अब बिना कांटे का मखाना उगेगा, लागत घटेगी और कमाई बढ़ेगी

Updated at : 12 Apr 2026 8:51 AM (IST)
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Bihar news 12 April 2026

सांकेतिक तस्वीर

Bihar News: बिहार के जिस मखाने की दुनिया दीवानी है, उसे खेतों से निकालने में किसानों को लहूलुहान होना पड़ता है. अब मखाने की खेती की पूरी तस्वीर बदलने वाली है. बिहार कृषि विश्वविद्यालय की एक वैज्ञानिक ने ऐसी तकनीक खोज निकाली है, जिससे मखाने के डंठल से कांटे गायब हो जाएंगे.

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Bihar News: बिहार में अब मखाने की खेती में एक बड़ा बदलाव आने वाला है. बिहार कृषि विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक डॉ. रीमा कुमारी को केंद्र सरकार से अनुसंधान अनुदान मिला है, जिसके तहत बिना कांटे वाली मखाने की नई किस्म विकसित की जाएगी.

यह इनोवेशन खेती को आसान बनाने के साथ-साथ किसानों की लागत घटाने में मदद करेगा.

कांटों के ‘दर्द’ से आजाद होगा मखाना

बिहार का मखाना अब न केवल स्वाद और सेहत में अव्वल होगा, बल्कि इसकी खेती भी बेहद आसान होने जा रही है. अब तक मखाने के पौधों में मौजूद नुकीले कांटों के कारण कटाई और सफाई के दौरान मजदूरों को गंभीर चोटें आती हैं.

इसी चुनौती को देखते हुए बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर की वैज्ञानिक डॉ. रीमा कुमारी ने एक विशेष रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया है. इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य मखाने की ऐसी उन्नत किस्म विकसित करना है, जिसके डंठल और पत्तों पर कांटे नहीं होंगे.

DNA तकनीक से बदलेगी मखाने की जेनेटिक

मखाने को कांटों से मुक्त करने की यह प्रक्रिया लैब में डीएनए (DNA) तकनीक के जरिए पूरी की जाएगी. डॉ. रीमा कुमारी अपनी रिसर्च में उन विशिष्ट जीनों की पहचान कर रही हैं, जो इन नुकीले कांटों को उगाने के लिए जिम्मेदार होते हैं.

एक बार इन जीनों की पहचान हो जाने के बाद, जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से मखाने की नई संरचना तैयार की जाएगी. इससे न केवल मजदूरों को चोट लगने का डर खत्म होगा, बल्कि फसल की देखरेख भी आसान हो जाएगी.

लागत में आएगी कमी

मखाने की खेती में सबसे अधिक खर्च इसकी कटाई और कुशल मजदूरों पर होता है. कांटों की वजह से अब तक मशीनों का उपयोग नामुमकिन था, लेकिन बिना कांटों वाली किस्म आने के बाद हार्वेस्टर और आधुनिक मशीनों का रास्ता खुल जाएगा.

इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि कटाई के दौरान होने वाले नुकसान को भी न्यूनतम किया जा सकेगा. जब लागत घटेगी और पैदावार बढ़ेगी, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिहार के मखाने की प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता और बढ़ जाएगी.

बिहार की वैश्विक धमक

मखाना उत्पादन में बिहार का कोई सानी नहीं है. पूरी दुनिया का 80 प्रतिशत मखाना अकेले हमारे राज्य से आता है. दरभंगा, मधुबनी और पूर्णिया जैसे जिलों से निकलकर यह ‘सुपरफूड’ अब अमेरिका, यूरोप और अरब देशों की थाली तक पहुंच रहा है.

16 अगस्त 2022 को ‘मिथिला मखाना’ को मिले जीआई टैग ने इसे वैश्विक पहचान दी है. अब वैज्ञानिक स्तर पर हो रही यह नये इनोवेशन से बिहार के 10 जिलों के उन हजारों गांवों में समृद्धि आयेगी, जहां मखाना ही आजीविका का मुख्य आधार है.

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Pratyush Prashant

लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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