भवानंदपुर की दुर्गा माता क्षेत्र में आस्था का केंद्र

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 04 Oct 2019 12:54 AM

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वीरपुर : मातृशक्ति की उपासना और उनकी कृपा की कहानियां तो हम लोग पीढ़ी दर पीढ़ी से सुनते आ रहे हैं. लेकिन प्रखंड क्षेत्र के भवानंदपुर गांव में माता दुर्गा की सदियों से साधक द्वारा जो पूजा-अर्चना की जाती है वह पौराणिक विधान एवं परंपरा के अनुसार बिल्कुल ही अनोखा है. ऐसी मान्यता है कि […]

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वीरपुर : मातृशक्ति की उपासना और उनकी कृपा की कहानियां तो हम लोग पीढ़ी दर पीढ़ी से सुनते आ रहे हैं. लेकिन प्रखंड क्षेत्र के भवानंदपुर गांव में माता दुर्गा की सदियों से साधक द्वारा जो पूजा-अर्चना की जाती है वह पौराणिक विधान एवं परंपरा के अनुसार बिल्कुल ही अनोखा है. ऐसी मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से मां के दरबार में आते हैं उनकी मुरादें मां अवश्य पूरी करती हैं.

बताया जाता है कि सन 1680 से ही यहां माता दुर्गा की पूजा की परंपरा चली आ रही है. पूजा की तैयारियों को लेकर यहां न तो कोई कमेटी गठित है और न ही ग्रामीणों से एक रुपये चंदा की उगाही की जाती है. बल्कि बंगाली कायस्थ के एक परिवार एक वर्ष के पूजा का खर्च बारी-बारी से उठाते हैं.
मंदिर के पुजारी पंडित गौरीशंकर मिश्र बताते हैं कि ब्रिटिश सरकार द्वारा राजस्व वसूली के लिए पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के बेला ग्राम निवासी तीन सहोदर भाई दान सिंह, महीन सिंह एवं सुजान सिंह को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर भवानंदपुर गांव में भेजा. इन्हीं तीनों सहोदर भाइयों ने भवानंदपुर में देवी दुर्गा को स्थापित किया.
तब से लेकर आज तक उन्हीं तीनों भाइयों के वंशज बंगाली कायस्थ परिवार द्वारा विधान पूर्वक पूजा का आयोजन किया जा रहा है. जिउतिया के पारण के दिन से ही यहां मां दुर्गा की पूजा विधि -विधान पूर्वक शुरू हो जाती है. स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर की यह विशेषता है कि मंदिर में कोई लाइट या बिजली का बल्ब नहीं जलता है.
स्थानीय लोगों के अनुसार मंदिर में कई बार बल्ब जलाने का प्रयास किया गया लेकिन मिस्त्री बल्ब जला नहीं पाया.सप्तमी तिथि को मंदिर में मां की मूर्ति को प्रवेश करा कर चौबीस अखंड दीप जलाये जाते हैं. जो अनवरत रूप से दशमी तिथि तक जलते रहता है. बताया जाता है कि माता के इस दरबार जिन भक्तों की मन्नतें पूरी होती है वे नवमी तिथि को बलि भी देते हैं. निर्धारित समय पर मंदिर से प्रतिमा निकालने के बाद लगभग तीन किलोमीटर मीटर बूढ़ीगंडक में नौकायान के बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है.
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