औरंगाबाद में मक्के की फसल ने बदली किसानों की तकदीर, खेतों में लहलहाती फसल से बढ़ी उम्मीद

Aurangabad News: औरंगाबाद नगर जहां एक ओर देश के कई हिस्सों में खराब मौसम और पानी की कमी से जूझते किसान निराशा में कदम उठा रहे हैं.
Aurangabad News: औरंगाबाद नगर जहां एक ओर देश के कई हिस्सों में खराब मौसम और पानी की कमी से जूझते किसान निराशा में कदम उठा रहे हैं, वहीं मदनपुर प्रखंड के दक्षिण उमगा और नीमा आजन पंचायत के किसान खेती के तौर-तरीके बदलकर अपनी नई पहचान बना रहे हैं. यहां के किसान अब पारंपरिक फसलों की जगह मक्का की खेती को अपनाकर न केवल अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी सशक्त हो रहे हैं. यही वजह है कि धान, अरहर और गेहूं के लिए प्रसिद्ध यह इलाका अब मक्का उत्पादन का हब बनता जा रहा है. कम पानी में बेहतर उत्पादन बना आकर्षण कुछ वर्ष पहले तक इस क्षेत्र के किसान धान, अरहर और गेहूं की खेती को प्राथमिकता देते थे. लेकिन मौसम की बेरुखी और सिंचाई संकट के कारण इन फसलों में मुनाफा कम और घाटा ज्यादा होने लगा.
ऐसे में किसानों ने विकल्प के रूप में मक्का की खेती को अपनाया, जो कम समय, कम पानी और कम लागत में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा देती है. आज उत्तरी व दक्षिणी उमगा सहित नीमा आजन पंचायत में बड़े पैमाने पर मक्का की खेती हो रही है. तकनीक और बिजली ने दी नई राह कभी नक्सल प्रभावित रहे इन इलाकों में अब विकास की नई तस्वीर उभर रही है.सिंचाई की समस्या से निपटने के लिए किसान पंपिंग सेट का उपयोग कर रहे हैं. साथ ही बिजली सुविधा मिलने से खेती और आसान हो गई है. पहले जहां लोग रोजगार के लिए पलायन को मजबूर थे, वहीं अब खेती के जरिए अपनी किस्मत बदलने में जुटे हैं.
कर्ज लेकर शुरू की खेती
कर्ज लेकर शुरू की खेती, अब उम्मीदों की फसल किसानों का कहना है कि पहले उनके पास खेती के लिए न तो पर्याप्त पूंजी थी और न ही कोई सहयोग करने वाला. मजबूरी में कर्ज लेकर खेती शुरू की, लेकिन अब मक्का की अच्छी फसल ने उम्मीद जगा दी है. किसानों के अनुसार, समय पर बुवाई, निराई-गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण के बाद प्रति एकड़ 35 से 40 क्विंटल तक उत्पादन मिल रहा है. हालांकि इस बार मौसम के कारण मक्का की खेती कुछ कम हुई है, लेकिन भविष्य में बड़े पैमाने पर खेती करने की योजना है.
सरकारी योजनाओं का नहीं मिल रहा लाभ
सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने से नाराजगी योगेंद्र भुईया, पूरन यादव, उदय मेहता समेत अन्य किसानों का कहना है कि उन्हें सरकारी योजनाओं का समुचित लाभ नहीं मिल पाता. खाद और बीज के लिए भटकना पड़ता है और कृषि योजनाएं जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच रही हैं. संसाधनों की कमी के कारण कई किसान खेती से दूरी बना रहे हैं. कुल मिलाकर, बदलते दौर में मदनपुर के किसान मक्का की खेती के जरिए आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं और क्षेत्र को नई पहचान दिला रहे है.
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