नवरात्र में कन्या पूजन क्यों किया जाता है? जानिए शास्त्रों का रहस्य

नवरात्र कन्या पूजन का महत्व
Navratri Kanya Pujan: नवरात्र में कुमारी कन्याओं की पूजा का विशेष महत्व माना गया है. शास्त्रों के अनुसार 2 से 9 वर्ष की कन्याओं के पूजन से देवी प्रसन्न होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है.
सलिल पाण्डेय, मिर्जापुर
Navratri Kanya Pujan: नवरात्र का पर्व देवी दुर्गा की आराधना का सबसे पवित्र समय माना जाता है. इस दौरान कुमारी कन्याओं की पूजा करने का विशेष विधान शास्त्रों में बताया गया है. मान्यता है कि नवरात्र में कन्या पूजन करने से माता रानी अत्यंत प्रसन्न होती हैं और भक्तों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं.
श्रीमद् देवीभागवत के अनुसार नवरात्र में 2 वर्ष से 9 वर्ष तक की कन्याओं की पूजा करना शुभ माना गया है. इन कन्याओं को देवी का ही रूप माना जाता है.
कैसे किया जाता है कन्या पूजन
नवरात्र में कन्या पूजन अलग-अलग तरीके से किया जा सकता है. भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार कन्याओं को आमंत्रित कर उनका पूजन करते हैं. प्रतिदिन एक ही कन्या की पूजा भी की जा सकती है या फिर तिथि के अनुसार कन्याओं की संख्या बढ़ाते हुए पूजा की जा सकती है. यदि सामर्थ्य अधिक हो तो दोगुनी या तिगुनी संख्या में कन्याओं का पूजन भी किया जा सकता है. शास्त्रों में कहा गया है कि पूजा का उद्देश्य केवल अपना लाभ नहीं बल्कि सबके कल्याण की भावना होना चाहिए. जितने अधिक लोगों के हित की भावना से पूजा की जाती है, उतनी ही देवी की कृपा प्राप्त होती है.
अलग-अलग उम्र की कन्याओं का महत्व
श्रीमद् देवीभागवत महापुराण में कन्याओं की उम्र के अनुसार उनके अलग-अलग स्वरूप बताए गए हैं.
2 वर्ष की कन्या – कुमारी
पूजा करने से दुख-दरिद्रता दूर होती है और आयु व बल बढ़ता है.
3 वर्ष की कन्या – त्रिमूर्ति
धर्म, अर्थ और काम की पूर्ति होती है तथा परिवार में सुख-समृद्धि आती है.
4 वर्ष की कन्या – कल्याणी
विद्या, विजय और सुख की प्राप्ति होती है.
5 वर्ष की कन्या – कालिका
शत्रुओं का नाश होता है.
6 वर्ष की कन्या – चंडिका
धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है.
7 वर्ष की कन्या – शाम्भवी
दुख दूर होते हैं और संघर्ष या विवाद में विजय मिलती है.
8 वर्ष की कन्या – दुर्गा
सांसारिक सुख और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है.
9 वर्ष की कन्या – सुभद्रा
सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है.
नवरात्र में तिथि के अनुसार भोग
नवरात्र में देवी को तिथि के अनुसार अलग-अलग प्रकार के भोग लगाने का भी विधान बताया गया है.
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- प्रतिपदा – घी का भोग, रोगों से मुक्ति
- द्वितीया – चीनी का भोग, दीर्घायु की प्राप्ति
- तृतीया – दूध का भोग, दुखों से छुटकारा
- चतुर्थी – मालपुआ का भोग, संकटों से रक्षा
- पंचमी – केला, बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि
- षष्ठी – शहद, सुंदरता और आकर्षण
- सप्तमी – गुड़, शोक और तनाव से मुक्ति
- अष्टमी – नारियल, मानसिक शांति
- नवमी – धान का लावा, परलोक में सुख
चैत्र नवरात्र में कन्या पूजन और तिथि के अनुसार भोग लगाने की परंपरा बहुत प्राचीन और पवित्र मानी जाती है. इन विधियों को श्रद्धा और सच्चे मन से करने से माता दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है.
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By Shaurya Punj
मैंने डिजिटल मीडिया में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव हासिल किया है. पिछले 6 वर्षों से मैं विशेष रूप से धर्म और ज्योतिष विषयों पर सक्रिय रूप से लेखन कर रहा हूं. ये मेरे प्रमुख विषय हैं और इन्हीं पर किया गया काम मेरी पहचान बन चुका है. हस्तरेखा शास्त्र, राशियों के स्वभाव और उनके गुणों से जुड़ी सामग्री तैयार करने में मेरी निरंतर भागीदारी रही है. रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के बाद. इसके साथ साथ कंटेंट राइटिंग और मीडिया से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए मेरी मजबूत पकड़ बनी. इसके अलावा, एंटरटेनमेंट, लाइफस्टाइल और शिक्षा जैसे विषयों पर भी मैंने गहराई से लेखन किया है, जिससे मेरी लेखन शैली संतुलित, भरोसेमंद और पाठक-केंद्रित बनी है.
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