लाखों रुपये की लागत से बना जिम बंद, व्यवस्था पर उठा सवाल

Published at :15 Sep 2016 8:13 AM (IST)
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लाखों रुपये की लागत से बना जिम बंद, व्यवस्था पर उठा सवाल

उपेक्षा. संसाधनों की कमी के कारण नहीं निखर रही खिलाड़ियों की प्रतिभा औरंगाबाद सदर : वीआइपी जिले के श्रेणी में शामिल औरंगाबाद में सीमित संसाधन प्रतिभाओं की राह में बाधक बना हुआ है. यहां एथलेटिक्स व कुश्ती, पावर लिफ्टिंग के खिलाड़ियों को संसाधन व सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती हैं, जो इनकी प्रतिभा के प्रदर्शन में […]

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उपेक्षा. संसाधनों की कमी के कारण नहीं निखर रही खिलाड़ियों की प्रतिभा
औरंगाबाद सदर : वीआइपी जिले के श्रेणी में शामिल औरंगाबाद में सीमित संसाधन प्रतिभाओं की राह में बाधक बना हुआ है. यहां एथलेटिक्स व कुश्ती, पावर लिफ्टिंग के खिलाड़ियों को संसाधन व सुविधाएं उपलब्ध नहीं होती हैं, जो इनकी प्रतिभा के प्रदर्शन में एक बड़ी बाधा है. कहा जा सकता है कि, जिले के खिलाड़ी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं. संसाधनों की कमी के कारण ये खेल जगत में पिछड़ रहे है. शहर में बाकी हर सुविधाओं को बहाल किया जा रहा है, पर खिलाड़ियों को उनके कौशल विकास में मदद नहीं पहुंचायी जा रही है. राष्ट्र और राज्य स्तर पर जिले का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ी सुविधाओं को लेकर काफी चिंतित रहते हैं.
जो न केवल खिलाड़ियों के मनोबल को कमजोर करता है, बल्कि जिले के लिये भी एक बदनसीबी है. यहां खिलाड़ी संसाधनों की कमी से पिछड़ जाते हैं, जबकि अगर इन्हें जिले में बेहतर प्रैक्टिस के लिये संसाधन और जगह उपलब्ध कराया जाये तो, वे निश्चित ही राष्ट्र स्तर पर कीर्तिमान स्थापित कर सकते हैं. लेकिन, हालत यह है कि दौड़ में शामिल होने वाले प्रतिभागी सड़कों पर दौड़ते हैं और कुश्ती के खिलाड़ी जगह के अभाव में खेतों में प्रैक्टिस करते हैं. यही नहीं, ऐसे कई क्षेत्र के खिलाड़ी हैं, जो जगह और संसाधन के अभाव में अपना अभ्यास जैसे-तैसे कर रहे हैं.
बाहरी अधिकािरयों के निरीक्षण के वक्त ही खुलता है जिम का ताला : खिलाड़ी सोनू निगम, राजेश कुमार, उदय तिवारी, गोलू सिंह, मो जावेद, काजू , सोनू कुमार कहते है कि औरंगाबाद के सिन्हा कॉलेज में खिलाड़ियों के लिये हाल ही में एक जिम छात्रों के आग्रह पर खोला गया. लाखों रुपये की लागत से सिन्हा कॉलेज में खुला जिम खिलाड़ियों को नहीं सौंपा गया.
इस नये जिम में हमेशा ताला लटका रहता है. जब कोई बाहर की कॉलेज का निरीक्षण करने यहां आती है, तो ही इसका ताला खुलता है. पहलवान उदय तिवारी बताते हैं कि शहर के इनडोर स्टेडियम के पीछे अगर जिला प्रशासन थोड़ी जगह उपलब्ध कर दें, तो जिले के खिलाड़ियों का अभ्यास सुधर सकता है. इधर, धावक सोनू कुमार कहते हैं कि दौड़ने के लिये गेट स्कूल का मैदान अच्छा है, लेकिन बरसात के दिनों में पानी जम जाने के कारण सड़कों पर दौड़ का अभ्यास जारी रखना पड़ता है.
खिलाड़ियों की सुविधा से संबंधित जानकारी लेने के लिये जब जिले के खेल पदाधिकारी कुमार पंकज से संपर्क करने की कोशिश की गयी तो उनके मोबाइल पर घंटी होने के बावजूद वे फोन नहीं उठा सके.
इनडोर स्टेडियम में नहीं मिलती जगह
शहर के गेट स्कूल के समीप स्थापित इनडोर स्टेडियम सिर्फ बैंडमिंटन के खिलाड़ियों के लिये सुरक्षित है.यहां दूसरे प्रतिभागियों को घुसने की अनुमति नहीं मिली हुई है. जबकि, यहां पावर लिफ्टिंग और वेट लिफ्टिंग के खिलाड़ियों के लिये जिम उपलब्ध है, लेकिन उस पर सिर्फ बैडमिंटन खिलाड़ियों का कब्जा बना हुआ है. औरंगाबाद शहर के पावर लिफ्टिंग चैंपियन सोनू निगम, कुश्ती के खिलाड़ी उदय तिवारी, धावक सोनू कुमार कहते हैं कि इनडोर स्टेडियम में इन्हें अभ्यास के लिये अनुमति नहीं दी जाती. कई बार जिले के खेल पदाधिकारी से मिल कर वे अपनी समस्याओं को उनके समक्ष रखे हैं, लेकिन फिर भी इन्हें कोई सुविधाएं उपलब्ध नहीं करायी गयी. अपने खर्च पर प्रतियोगिता में शामिल होते हैं और जैसे-तैसे अभ्यास किया करते हैं.
राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में हो चुके हैं शामिल
जिले में खिलाड़ियों के लिये संसाधनों की कोई व्यवस्था नहीं रहते हुए भी उक्त खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में जैसे-तैसे अभ्यास कर भाग ले चुके हैं और जिले का नाम भी रौशन किया है. पटना ,आरा , बोधगया, पठानकोट, नागपुर, रायपुर, जमशेदपुर, दिल्ली, कोलकता सहित अन्य जगहों पर आयोजित होने वाले प्रतियोगिता में ये खिलाड़ी शामिल हो चुके हैं. ये कहते हैं की कीट की सुविधा, प्रतियोगिता में शामिल होने का खर्च और अन्य सुविधाएं नहीं मिलने के बावजूद भी औरंगाबाद जिले का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं.
सोनू निगम और उदय तिवारी की प्रतिभा को देखते हुए खेल संघ ने इन्हें जिले का कोच भी बनाया है. ये अपने स्तर से पिछले वर्ष 2015 में खेल प्रतिभा का आयोजन भी कर चुके हैं. सोनू निगम फिलहाल एक प्रतियोगिता में शामिल होने के दौरान अत्यधिक भार उठा लेने से घायल भी हैं. जो अपने दर्द का इलाज पटना और गया के चिकित्सक से करा रहे हैं, लेकिन इनका दर्द बांटने वाला कोई नहीं.
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