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janmashtami 2020: सत्संग बिन मैं मिलता नहीं, जानिए सत्संग को लेकर क्या कहते हैं भगवान श्रीकृष्ण

Updated at : 08 Aug 2020 9:47 AM (IST)
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janmashtami 2020: सत्संग बिन मैं मिलता नहीं, जानिए सत्संग को लेकर क्या कहते हैं भगवान श्रीकृष्ण

janmashtami 2020: हमें अपने हृदय के द्वारों को खोलना है, जहां प्रभु विराजमान हैं और सहज में, सरलता से दर्शन प्राप्त होते हैं. हमारे अंदर आनंद का सागर है, उसमें गोता लगाना है और यह मात्र सत्संग के प्रभाव से संभव है. श्री मद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं, सत्संग के समान संसार में मुझे वश में करने का अन्य कोई उपाय नहीं है. यहां तक कि योग, तप, तपस्या, व्रत, यज्ञ, तीर्थ, यम-नियम भी सत्संग के समान वश में करने में असमर्थ हैं. यह बात एक युग की नहीं, बल्कि सभी युगों की है.

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janmashtami 2020: हमें अपने हृदय के द्वारों को खोलना है, जहां प्रभु विराजमान हैं और सहज में, सरलता से दर्शन प्राप्त होते हैं. हमारे अंदर आनंद का सागर है, उसमें गोता लगाना है और यह मात्र सत्संग के प्रभाव से संभव है. श्री मद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं, सत्संग के समान संसार में मुझे वश में करने का अन्य कोई उपाय नहीं है. यहां तक कि योग, तप, तपस्या, व्रत, यज्ञ, तीर्थ, यम-नियम भी सत्संग के समान वश में करने में असमर्थ हैं. यह बात एक युग की नहीं, बल्कि सभी युगों की है. सत्संग के प्रभाव से ही बलि, बाणासुर, जाम्बावान, गजेंद्र, वृत्तासुर, ब्रज की गोपियां मुझे प्राप्त कर सके हैं. इन लोगों ने न तो वेदों का स्वाध्याय किया था और न ही तपस्या, केवल सत्संग के प्रभाव से ही मुझे प्राप्त हो गये थे. यहां तक कि ब्रज के पशु, गायें, कपिला, नाग, यमलाजरुन वृक्ष आदि मूढ़ थे, किंतु सत्संग के कारण इनका भी कल्याण हुआ और वे कृत्य-कृत्य हो गये.

एक उदाहरण है, एक व्यक्ति एक गांव में जा रहा था तो रास्ते में श्मसान भूमि से गुजरते वक्त उसने एक विचित्र बात देखी कि वहां पत्थर की शिलालेख पर मृतक की आयु लिखी थी. आश्चर्य यह था कि किसी पर आयु आठ माह तो किसी पर सात वर्ष, किसी पर 15 साल तो किसी पर 21. इससे ज्यादा आयुवाला मृतक कोई नहीं था. तो उसने सोचा कि इस गांव में लोग अल्पायु में ही मर जाते हैं. सबकी अकाल मृत्यु ही होती होगी. जब वह गांव के भीतर गया तो लोगों ने खूब सेवा सत्कार आदर किया और वह वहीं रहने लगा. लेकिन उसके भीतर यह भय सताने लगा कि वहां रहने पर उसकी भी जल्दी ही मौत हो सकती है. इसलिए उसने वह गांव छोड़ने का निश्चय किया और वापिस चलने लगता है, तो गांव वालों ने पूछा-क्या हमसे कोई गलती हुई या परेशानी है? इतनी जल्दी, अभी चार रोज ही हुए आप गांव छोड़कर क्यों जा रहे हैं.

तब उस व्यक्ति ने अपने मन की आशंका बतायी कि यहां के लोग ज्यादा नहीं जीवित रहते इसलिए मुझे यह भय सता रहा है कि मैं भी कहीं जल्दी न मृत्यु को प्राप्त हो जाऊं! श्मशान भूमि पर देखी शिलालेख का भी जिक्र किया. तब सभी हंस पड़े और लोगों ने बताया कि हमारे गांव में एक नियम है. जब कोई व्यक्ति सोने के लिए बिस्तर पर जाता है तो सबसे पहले वह यह हिसाब लगाता है कि उसने कितना समय सत्संग में बिताया, कितना समय अच्छे कार्यो में सेवा की और प्रतिदिन एक डायरी में लिख लेते हैं. मृत्यु होने पर वह डायरी निकाली जाती है और फिर उसके जीवन के उन सभी घंटों को जोड़ा जाता है और उसके आधार पर ही उसकी आयु निकाली जाती है. यही आयु सही मायने में है और उसे शिलालेख पर लिख दिया जाता है.

अर्थात व्यक्ति का जितना समय सत्संग में बीता, सेवा-भजन में बीता, वही तो उसके जीवन का सर्वश्रेष्ठ सार्थक समय है और वही उसकी उम्र है. सत्संग की महिमा है ही निराली. इसलिए संत कबीर कह रहे हैं-‘‘जो सुख साधु-संग में, वह वैकुंठ न होय।’’ साधु भी सच्चा होना चाहिए तभी तो सत्संग का प्रभाव जीवन में पड़ता है, अन्यथा ‘मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा वाले ढोंगी-पाखंडी साधुओं से भला क्या लाभ? जिसका तन-मन-वस्त्र प्रभु-प्रेम, प्रभु-स्वरूप व आनंद के रंग में रंग गया है, वही साधु है, जिनकी वाणी सीधे हृदय-द्वार पर दस्तक देती है और हृदय गद-गद होकर झूमने लगता है, आनंद-विभोर हो जाता है, ऐसे सच्चे साधु-महात्मा संत सद्गुरु का मिलना बहुत बड़े सौभाग्य का विषय है.

‘भेष देख मत भूलिए, पूछ लीजिए ज्ञान’’ अक्सर हम लोग भेष देखकर झूठे साधुओं के चक्कर में पड़ कर अपना सब कुछ गंवा देते हैं. विवेक की आंखे खोलो, ज्ञान द्वारा सच्चे साधु-संत-गुरु की पहचान करनी चाहिए. और आपका अंतःकरण यह पहचान बतायेगा. मन-बुद्धि की क्षमता नहीं है, सच्चे साधु को पहचानने की सत्संग की महिमा है कि आपको कोई कर्मकांड करने की जरूरत नहीं और न ही भक्ति के उन साधनों का उपयोग करना है. जिन्हें हम आज कर रहे हैं, बल्कि हृदय के द्वारों को खोलना है, जहां प्रभु विराजमान हैं और सहज में, सरलता से दर्शन प्राप्त होते हैं. हमारे अंदर आनंद का सागर है, उसमें गोता लगाना है और यह मात्र सत्संग के प्रभाव से संभव है. ‘बिना सत्संग मैं मिलता नहीं’- श्रीकृष्ण का यह कथन आज भी अर्थ पूर्ण व सार्थक है.

सत्संग में बिताया समय ही सार्थक

भगवान श्रीकृष्ण आगे कह रहे हैं कि बड़े-बड़े साधनों, योग, संध्या पूजा-पाठ-दान, स्वाध्याय, संन्यास आदि द्वारा जो मुझे प्राप्त नहीं कर सकते, उन्हें मैं सत्संग द्वारा सुलभ हो जाता हूं. गोपियां जो सब प्रकार से साधनहीन थीं, सत्संग के प्रभाव से ही मुक्त पर ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लिया. इसलिए हे उद्धव! तुम श्रुति-स्मृति, प्रवृत्ति-निवृत्ति आदि का परित्याग कर सर्वत्र मेरी ही भावना से ओत-प्रोत होते हुए आत्मस्वरूप एक मेरी ही शरण में आ जाओ, इससे तुम्हारा कल्याण होगा. जीवन का कौन-सा समय सार्थक है? जितना समय सत्संग सुनने में बिताया, उतना समय सार्थक हुआ. – आरडी अग्रवाल ‘प्रेमी’, अध्यात्म लेखक, मुंबई

News posted by : Radheshyam kushwaha

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