Lord Mahavir: भागलपुर की धरती से भगवान महावीर का था स्पेशल लगाव, जीवन बदल देता है उनका सिद्धांत
Published by : Paritosh Shahi Updated At : 10 Apr 2025 4:35 AM
Lord Mahavir: जैन धर्म के 24वें व अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर का अंग की धरती खासकर भागलपुर से गहरा लगाव था. इसी कारण एक नहीं, बल्कि तीन बार उनके चरण यहां पड़े. वह भी वर्षा काल में पड़नेवाले चातुर्मास में, जिन्हें जैन धर्म का पावन महीना माना गया है. चतुर्मास में उन्होंने जन-जन तक सत्य-अहिंसा का संदेश पहुंचाया.
Lord Mahavir, दीपक राव, भागलपुर: चंपापुरी उस समय भारत के प्राचीन सांस्कृतिक नगरों में एक था. 16 महाजनपदों में अंग महत्वपूर्ण था, जिसकी राजधानी चंपा थी. दिगंबर जैन सिद्धक्षेत्र मंत्री सुनील जैन ने बताया कि भगवान महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं, जिनकी जयंती 10 अप्रैल गुरुवार को है. पूरी दुनिया जयंती को लेकर उत्साहित हैं. सदियों से अंग प्रदेश भागलपुर, गौरवशाली इतिहास का साक्षी रहा है. यहां कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों का जन्म हुआ और कई महापुरुषों का आगमन हुआ, जिन्होंने भारतीय इतिहास और संस्कृति पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है.
भगवान महावीर ने यहां क्या-क्या किया
प्राचीन ग्रंथों में भगवान महावीर स्वामी के आगमन से जो तप साधना की गंगा यहां प्रवाहित हुई वह उल्लेख अद्भुत है. जैन विद्वान बालभद्र जैन लिखित और भारत वर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ कमेटी, मुंबई द्वारा प्रकाशित ग्रंथ भारत के दिगंबर जैन तीर्थ के द्वितीय भाग में भगवान महावीर के चंपा में आने का उल्लेख है. जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने वर्षों तक विभिन्न स्थानों का विहार करते हुए धर्मदर्शना दिया. इस अंग की धरती को तीन वर्षावास का सौभाग्य प्राप्त हुआ. इस धरती की सती चंदनवाला ने भगवान महावीर को आहारदान कराया.
सभी तीर्थंकरों का हो चुका है आगमन
बालभद्र जैन ने बताया कि जैन पुराणों में उल्लेख है कि 12वां पंचकल्याणक इस चंपानगरी में हुआ. साथ ही सभी 24 तीर्थंकरों का आगमन इस अंग की धरती पर हो चुका है. वे सही अर्थ में तीर्थंकर थे. तीर्थंकर का अर्थ होता है- भौतिक अस्तित्व के ऊपर संसार-समुद्र को पार करने के लिए सेतु का काम करनेवाला. आज भी भगवान महावीर के उपदेश उसी तरह शाश्वत हैं, जिस तरह सदियों पहले थे.
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अंग विहार के समय राजा थे दधिवाहन
सामाजिक कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल ने बताया कि उनके पिता दिवंगत मुकुटधारी अग्रवाल ने अपनी आत्मकथा इंद्रधनुष में भगवान महावीर का भागलपुर के चंपापुरी में तीन बार पधारने का वर्णन किया है. उस समय चंपा के राजा दधिवाहन थे. भगवान महावीर ने अपने विहार काल में दु:ख, संत्रास, क्लेश, पीड़ा और ताप से मुक्ति के लिए पांच व्रतों के पालन पर जोर दिया. इसमें सत्य, अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह व्रत शामिल है. उन्होंने कहा कि संसार में दु:ख का कारण है असीमित, अपरिमित इच्छा और परिग्रह की कामना. उन्होंने अहिंसा परमो धर्म और जियो और जीने दो का संदेश जन-जन को दिया.
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भगवान महावीर के प्रमुख सिद्धांत
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह भगवान महावीर के महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं. अहिंसा सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है. अहिंसा का अर्थ है किसी भी जीव के प्रति दया और करुणा का भाव रखना. सत्य बोलना और सत्य का पालन करना जीवन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है. अस्तेय का अर्थ है किसी और की वस्तु को बिना अनुमति के न लेना है. यह सिद्धांत हमें अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने और जीवन को सार्थक बनाने की शिक्षा देता है. परिग्रह का अर्थ है किसी भी वस्तु को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति न मानना.
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By Paritosh Shahi
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