बालू खनन से तड़प रहे किसान, प्यासे हैं खेत

Published at :16 Jan 2016 9:07 PM (IST)
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बालू खनन से तड़प रहे किसान, प्यासे हैं खेत

बालू खनन से तड़प रहे किसान, प्यासे हैं खेत फोटो 16 बांका 4 नदी की तसवीर प्रतिनिधि, धोरैया कृषि प्रधान इलाके में तेज आर्थिक विकास का सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को उठाना पड़ता है. और प्रदूषण के कबप में इसके खतरे आम लोगों को झेलने पड़ रहे हैं. बांका जिले के लोगों के साथ भी […]

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बालू खनन से तड़प रहे किसान, प्यासे हैं खेत फोटो 16 बांका 4 नदी की तसवीर प्रतिनिधि, धोरैया कृषि प्रधान इलाके में तेज आर्थिक विकास का सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को उठाना पड़ता है. और प्रदूषण के कबप में इसके खतरे आम लोगों को झेलने पड़ रहे हैं. बांका जिले के लोगों के साथ भी ऐसा हो रहा है़ विकास के नाम पर सालों पहले से इस क्षेत्र में बालू खनन उद्योग के रूप में चल रहा है. इससे स्वास्थ्य से लेकर किसानों के खेती किसानी पर बुरा असर पड़ा. क्षेत्र में खेती आज भी नदी और इंद्र देवता पर निर्भर है़ लगातार चार दशकों से वैध अवैध तरीके से हो रहे बालू उठाव की वजह से सिंचाई के लिये कलकल कर बहती गेरुआ व चानन नदी खेतों से काफी नीचे हो गयी और खेत बीस से तीस फीट ऊपर खेतों में नदी का पानी नहीं पहुंच पाता है़ नतीजा अब वैसे किसान खेती छोड़कर अपनी जमीन में बगीचा लगा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर बालू बंदोबस्तधारी द्वारा नदी पर बने जमींदारी बांध को काट कर रास्ता बनाया जा रहा है़ तेजी से काटे जा रहे बालूू से बांध कमजोर होने लगा है़ बांध के क्षतिग्रस्त होने से बाड़ के समय फसल व गांव दोनों बर्बाद होने की आशंका से किसान कांप रहे हैं. – पारंपरिक सिंचाई व्यवस्था हुई ध्वस्तजिले में बहती गेरुआ, चानन, चीर, सुखनियां, मिरचिनी आदि नदियों का जुड़वा डांड व सिंधा के माध्यम से सीधे खेतों तक होता था़ पूर्व में सीधे नदियों से खेतों का पटवन होता आया़ व्यवस्था इतनी सुदृड़ रुप से ब्रिटिस इंजिनियरों द्वारा बनाई गयी थी कि नदी में हेलाव पानी आते ही पानी खेतों में स्वत: ही चली जाती थी़ इसे मिशली षैराबी यानि पारंपरिक सिंचाई व्यवस्था कहा गया था़ लेकिन बालू खनन उद्योग के कारण नदियों से बालू का अत्यधिक खनन होने से यह पूरी तरह ध्वस्त हो गयी़ एक ओर जहां भूमिगत जल का स्तर घटता गया वहीं तालाब, कुंआ, नहर, चापानल सब सूखते चले गये़- भविष्य की है विकट चेतावनीसामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक व बालू कारोबारियों की गठजोड़ के कारण किसान तबाह हो गये़ वहीं दूसरी तरफ लाखों के राजस्व की चोरी के साथ सड़कों की दशा भी देखने लायक है़ नदी, वन, जलाशय, पहाड़ और समुंद्र जैसे प्राकृतिक संसाधन देश के नागरिकों की साझा संपदा हैं और इसके संरक्षण और देखरेख की जिम्मेवारी प्रशासन की है़ प्रशासन एक न्यास के रूप में जनता, विशेष रूप से भावी पीड़ी की ओर से प्राकृतिक संसाधनों का रक्षक है़ बहरहाल, स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक संपदा के अनाधिकृत तरीके से दोहन और अतिक्रमण की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती है़ं सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक क्षेत्र के लोग यह तो मानते हैं कि जो कुछ भी बिगड़ रहा है वह सब आज विकास प्रणाली का ही परिणाम है़ हालांकि वह अपनी सुविधाओं पर अंकुश लगाने को तैयार नहीं है़ फलस्वरुप खेतों की सुरक्षा तथा आर्थिक उन्नति से किसान वंचित होते जा रही हैं.

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