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अरवल के दोनों विस क्षेत्रों में कांटे की टक्कर

Updated at : 15 Oct 2015 1:31 AM (IST)
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अरवल के दोनों विस क्षेत्रों में कांटे की टक्कर

निर्भय पटना : अरवल जिले के चुनावी दंगल में इस बार बाजी किसके हाथ होगी, यह सवाल सिर्फ जिले के ही नहीं बल्कि पूरे राज्य की नजर लगी है. कभी नरसंहारों से को लेकर चर्चित रहे अरवल में माहौल बदला है. सत्ता पर काबिज होने के लिए यहां काटें की लड़ाई है. जिले के दोनों […]

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निर्भय

पटना : अरवल जिले के चुनावी दंगल में इस बार बाजी किसके हाथ होगी, यह सवाल सिर्फ जिले के ही नहीं बल्कि पूरे राज्य की नजर लगी है. कभी नरसंहारों से को लेकर चर्चित रहे अरवल में माहौल बदला है. सत्ता पर काबिज होने के लिए यहां काटें की लड़ाई है. जिले के दोनों विधानसभा क्षेत्रों में एनडीए और महागंटबंधन के बीच कांटे की टक्कर है. अरवल में भाजपा के चितरंजन कुमार का कब्जा रहा है. तीसरा मोरचा यहां भी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की जीतोड़ कोशिश कर रहा है.

अरवल सीट में भाजपा के सीटिंग विधायक चितरंजन कुमार की सीधी टक्कर राजद के प्रत्याशी शिवचरण यादव और माले के प्रत्याशी महानंद से होती दिख रही है. वहीं, कुर्था में जदयू के सीटिंग विधायक सत्यदेव कुशवाहा को रालोसपा के अशोक वर्मा के साथ-साथ कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व निर्दलीय प्रत्याशी रामजतन सिन्हा पूरी टक्कर दे रहे हैं. अरवल और कुर्था सीट पर किनकी जीत सुनिश्चित होगी, यह तो 16 अक्तूबर को वोटिंग के बाद आठ नवंबर मतगणना के बाद ही साफ हो सकेगा.

अरवल जिले में अरवल और कुर्था दो विधानसभा क्षेत्र ही हैं. इस बार के चुनाव में क्षेत्र में विकास के साथ-साथ जातिय समीकरण भी हावी दिख रहा है. 2010 के विधानसभा चुनाव में अरवल सीट से भाजपा प्रत्याशी चितरंजन कुमार जीते थे, जबकि दूसरे नंबर पर माले के प्रत्याशी आये थे. अरवल में मुख्य रूप से भूमिहार जाति व यादव जाति के बीच टक्कर है. यहां कोइरी जाति निर्णायक भूमिका में रहती है. यह जाति जिनके पक्ष में गयी, उनकी जीत सुनिश्चित हो जाती है.

कुर्था में कोइरी जाति सीधी टक्कर में होती है. उसका टक्कर यादव व भूमिहार समेत अन्य जातियों से होता है. जदयू ने इस बार कोइरी समाज से ही प्रत्याशी को खड़ा किया है. कुर्था विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामजतन सिन्हा भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में हैं. उन्हें पार्टी की ओर से टिकट नहीं मिला तो उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और निर्दलीय खड़े हो गये हैं. यहां भी दिलचस्प मुकाबला होने वाला है. उधर, अरवल जिले की समस्याएं अपनी जगह हैं.

कभी नरसंहार के लिए बदनाम, अब शांति

अरवल व कुर्था विधानसभा सीट पहले जहानाबाद जिले में आती थी. 20 अगस्त 2001 को अरवल जिले की स्थापना हुई और अरवल के साथ-साथ कुर्था विधानसभा क्षेत्र इस जिले में आ गया.

अरवल के जिला बदलने के बाद फरवरी 2005, नवंबर 2005 और 2010 का विधानसभा चुनाव हुआ है. अरवल जब जहानाबाद जिले में था तो यहां सबसे बड़ा नरसंहार हुआ था. लक्ष्मणपुर बाथे, शंकर बिगहा और नारायणपुर नरसंहार यहीं हुए थे. कई लोगों की इसमें जाने गयी थीं. जिला बनने की वजह भी जनसंहार था.

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