नालंदा में खून की कमी से 80% बच्चे पीड़ित, हर दूसरी महिला को एनीमिया, नई रिपोर्ट में बदलेंगे हालात?

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नालंदा की सेहत की हकीकत. खून की कमी से 80% बच्चे पीड़ित, 42% बाल विवाह, हर दूसरी महिला एनीमिया की शिकार | Prabhat Khabar Network

नालंदा की सेहत की हकीकत. खून की कमी से 80% बच्चे पीड़ित, 42% बाल विवाह, हर दूसरी महिला एनीमिया की शिकार | Prabhat Khabar Network

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) की रिपोर्ट नालंदा जिले की स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक स्थिति पर गंभीर खुलासा करती है. जहां बच्चों और महिलाओं में एनीमिया का उच्च स्तर चिंता का विषय है, वहीं बाल विवाह और कुपोषण के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं. हालांकि, बिजली, स्वच्छ ईंधन और परिवार नियोजन जैसे क्षेत्रों में सुधार देखा गया है.

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NFHS Report Nalanda : नालंदा जिले की स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक स्थिति की सबसे व्यापक तस्वीर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-21) में सामने आई थी. रिपोर्ट ने जहां कई क्षेत्रों में सुधार के संकेत दिए, वहीं कई ऐसे आंकड़े भी उजागर किए जो आज भी चिंता का विषय हैं. पांच वर्ष से कम उम्र के हर 100 में 80 बच्चे खून की कमी से जूझ रहे हैं. हर 100 में 71 महिलाएं एनीमिया की शिकार हैं, जबकि 42 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले ही हो गया. दूसरी ओर बिजली, स्वच्छ ईंधन, परिवार नियोजन और संस्थागत प्रसव जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान (आईआईपीएस), मुंबई द्वारा कराए गए इस सर्वेक्षण का जिला स्तरीय सर्वे जुलाई 2019 से फरवरी 2020 के बीच किया गया था. हालांकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (2023-24) की राष्ट्रीय तथ्य-पत्रिका मई 2026 में जारी हो चुकी है, लेकिन बिहार और नालंदा की जिला स्तरीय रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है.

सबसे बड़ी चिंता. बच्चों और महिलाओं में एनीमिया

रिपोर्ट के अनुसार जिले में 6 से 59 माह के 80.3 प्रतिशत बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 में यह आंकड़ा 59 प्रतिशत था. यानी पांच वर्षों में स्थिति और गंभीर हुई है.

इसी तरह 15 से 49 वर्ष की 71 प्रतिशत महिलाएं, गैर गर्भवती 71.5 प्रतिशत महिलाएं तथा 61.7 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं भी खून की कमी से प्रभावित हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती है.

हर 100 में 43 बच्चे बौने, 47 कम वजन के

बाल कुपोषण के मामले में कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है. रिपोर्ट के अनुसार 42.6 प्रतिशत बच्चे बौने (स्टंटेड) हैं, जबकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 में यह आंकड़ा 54.1 प्रतिशत था.

इसके अलावा 46.7 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं तथा 27.8 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से दुबले हैं. इससे स्पष्ट है कि जिले में कुपोषण आज भी बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है.

बाल विवाह में मामूली कमी, फिर भी स्थिति गंभीर

रिपोर्ट के अनुसार 20 से 24 वर्ष आयु वर्ग की 42 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले हो गया था. हालांकि यह आंकड़ा पहले के 44.6 प्रतिशत से कुछ कम हुआ है, लेकिन अब भी राष्ट्रीय लक्ष्य से काफी दूर है.

सकारात्मक पक्ष यह है कि किशोरियों में मासिक धर्म के दौरान स्वच्छ साधनों के उपयोग में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. यह आंकड़ा 30.2 प्रतिशत से बढ़कर 64.4 प्रतिशत पहुंच गया है.

संस्थागत प्रसव बढ़ा, लेकिन जांच और पोषण में अभी लंबा सफर

रिपोर्ट के अनुसार 80.3 प्रतिशत प्रसव स्वास्थ्य संस्थानों में हुए, जबकि पहले यह 78.5 प्रतिशत था. पहली तिमाही में प्रसव पूर्व जांच कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत 40.2 से बढ़कर 64.7 हो गया.

हालांकि केवल 29.3 प्रतिशत महिलाओं ने गर्भावस्था के दौरान चार या अधिक प्रसव पूर्व जांच कराईं. वहीं 100 दिनों से अधिक आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां लेने वाली महिलाओं का प्रतिशत मात्र 16.4 रहा.

टीकाकरण में सुधार, लेकिन सभी बच्चों तक नहीं पहुंची सुविधा

जिले में 12 से 23 माह के 75.2 प्रतिशत बच्चों का पूर्ण टीकाकरण हुआ, जो पहले 65.2 प्रतिशत था. बीसीजी, पोलियो, हेपेटाइटिस-बी और पेंटावेलेंट टीकों के कवरेज में भी सुधार दर्ज किया गया.

हालांकि विटामिन-ए की खुराक पाने वाले बच्चों का प्रतिशत 61 से घटकर 44.1 रह गया, जो चिंता का विषय है.

बिजली पहुंची, लेकिन आधे घरों में अब भी स्वच्छ ईंधन नहीं

सर्वेक्षण के अनुसार जिले में 98.9 प्रतिशत घरों तक बिजली पहुंच गई है. यह राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के 69.7 प्रतिशत की तुलना में बड़ी उपलब्धि है.

वहीं बेहतर शौचालय सुविधा वाले घर 31.5 प्रतिशत से बढ़कर 52.5 प्रतिशत हुए हैं. इसके बावजूद केवल 41 प्रतिशत परिवार स्वच्छ ईंधन का उपयोग कर रहे हैं.

परिवार नियोजन में बड़ा बदलाव

परिवार नियोजन अपनाने वालों का प्रतिशत 30.5 से बढ़कर 72.3 पहुंच गया है. आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों का उपयोग भी 52.4 प्रतिशत तक पहुंचा है. गर्भनिरोधक साधनों की अपूर्ण आवश्यकता 23.1 प्रतिशत से घटकर 7.5 प्रतिशत रह गई है.

मधुमेह और उच्च रक्तचाप भी बढ़ती चुनौती

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 में पहली बार गैर-संचारी रोगों के आंकड़े भी शामिल किए गए. रिपोर्ट के अनुसार 13.6 प्रतिशत पुरुष और 11.1 प्रतिशत महिलाएं उच्च रक्त शर्करा या मधुमेह से प्रभावित हैं.

इसी तरह 14 प्रतिशत पुरुष तथा 13.4 प्रतिशत महिलाएं उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बदलती जीवनशैली के कारण इन बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ रहा है.

पुरुषों में हर दूसरा व्यक्ति करता है तंबाकू का सेवन

रिपोर्ट के अनुसार 15 वर्ष से अधिक आयु के 49.8 प्रतिशत पुरुष किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं. वहीं 21.5 प्रतिशत पुरुष शराब का सेवन भी करते हैं. महिलाओं में तंबाकू और शराब का सेवन अपेक्षाकृत बहुत कम दर्ज किया गया है.

अब राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 का इंतजार

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़े बताते हैं कि नालंदा में कई क्षेत्रों में सुधार हुआ है, लेकिन एनीमिया, बाल कुपोषण, बाल विवाह और गैर-संचारी रोग अब भी गंभीर चुनौती बने हुए हैं. चूंकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 की राष्ट्रीय रिपोर्ट जारी हो चुकी है, इसलिए जिले के स्वास्थ्य की वर्तमान तस्वीर जानने के लिए नालंदा की जिला स्तरीय रिपोर्ट का इंतजार है. विशेषज्ञों का मानना है कि नई रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पिछले पांच वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं और सरकारी योजनाओं का वास्तविक प्रभाव कितना पड़ा है.


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Kanchan Kumar

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By Kanchan Kumar

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