बांका के पुराने मंदिरों में आज भी शोध के लिए संभावनाएं
Author Prabhat khabar digital desk
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बांका : अंग प्रदेश का बांका जिला पौराणिक व ऐतिहासिक धरोहरों में धनी है. अलबत्ता, मंदार व झरना से लेकर प्रत्येक पहाड़ व पुराने मंदिर में आज भी शोध के लिए अपार संभावनाएं छिपी हैं. समय-समय पर पुरातत्वविद व शोधकर्ता के माध्यम से शोध की एक लंबी क्रांति चली है. वहीं, इस कड़ी में पिछले […]
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बांका : अंग प्रदेश का बांका जिला पौराणिक व ऐतिहासिक धरोहरों में धनी है. अलबत्ता, मंदार व झरना से लेकर प्रत्येक पहाड़ व पुराने मंदिर में आज भी शोध के लिए अपार संभावनाएं छिपी हैं. समय-समय पर पुरातत्वविद व शोधकर्ता के माध्यम से शोध की एक लंबी क्रांति चली है. वहीं, इस कड़ी में पिछले कई वर्षों से फुल्लीडुमर सीओ यहां की पौराणिक धरोहरों में छिपी ऐतिहासिक प्रसिद्धि को ढूंढ़ने में जुटे हुए हैं. अबकी बार सीओ सतीश कुमार ने दावा किया है कि शंभूगंज प्रखंड अंतर्गत भरसीला स्थित मंदिर में वैदिक कालीन शिवलिंग है, जिसे विशिष्ट शिवलिंग कहते हैं. कहा कि यह आज भी दक्षिण भारत में पाये जाते हैं. परंतु, इस वक्त में ऐसे मिले शिवलिंग अनेक पौराणिक मान्यताओं को प्रामाणित करता है.
क्या है इस शिवलिंग का महत्व
पुरातत्वविद सह सीओ सतीश की मानें तो यह विशिष्ट शिवलिंग है. शिवलिंग अंडाकार है. मध्य अष्टकोण है. जबकि आधार चार कोण-सा है. आध्यात्मिक भाषा में नीचे के हिस्से को ब्रह्मपीठ, मध्य को विष्णु पीठ और शीर्ष को शिव कहते हैं. यानी, इस शिवलिंग में तीनों देवताओं का संगम है. उनका कहना है कि रावण शिव का बहुत बड़ा भक्त था. जो विशिष्ट शिवलिंग की पूजा करता था. इसी वजह से दक्षिण भारत से लेकर श्रीलंका में ऐस शिवलिंग पाया जाता हैं.
बांका सीओ सह पुरातत्वविद सतीश कुमार ने कहा कि अंग क्षेत्र की यह धरती पुरानी परंपरा, जीवनशैली व धरोहरों के लिए धनी है. वैदिक, हड़प्पा, मौर्य काल जैस स्वर्म समय के प्रमाण मिलते है. अब तक शोध के अनुसार सभी काल में शिव की पूजा हुई है. भरतशीला में अद्भुत शिवलिंग मिलने से यह पुष्ट होता है. मयमतम ग्रंथ के अनुसार विशिष्ट शिवलिंग की पूजा हीरा व जवाहरात सभी होती थी. जिससे साबित होता है कि भरतसीला में एक समय स्वर्णयुग रहा होगा.
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