मंदार तराई में ‘मोर अभ्यारण्य’ का सपना अधूरा, मोरों की मौत के बाद ठंडे बस्ते में गयी योजना

Published by : SHUBHASH BAIDYA Updated At : 20 Feb 2026 6:55 PM

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पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण को नयी पहचान देने की उम्मीद के साथ वर्ष 2022 में मंदार तराई में मोर अभ्यारण्य बनाने की पहल की गयी थी.

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संजीव पाठक, बौंसी. पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण को नयी पहचान देने की उम्मीद के साथ वर्ष 2022 में मंदार तराई में मोर अभ्यारण्य बनाने की पहल की गयी थी. वन विभाग की ओर से इसकी तैयारी भी शुरू कर दी गयी थी, लेकिन महज कुछ ही दिनों में यह महत्वाकांक्षी योजना दम तोड़ती नजर आई. तीन मोरों के साथ शुरू हुआ यह प्रयास दो मोरों की असमय मौत के बाद अधूरा रह गया और आज तक फाइलों में दबा पड़ा है.

15 दिनों में बिगड़ी स्थिति, मोरों की मौत

तत्कालीन डीएफओ के निर्देश पर तीन मोरों को मंदार स्थित फॉरेस्ट विभाग के परिसर में लाया गया था. योजना थी कि पहले इन्हें स्थानीय वातावरण में अनुकूल होने दिया जाए, फिर मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में विचरण के लिए छोड़ा जाए, लेकिन लाये जाने के लगभग 15 दिनों के भीतर ही दो मोर बीमार पड़ गये. उनकी हालत बिगड़ने पर इलाज के लिए भागलपुर ले जाया गया. बताया जाता है कि उपचार के बावजूद दोनों मोरों की मौत हो गयी. एकमात्र बचे मोर का भी कोई अता पता नहीं है. इसको लेकर कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है.

सवालों के घेरे में तैयारी और प्रबंधन

क्या मोरों को लाने से पहले पर्यावरणीय अनुकूलता की जांच की गयी थी. क्या पर्याप्त चिकित्सकीय निगरानी और देखरेख की व्यवस्था थी. क्या स्थानीय जलवायु और आहार की स्थिति का पूर्व आकलन हुआ था. वन विभाग की ओर से उस समय बड़े दावे किए गये थे, लेकिन मोरों की मौत के बाद योजना पर चुप्पी छा गयी. न तो किसी जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया गया और न ही दोबारा प्रयास की कोई ठोस पहल सामने आई.

समाजसेवी का दावा भी पड़ा ठंडा

जिले के एक कथित समाजसेवी ने भी मोर अभ्यारण्य बनाने का दावा किया था और इसे पर्यटन की दृष्टि से ऐतिहासिक कदम बताया था. हालांकि समय बीतने के साथ यह दावा भी फाइलों में सिमट कर रह गया. जमीनी स्तर पर कोई कार्य दिखाई नहीं दिया.

पर्यटन और पर्यावरण को मिल सकती थी नयी पहचान

मंदार क्षेत्र धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से पहले से ही प्रसिद्ध है. यहां मोर अभ्यारण्य बनने से न केवल जैव विविधता को बढ़ावा मिलता, बल्कि पर्यटकों के लिए भी यह आकर्षण का केंद्र बन सकता था. स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मिलने की भी उम्मीद थी. घटना को चार साल बीतने को हैं, लेकिन विभाग की ओर से न तो योजना के पुनरुद्धार की घोषणा हुई और न ही कोई वैकल्पिक पहल. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सही तैयारी और वैज्ञानिक तरीके से प्रयास किया जाय तो मंदार तराई में मोर अभ्यारण्य आज भी संभव है. फिलहाल, मंदार तराई में मोरों की चहचहाहट का सपना अधूरा है और सवाल यह है कि क्या यह योजना फिर कभी धरातल पर उतर पायेगी या हमेशा फाइलों में ही दबी रहेगी.

कहते हैं डीएफओ

इस मामले में डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर मनीष कुमार वर्मा ने बताया कि यहां पोस्टिंग के बाद विभाग के हर कार्यों पर उनकी नजर है. जल्द ही रुके अथवा बंद पड़े कार्यों को आरंभ कराया जायेगा.

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