सतुआन पर्व : परंपरा, स्वास्थ्य और आस्था का अनोखा संगम

Updated:
विज्ञापन

आज मनाया जा रहा है सतुआन पर्व

Satuaan 2026: सतुआन पर्व बिहार-झारखंड की खास परंपरा है, जिसमें सत्तू, कच्चा आम और दान-पुण्य का महत्व है. यह पर्व आस्था के साथ-साथ स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ा हुआ है.

विज्ञापन

Satuaan 2026: जैसे ही सूरज की तपिश बढ़ने लगती है और खेतों से नई फसल घर पहुंचती है, वैसे ही झारखंड और बिहार के घरों में एक खास सुगंध फैल जाती है—सत्तू, मुड़ और कच्चे आम की. इसी लोकपरंपरा को सतुआन (सत्तूआनी) पर्व कहा जाता है, जिसे आज पूरे क्षेत्र में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार, मंगलवार सुबह 11:45 बजे सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करेंगे, हालांकि इस पर्व का पुण्यकाल सूर्योदय से ही प्रभावी माना गया है.

विज्ञापन

पूजा-विधि और धार्मिक मान्यताएं

इस पावन अवसर पर लोग प्रातःकाल स्नान कर भगवान विष्णु सहित अन्य देवी-देवताओं की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं. पूजा में सत्तू, मीठे फल, मुड़, कच्चा आम (टिकोला), खीरा, ककड़ी और पंखा अर्पित किया जाता है. इसके बाद इन वस्तुओं का दान किया जाता है और परिवार के साथ प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. पंडितों के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा एवं दान करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है.

परंपरा में छिपा स्वास्थ्य का विज्ञान

सतुआन पर्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य और जीवनशैली से भी गहराई से जुड़ा हुआ है. यह पर्व नई फसल के स्वागत के साथ-साथ गर्मी के मौसम की शुरुआत का संकेत देता है.

इस समय खेतों से नया चना घर आता है, जिससे सत्तू तैयार किया जाता है. सत्तू की तासीर ठंडी होती है, जो शरीर को गर्मी से राहत देती है और लंबे समय तक सुरक्षित भी रहती है. कच्चे आम और गुड़ के साथ सत्तू का सेवन शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ संतुलन भी बनाए रखता है. यही कारण है कि इस मौसम में इसका सेवन परंपरा का अहम हिस्सा बन गया है.

कुलदेवता पूजा और लोक परंपराएं

सतुआन के दिन घर-घर में कई विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं. सुबह महिलाएं बच्चों के सिर पर ठंडा पानी डालकर उन्हें आशीर्वाद देती हैं. मान्यता है कि इससे पूरे वर्ष शरीर में शीतलता बनी रहती है और बीमारियों से रक्षा होती है.

शाम के समय लोग पेड़-पौधों में पानी डालते हैं ताकि वे भीषण गर्मी में सूख न जाएं. एक घड़े में पानी भरकर उसमें छोटा छेद कर सूत लगाया जाता है, जिससे पानी धीरे-धीरे टपकता रहता है. इसे जीव-जंतुओं की प्यास बुझाने और घर में सुख-शांति बनाए रखने का प्रतीक माना जाता है.

साथ ही कुलदेवता की पूजा का भी विशेष महत्व होता है, जिसमें आटा, सत्तू, आम, ठंडे पेय और पंखा अर्पित किया जाता है.

ये भी पढ़ें: मेष संक्रांति पर भारत में रंग-बिरंगे त्योहार, जानें बैसाखी से बिहू तक की परंपराएं

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण और सावधानियां

आयुर्वेद के अनुसार सत्तू शरीर को ठंडक प्रदान करता है और इसमें उच्च मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जो पाचन तंत्र के लिए लाभकारी है. यह गर्मी के मौसम में ऊर्जा बनाए रखने में भी सहायक होता है.
हालांकि, गठिया, यूरिक एसिड या सायटिका जैसी समस्याओं से ग्रसित लोगों को सत्तू का सेवन सावधानी से करना चाहिए. वहीं, कफ और खांसी की समस्या वाले लोगों को भी सीमित मात्रा में ही इसका सेवन करना उचित माना जाता है. इस प्रकार सतुआन पर्व आस्था, परंपरा और स्वास्थ्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है.

विज्ञापन

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola