

भविष्य की पहचान बचाने की चुनौती

यदि पारंपरिक मिठाइयों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां नालंदा की इस समृद्ध मिठास भरी विरासत को केवल इतिहास के पन्नों में ही पढ़ पाएंगी. आज जरूरत है कि प्रशासन, कारोबारी और उपभोक्ता मिलकर इस विरासत को बचाने की दिशा में प्रयास करें.

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विवेक सिंह

लेखक के बारे में

By विवेक सिंह

विवेक सिंह की डिजिटल मीडिया और जनसरोकारों से जुड़े विषयों में विशेष रुचि रही है. वे बिहार के मिथिला क्षेत्र के निवासी हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्षों से सक्रिय रूप से योगदान दे रहे हैं.

उन्होंने मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की पढ़ाई की है. शिक्षा के दौरान उन्होंने रिपोर्टिंग, समाचार लेखन, डिजिटल मीडिया, जनसंचार, फोटो जर्नलिज्म, मोबाइल जर्नलिज्म (MOJO) और मीडिया रिसर्च की गहन समझ विकसित की है. अध्ययन के दौरान उन्होंने इंटर्नशिप भी की, जहां उन्हें न्यूजरूम की कार्यप्रणाली, टीवी समाचार निर्माण, स्क्रिप्ट लेखन, विजुअल चयन, फील्ड रिपोर्टिग और प्रसारण प्रक्रिया को नजदीक से समझने का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ.

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इसके साथ ही वे NGO से जुड़कर सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं. स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता, युवा सशक्तिकरण, धार्मिक और जनकल्याण से जुड़े अभियानों में उनकी विशेष भागीदारी रही है. समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जागरूकता फैलाने और सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयासों में वे निरंतर योगदान देते रहे हैं.

वर्तमान में विवेक सिंह राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, रोजगार, खेल, अपराध, रियल-टाइम समाचारों, सामाजिक सरोकारों और समसामयिक विषयों से जुड़ी खबरों पर लेखन करते हैं. डिजिटल पत्रकारिता के साथ-साथ उन्हें SEO (Search Engine Optimization), कंटेंट प्लानिंग और ट्रेंड-आधारित समाचार लेखन की अच्छी समझ है. ब्रेकिंग न्यूज की पहचान, त्वरित कवरेज और कम समय में तथ्यपरक समाचार तैयार करना उनकी प्रमुख कार्यक्षमताओं में शामिल है.

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