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इवा के मजार पर कल होगी विशेष प्रार्थना सभा, तैयारी पूरी

Updated at : 23 Dec 2025 6:14 PM (IST)
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इवा के मजार पर कल होगी विशेष प्रार्थना सभा, तैयारी पूरी

रक्षा देवी के रूप में होती है पूजा

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रक्षा देवी के रूप में होती है पूजा

दाउदनगर. पटना मेन कैनाल (नहर) पर सिपहां लख के पास स्थित इवा के मजार पर 25 दिसंबर (गुरुवार) को विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया जायेगा. इसकी सभी तैयारियां पूरी कर ली गयी हैं. मजार परिसर और उसके आसपास साफ-सफाई सहित अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं की गयी हैं. खास बात यह है कि 25 दिसंबर को आयोजित होने वाली यह विशेष पूजा-अर्चना या प्रार्थना सभा का क्रिसमस से कोई संबंध नहीं है. इस मजार पर इवा की पूजा रक्षा देवी के रूप में की जाती है. आयोजन का नेतृत्व कर रहे दाउदनगर महाविद्यालय, दाउदनगर के सेवानिवृत्त व्याख्याता प्रो गणेश प्रसाद गुप्ता ने बताया कि ब्रिटिश काल में जब नहर में नावों का संचालन होता था, तब नाव को पानी में उतारने से पहले नाविक इवा के मजार पर रक्षा देवी के रूप में पूजा करते थे. समय के साथ ग्रामीण संस्कृति में इवा को रक्षा देवी के रूप में मान्यता मिलती गयी और आज भी 25 दिसंबर को बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं.

25 दिसंबर की तिथि का महत्व

प्रो गणेश प्रसाद गुप्ता ने बताया कि 25 दिसंबर की तिथि के चयन के पीछे भी विशेष कारण है. उन्होंने बताया कि 25 दिसंबर 1968 को उन्होंने यह संकल्प लिया था कि जिस मजार की अवधि 100 वर्ष पूरी होगी, वहां विशेष आयोजन किया जायेगा. 26 दिसंबर 1979 को जब वे सिपहां लख स्थित इवा के मजार पर पहुंचे, तो देखा कि मजार के 100 वर्ष पूरे हो चुके थे. मजार पर अंकित था-इन मेमोरियल इवा, संत इवाइन मिक्शन 1879. इसके बाद वर्ष 1983 में उनके घर पुत्री का जन्म हुआ. पुत्री के जन्म के उपलक्ष्य में 25 दिसंबर 1983 से उन्होंने इवा के मजार पर विशेष पूजा-अर्चना की शुरुआत की, जो आज तक निरंतर जारी है.

कौन थी इवा

प्रो गुप्ता ने बताया कि इवा सिपहां लख में पदस्थापित एक जूनियर इंजीनियर की पुत्री थी. 11 वर्ष की आयु में सिपहां लख में गिरने से इवा का निधन हो गया था. इसके बाद जूनियर इंजीनियर ने नहर के किनारे स्थित खाली भू-भाग में इवा को दफनाया था. उस समय आवागमन का मुख्य साधन नाव हुआ करता था. प्रो गुप्ता ने बताया कि उस समय उनकी कोई संतान नहीं थी. आम लोगों की आस्था और मान्यताओं से प्रेरित होकर वे भी इवा के मजार पर श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने लगे. इसके परिणामस्वरूप वर्ष 1983 में उनकी पुत्री का जन्म हुआ, जिनका नाम उन्होंने इवा रखा. इस प्रकार बीते 42 वर्षों से यह आयोजन लगातार होता आ रहा है. इवा का मजार अब आम लोगों की आस्था का केंद्र बन चुका है. हर वर्ष श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है और यह आयोजन अब मेला का रूप ले चुका है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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