अखंड सौभाग्य के लिए मई 2026 में कब रखा जाएगा वट सावित्री व्रत? यहां जानें पूजा विधि और महत्व
वट सावित्री व्रत 2026
Vat Savitri Vrat 2026: वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए यह व्रत सुहागिन महिलाएं रखती हैं. यह व्रत मई 2026 में किस दिन रखा जाएगा, पूजा का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा और किस विधि से वट सावित्री व्रत करने पर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होगा, आइए विस्तार से जानते हैं-
Vat Savitri Vrat 2026: साल 2026 में वट सावित्री व्रत 16 मई 2026 दिन शनिवार को रखा जाएगा. महावीर पंचांग के अनुसार, यह व्रत हर वर्ष ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि पर सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखती हैं. इस दिन महिलाएं व्रत रखकर वट वृक्ष (बरगद) की विधि-विधान से पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं. धार्मिक मान्यता है कि वट सावित्री व्रत पति को संकटों से रक्षा प्रदान करता है तथा परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखने का प्रतीक माना जाता है.
वट सावित्री व्रत तिथि?
वट सावित्री व्रत की तिथि: 16 मई 2026 दिन शनिवार
अमावस्या तिथि प्रारंभ: 15 मई 2026 को सुबह 03 बजकर 51 मिनट पर
अमावस्या तिथि समाप्त: 16 मई 2026 की रात 01 बजकर 37 मिनट तक
16 मई के दिन का शुभ समय (मुहूर्त)
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 03 बजकर 39 मिनट से 04 बजकर 21 मिनट तक
अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11 बजकर 19 मिनट से 12 बजकर 13 मिनट तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 02 बजे से 02 बजकर 54 मिनट तक
16 मई के दिन का अशुभ समय
राहुकाल: सुबह 08 बजकर 25 मिनट से 10 बजकर 05 मिनट तक
यमगण्ड: दोपहर 01 बजकर 27 मिनट से 03 बजकर 07 मिनट तक
गुलिक काल: सुबह 05 बजकर 04 मिनट से 06 बजकर 44 मिनट तक
अखंड सौभाग्य और लंबी आयु
सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छा स्वास्थ्य और सुख समृद्धि के लिए यह व्रत निर्जला या फलाहार रहकर करती हैं. महावीर पंचांग में दी गयी जानकारी के अनुसार इस साल 16 मई दिन शनिवार को स्नान दान श्राद्ध की अमावस्या तथा प्रदोष अमावस्या में वटसावित्री व्रत का समापन होगा. वटसावित्री व्रत को वरगदाई भी कहते हैं. इस दिन महिलाएं सौभाग्य के लिए वटवृक्ष की 108 बार या यथाशक्ति कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं. आज शनिवार युक्त श्रीशनिदेव की जयंती भी मनायी जाएगी.
पौराणिक महत्व
माता सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे ही यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस पाए थे, इसलिए यह व्रत पति की रक्षा के संकल्प का प्रतीक है. वट (बरगद) वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है, इसलिए इसकी पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख और स्थिरता आती है. इस दिन महिलाएं सज-धजकर वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं और धागा लपेटकर अपने सुहाग की रक्षा की प्रार्थना करती हैं. यह व्रत महिलाओं की पति के प्रति अटूट निष्ठा और समर्पण को दर्शाता है. इस व्रत के पालन से परिवार में खुशहाली बनी रहती है.
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By Radheshyam Kushwaha
राधेश्याम कुशवाहा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से MJ (मास्टर ऑफ जर्नलिज्म) की शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत भोपाल से प्रकाशित राज एक्सप्रेस समाचार पत्र से की. इसके बाद उन्होंने समय जगत, राजस्थान पत्रिका और हिंदुस्तान जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं. वर्तमान में वे प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में धर्म, अध्यात्म एवं राशिफल डेस्क पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में 13 वर्षों का अनुभव रखने वाले राधेश्याम कुशवाहा को ज्योतिष शास्त्र, पंचांग गणना, ग्रह गोचर, नक्षत्र परिवर्तन, व्रत-त्योहारों की तिथियों तथा शुभ मुहूर्तों का गहन ज्ञान है. अपनी विशेषज्ञता के आधार पर वे धर्म-अध्यात्म और राशिफल से जुड़ी सटीक, तथ्यपरक एवं विश्वसनीय खबरें लिखते हैं. धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में उनकी विशेष रुचि है. इसके अलावा राजनीति, अपराध और प्रेरणादायक (पॉजिटिव) विषयों पर लेखन में भी उनकी गहरी रुचि है.
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