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सेब की खेती कर वृंदावन के किसान ने लिखा नया अध्याय

Updated at : 02 Jun 2025 9:28 PM (IST)
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सेब की खेती कर वृंदावन के किसान ने लिखा नया अध्याय

मखाना, सिंघाड़ा,लीची,केला की खेती से बिहार की पहचान रही है, किन्तु खेती की विविधता के क्षेत्र में सेब की खेती कर बेगूसराय के वृन्दावन के किसान राजेश रंजन ने नया अध्याय जोड़ दिया है.

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नावकोठी. मखाना, सिंघाड़ा,लीची,केला की खेती से बिहार की पहचान रही है, किन्तु खेती की विविधता के क्षेत्र में सेब की खेती कर बेगूसराय के वृन्दावन के किसान राजेश रंजन ने नया अध्याय जोड़ दिया है.परम्परागत खेती के मिथ्यक को झुठलाते हुए हिमाचल प्रदेश एवं कश्मीर की तरह बिहार में भी 40 डिग्री सेल्सियस पर सेब की खेती कर किसान इतिहास रच रहे हैं. अब बाजारों में बेगूसराय का सेब भी दिखेगा.किसान राजेश रंजन सेब की विभिन्न प्रजातियों के लगभग तीन सौ पौधे लगाये हैं जो अब फल देना शुरू कर दिया है.उनका मानना है कि परम्परागत खेती से हटकर नगदी फसलों की ओर ध्यान देना जरूरी है.इससे आय में भी वृद्धि होती है तथा कृषि क्षेत्र में विविधता भी देखी जा रही है.विशेष बागवानी फसल के तहत राज्य के सात जिलों में बेगूसराय को भी पाइलॉट प्रोजेक्ट के तहत स्थान मिला है. प्रखंड के डफरपुर पंचायत के वृन्दावन के किसान राजेश रंजन को इस खेती का अवसर आवेदन के माध्यम से मिला. 8फरवरी 2022को लगभग तीन सौ पौधे सवा एकड़ खेत में लगाये गये हैं.उन्होंने बताया कि पिछले दो साल से सेवा की खेती कर रहे हैं.इस वर्ष खेती का तीसरा वर्ष है. इसमें हरमन 99 नस्ल,अन्ना,डोरसन गोल्ड वेरायटी के सेव के पौधे हैं.अन्ना और डोरसन गोल्ड पिछले साल ही लगाया गया है.बिहार सरकार के मुख्य सचिव के द्वारा सेव के पौधे एलॉट करवाया गये थे.किसान राजेश रंजन ने बताया कि 90 रुपये से 150 रुपये प्रति पौधे लगाये गये थे.इनमें जो पौधे सूखे उनकी जगह रिप्लेस किया गया.ड्रिप इरिगेशन के माध्यम से सिंचाई की जा रही है.दो बाई दो का गड्ढा खोदा जाता है.चालीस प्रतिशत जैविक खाद,साठ प्रतिशत मिट्टी से गड्ढे को भरा जाता है. फिर उस पर पौधे लगाये जाते हैं.फ़रवरी एवं मार्च में इन पौधों में फूल आ जाते हैं.जून जुलाई में पौधे में लगे फल टूटना शुरू हो जाता है.एक बीघा में सेव के पौधे लगाने में कुल खर्च पचास हजार रुपये के आसपास आते हैं.फिर सिंचाई,निकौनी,खाद ,सुरक्षा आदि में भी लगभग पचास हजार रुपये आ जाते हैं.अर्थात कुल एक लाख रुपये का खर्च पड़ता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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MANISH KUMAR

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