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रनरेट बढ़ने पर भी दबाव में नहीं आते हैं एमएस धौनी

Updated at : 18 Apr 2018 1:00 AM (IST)
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रनरेट बढ़ने पर भी दबाव में नहीं आते हैं एमएस धौनी

II संजय मांजरेकर II कुछ दिन पहले हमें एक हारनेवाली टीम की ओर से आइपीएल की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक देखने को मिली. यह टी-20 प्रारूप में महेंद्र सिंह धौनी की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से भी एक थी. चेन्नई को मैच जीतने के लिए आखिरी पांच ओवर में 76 रन की दरकार थी. इस […]

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II संजय मांजरेकर II
कुछ दिन पहले हमें एक हारनेवाली टीम की ओर से आइपीएल की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक देखने को मिली. यह टी-20 प्रारूप में महेंद्र सिंह धौनी की सर्वश्रेष्ठ पारियों में से भी एक थी. चेन्नई को मैच जीतने के लिए आखिरी पांच ओवर में 76 रन की दरकार थी. इस प्रारूप में चमत्कारिक प्रदर्शन की संभावना के बीच यह एक नामुमकिन जैसा लक्ष्य था, लेकिन धौनी उसी मशहूर कथन पर भरोसा करते हैं कि नामुमकिन कुछ भी नहीं होता. मुझे चैंपियन खिलाड़ियों को अपने स्तर का प्रदर्शन करते हुए देख कर बहुत रोमांच महसूस होता है.
धौनी इस तरह की पारियां उतनी निरंतरता से अब नहीं खेल रहे हैं, जैसा कि खेला करते थे. वह बड़े शॉट उस तरह से नहीं लगा पा रहे हैं, जैसे कि लगाया करते थे. मगर उनका दिमाग बिल्कुल वैसा है, जैसा हुआ करता था, जिसकी वजह से वे खेल के ऊंचे मुकाम हासिल करने की ओर निरंतर देख रहे होते हैं.
कोई भी अन्य खिलाड़ी सबसे पहले यह सुनिश्चित करता कि इस तरह के हालात पैदा ही न हो, जिसकी वजह से हार का ठीकरा उसके सिर फोड़ा जाये. ऐसे में वह अपने जोड़ीदार पर यह जिम्मेदारी डाल देता, क्योंकि उसे खुद की क्षमताओं पर भरोसा नहीं होता.
या फिर वह इस अंदाज में बड़े शॉट खेलने की कोशिश करता कि ​शॉट लगा, तो ठीक वरना वह आउट हो जाता और अंतिम ओवरों के इस दबाव का सामना आनेवाले बल्लेबाज को करना पड़ता. मगर धौनी ऐसे नहीं हैं. वह हमेशा मोर्चे से अगुआई करना पसंद करते हैं और विपक्षी टीम पर दबाव बनाये रखते हैं. लुकाछिपी का खेल खेलना धौनी का अंदाज नहीं है. रन रेट बढ़ने के बावजूद धौनी कभी दबाव यातनाव में नहीं आते.
(आइपीएल)
तब भी नहीं जब पारी के आखिरी 5 ओवर ही बचे हों, क्योंकि वह जानते हैं कि आखिरी दो ओवरों में गेंदबाज गलती करेंगे और खराब गेंदबाजी पर रन लुटाएंगे. वो इसलिए क्योंकि वह जानते हैं कि गेंदबाज भी इन हालात में दबाव में होते हैं. यही वो जगह है जहां के धोनी किंग हैं. इन दो ओवरों में धोनी की सोच और क्षमताओं की ताकत छिपी है. हम सोचते हैं कि दो ओवर हैं, मगर धोनी सोचते हैं कि 12 गेंदें हैं. हम सोचते हैं कि यह बहुत कम गेंदें हैं, मगर धोनी सोचते हैं कि यह बहुत ज्यादा हैं. हम सोचते हैं कि दो ओवरों में 30 रन बनाना मुश्किल है, मगर धोनी सोचते हैं कि 3 छक्के लगाना पर्याप्त है, इसके अलावा इधर—उधर एक चौका लग जाएगा और बाकी के रन विकेटों के बीच तेज भागकर बनाए जा सकते हैं.
और हां, उन्हें विश्वास है कि वे गेंदबाजी की तुलना में कम दबाव में हैं, इसलिए वह हमेशा खुद को एक विजेता होने का विश्वास दिलाते हैं. मगर सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जब वह असफल होते हैं, तो कंधे हिलाते हुए तुरंत आगे बढ़ जाते हैं, यही बात उन्हें चैंपियनों में खास बनाती है.
(टीसीएम)
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