तीन दिशाओं से उमड़ती आस्था, बौंसी में मिलता कांवरियों का महासंगम

Updated:
विज्ञापन
तीन दिशाओं से उमड़ती आस्था, बौंसी में मिलता कांवरियों का महासंगम<bha>;</bha> उत्तरवाहिनी गंगा का जल लेकर बाबा बासुकीनाथ की ओर बढ़ते श्रद्धालु

फोटो कैप्शन :कांवर यात्रा की फाइल तस्वीर | Prabhat Khabar Network

सावन में बौंसी में तीन दिशाओं से कांवरियों का महासंगम होता है। उत्तरवाहिनी गंगा का जल लेकर श्रद्धालु बाबा बासुकीनाथ धाम की कठिन पदयात्रा पूरी करते हैं।

विज्ञापन

संजीव पाठक, बौंसी सावन का महीना आते ही बिहार और झारखंड की धरती शिवभक्ति के रंग में रंग जाती है. इस दौरान बाबा बासुकीनाथ धाम की ओर बढ़ने वाली कांवर यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, परंपरा और उत्तरवाहिनी गंगा की महिमा का जीवंत प्रतीक बन जाती है. खास बात यह है कि बासुकीनाथ जाने वाले हजारों कांवरिया तीन अलग-अलग दिशाओं से यात्रा शुरू करते हैं और बांका जिले के बौंसी में आकर एक विशाल आस्था-संगम का रूप ले लेते हैं. तीनों यात्राओं का केंद्र है उत्तर वाहिनी गंगा इन तीनों यात्राओं का केंद्र उत्तरवाहिनी गंगा है, जिसे सनातन परंपरा में अत्यंत पुण्यदायिनी माना गया है. सबसे बड़ी कांवर यात्रा भागलपुर के बरारी घाट से शुरू होती है. यहां से श्रद्धालु गंगाजल भरकर रजौन और ढाका मोड़ के रास्ते बौंसी पहुंचते हैं. और बासुकीनाथ की ओर रवाना होते हैं. दूसरी ओर, सुल्तानगंज की पवित्र उत्तरवाहिनी गंगा से जल लेकर हजारों शिवभक्त शाहकुंड होते हुए बौंसी के रास्ते बासुकीनाथ पहुंचते हैं. तीसरा जत्था कहलगांव के प्रसिद्ध वटेश्वर स्थान से गंगाजल उठाता है और धोरैया के रास्ते बौंसी तक पहुंचता है. फिर बासुकीनाथ की ओर रवाना होता है. अलग-अलग मार्गों से चलने वाले ये श्रद्धालु जब बौंसी में मिलते हैं तो पूरा क्षेत्र ‘बोल बम’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयघोष से गूंज उठता है. तीन कांवर यात्राओं का संगम है बौंसी बौंसी केवल एक पड़ाव नहीं, बल्कि तीन कांवर यात्राओं का आध्यात्मिक संगम है. यहां से सभी कांवरिया एकजुट होकर झारखंड स्थित बाबा बासुकीनाथ धाम की ओर प्रस्थान करते हैं. मान्यता है कि उत्तरवाहिनी गंगा का जल बाबा बासुकीनाथ पर अर्पित करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इतिहासकार उदयेश रवि, पंडित अवधेश ठाकुर सहित अन्य विद्वानों का मत है कि श्रावण माह में कांवर चढ़ाने की परंपरा समुद्र मंथन के कारण है, जब महादेव ने कालकूट विष पीया था. वह स्थान मंदराचल पर्वत है. बौंसी को मंदराचल का निकटतम क्षेत्र माना जाता है. अतः यहां से जल लेकर गुजरनेवाले का पुण्य अधिक बढ़ जाता है. उत्तर वाहिनी गंगा का है विशेष महत्व धार्मिक दृष्टि से उत्तरवाहिनी गंगा का महत्व अत्यंत विशेष माना गया है. सामान्यतः गंगा की धारा दक्षिण और दक्षिण-पूर्व दिशा में बहती है, लेकिन कुछ स्थानों पर यह उत्तर की ओर मुड़ जाती है. ऐसी धारा को उत्तरवाहिनी गंगा कहा जाता है. शास्त्रों में उत्तरमुखी गंगा को मोक्षदायिनी और विशेष फल प्रदान करने वाली बताया गया है. हरिद्वार, काशी, सुल्तानगंज और कहलगांव के वटेश्वर स्थान ऐसे प्रमुख स्थल माने जाते हैं, जहां गंगा उत्तर दिशा की ओर बहती है. सुल्तानगंज में गंगा लगभग डेढ़ किलोमीटर तक उत्तरवाहिनी रहती है, जबकि कहलगांव से वटेश्वर स्थान तक करीब छह किलोमीटर लंबी उत्तरवाहिनी धारा बहती है. बरारी घाट की गंगा भी इसी विशेषता के कारण श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का केंद्र बनी हुई है. ंयही कारण है कि सावन में इन तीनों घाटों पर लाखों श्रद्धालु जल भरने पहुंचते हैं. बाबा बासुकीनाथ धाम का संबंध देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम से भी जोड़ा जाता है. मान्यता है कि बाबा बैद्यनाथ के दर्शन और जलाभिषेक के बाद बासुकीनाथ में पूजा करने से ही यात्रा पूर्ण मानी जाती है. इसी विश्वास के साथ हजारों कांवरिया उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल लेकर कठिन पदयात्रा करते हुए बाबा बासुकीनाथ के चरणों में अर्पित करते हैं. सावन में बरारी, सुल्तानगंज और वटेश्वर से निकलने वाली ये तीनों कांवर यात्राएं केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोकआस्था और सनातन परंपरा की अद्भुत मिसाल हैं. बौंसी में इनका मिलन श्रद्धा, एकता और भक्ति का ऐसा दृश्य प्रस्तुत करता है, जो हर वर्ष लाखों लोगों को आकर्षित करता है.

विज्ञापन
Sanjeev Kumar

लेखक के बारे में

By Sanjeev Kumar

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन