10 साल में 167% तक महंगी हुईं जरूरी दवाएं, मरीजों की बढ़ी परेशानी, दवा कंपनियों कर रही करोड़ों का कारोबार

दवा की दुकान में रखी दवाइयाँ
Bihar Sharif News: बिहारशरीफ में दवाओं की लगातार बढ़ती कीमतें अब आम लोगों के लिए बड़ी आर्थिक मुसीबत बनती जा रही हैं. पिछले दस वर्षों में कई जरूरी दवाओं के दाम 30 प्रतिशत से लेकर 167 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं.
Bihar Sharif News: (बिहारशरीफ से कंचन कुमार की रिपोर्ट)
बिहारशरीफ में दवाओं की लगातार बढ़ती कीमतें अब आम लोगों के लिए बड़ी आर्थिक मुसीबत बनती जा रही हैं. पिछले दस वर्षों में कई जरूरी दवाओं के दाम 30 प्रतिशत से लेकर 167 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं. सर्दी, खांसी और बुखार जैसी सामान्य बीमारियों का इलाज भी अब लोगों की जेब पर भारी पड़ने लगा है. गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार इलाज के बढ़ते खर्च से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं.
छोटी बीमारी का इलाज भी अब महंगा सौदा
पहले सामान्य सर्दी, खांसी और बुखार का इलाज 100 से 150 रुपये में हो जाता था, लेकिन अब यही खर्च कई गुना बढ़ चुका है. सेटिरिज़ीन, एंटीबायोटिक और नेजल स्प्रे जैसी आम दवाओं की कीमतों में भारी उछाल आया है. मरीजों का कहना है कि बीमारी वही है, लेकिन इलाज अब पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो गया है.
गरीब और मध्यम वर्ग पर दोहरी मार
ग्रामीण इलाकों में दवा और इलाज का बढ़ता खर्च परिवारों के लिए गंभीर संकट बन गया है. कई लोग इलाज के लिए गहने बेचने, जमीन गिरवी रखने या ऊंचे ब्याज पर कर्ज लेने को मजबूर हैं. स्वास्थ्य खर्च अब सीधे तौर पर आर्थिक असुरक्षा और गरीबी का बड़ा कारण बनता जा रहा है.
ब्रांडेड दवाओं के खेल में फंस रहे मरीज
कई मामलों में डॉक्टर मरीजों को महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं, जबकि उनके सस्ते जेनेरिक विकल्प भी बाजार में उपलब्ध रहते हैं. कुछ निजी क्लीनिकों में विशेष पैकेजिंग वाली दवाएं सीधे मरीजों को बेचने की शिकायतें भी सामने आई हैं. इससे मरीजों के पास सस्ती दवा चुनने का विकल्प सीमित हो जाता है.
बिना बिल दवा बिक्री पर उठ रहे सवाल
नालंदा जिले के कई मेडिकल स्टोरों पर बिना बिल दवा बेचने और मनमाने दाम वसूलने की शिकायतें मिल रही हैं. उपभोक्ताओं का आरोप है कि रसीद मांगने पर अतिरिक्त जीएसटी जोड़ दिया जाता है. औषधि निरीक्षण और निगरानी तंत्र की सुस्ती पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं.
हर महीने करोड़ों का दवा कारोबार
नालंदा जिले में लगभग 800 से 1200 मेडिकल दुकानें और 500 से 900 निजी क्लीनिक संचालित हो रहे हैं. प्रतिदिन 20 से 40 हजार मरीज निजी स्वास्थ्य सेवाओं का सहारा लेते हैं. अनुमान है कि जिले में हर महीने 30 से 80 करोड़ रुपये तक का दवा कारोबार हो रहा है.
जन औषधि और आयुष्मान योजना का सीमित असर
सरकार की जन औषधि योजना के तहत सस्ती दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, लेकिन इसका पूरा लाभ अभी आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा है. अधिकांश डॉक्टर अब भी ब्रांडेड दवाएं ही लिख रहे हैं और लोगों में जेनेरिक दवाओं को लेकर भरोसे की कमी बनी हुई है. आयुष्मान भारत योजना भी कई जगहों पर सीमित प्रभाव ही दिखा पा रही है.
नियम-कानून कमजोर, मरीजों पर बढ़ता बोझ
विशेषज्ञों का मानना है कि दवा बाजार में पारदर्शिता और सख्त निगरानी की कमी से मरीजों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है. एक ओर सरकार सस्ती दवाओं और मुफ्त इलाज की योजनाएं चला रही है, वहीं दूसरी ओर बाजार में महंगी दवाओं का दबदबा बना हुआ है. यही विरोधाभास अब आम लोगों की चिंता का बड़ा कारण बन गया है.
एलर्जी से एंटीबायोटिक तक दवाओं के दाम दोगुने
वर्ष 2015 की तुलना में 2026 तक सामान्य उपयोग की दवाओं की कीमतों में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. एलर्जी, सर्दी-खांसी, बुखार और एंटीबायोटिक दवाओं के दाम 40 प्रतिशत से लेकर 150 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं. मेडिकल दुकानदारों का कहना है कि कच्चे माल, ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत बढ़ने का असर सीधे दवाओं की कीमतों पर पड़ा है.
एलर्जी और सर्दी की दवाओं में भारी उछाल
सामान्य एलर्जी की दवा सेटिरिज़ीन की कीमत 2015 में 9 से 11 रुपये थी, जो अब बढ़कर 14 से 16 रुपये हो गई है. वहीं लेवोसेटिरिज़ीन 12 से 15 रुपये से बढ़कर 20 से 25 रुपये तक पहुंच गई है. फेक्सोफेनाडाइन और क्लोरफेनिरामीन जैसी दवाओं में भी 40 से 67 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
सर्दी-जुकाम की कॉम्बो दवाएं भी महंगी
सेटिरिज़ीन, पैरासिटामॉल और फिनाइलेफ्रिन वाली कॉम्बिनेशन दवा की कीमत 25 से 32 रुपये से बढ़कर 45 से 55 रुपये हो गई है. मॉन्टेलुकास्ट और लेवोसेटिरिज़ीन कॉम्बो की कीमत अब 80 से 100 रुपये तक पहुंच चुकी है. कोल्ड टैब जैसी ट्रिपल कॉम्बो दवाओं में भी 60 से 90 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है.
नेजल स्प्रे और ड्रॉप के दाम दोगुने
एलर्जी और सांस संबंधी समस्याओं में उपयोग होने वाले नेजल स्प्रे की कीमतों में सबसे अधिक बढ़ोतरी देखी गई है. फ्लुटिकासोन स्प्रे 90 से 110 रुपये से बढ़कर 250 से 300 रुपये तक पहुंच गया है. वहीं बुडेसोनाइड स्प्रे और सलाइन ड्रॉप की कीमतों में भी 125 से 167 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है.
एंटीबायोटिक दवाओं ने बढ़ाई चिंता
संक्रमण में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाओं की कीमतों में भी बड़ा उछाल आया है. अमोक्सिसिलिन 35 से 45 रुपये से बढ़कर 75 से 100 रुपये तक पहुंच गई है. अज़िथ्रोमाइसिन, डॉक्सीसाइक्लिन और सेफिक्साइम जैसी दवाओं के दाम भी करीब दोगुने हो गए हैं.
बुखार और दर्द की दवाएं भी जेब पर भारी
सामान्य बुखार और दर्द में इस्तेमाल होने वाली पैरासिटामॉल की कीमत 6 से 8 रुपये से बढ़कर 10 से 15 रुपये तक पहुंच गई है. आइबुप्रोफेन के दाम भी 12 से 16 रुपये से बढ़कर 24 से 30 रुपये हो गए हैं. आम लोगों का कहना है कि छोटी बीमारियों का इलाज भी अब महंगा होता जा रहा है.
बढ़ती कीमतों से मरीज परेशान
अनील कुमार, देव नारायण और पवन कुमार समेत कई दवा विक्रेताओं का कहना है कि अलग-अलग कंपनियों और ब्रांड के हिसाब से कीमतों में अंतर हो सकता है, लेकिन लगभग सभी दवाओं के दाम लगातार बढ़े हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार दवाओं की महंगाई का सबसे ज्यादा असर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है, जिनके लिए नियमित इलाज कराना मुश्किल होता जा रहा है.
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By साक्षी कुमारी
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