Premanand Ji Maharaj: भारत में पति-पत्नी को सुख-दुख का साथी कहा जाता है. आपने अक्सर लोगों को कहते सुना होगा कि शादी के बाद पति-पत्नी का भाग्य आपस में जुड़ जाता है. पति-पत्नी के अच्छे कर्मों का फल और शुभ प्रभाव एक-दूसरे पर पड़ता है. यदि ऐसा है, तो सवाल उठता है कि जिस तरह पुण्य का प्रभाव दोनों पर पड़ता है, ठीक उसी तरह क्या बुरे कर्मों या पापों का फल भी एक-दूसरे को मिलता है? आइए जानते हैं इस विषय पर प्रेमानंद जी महाराज का क्या कहना है.
क्या पति के बुरे कर्मों की सजा पत्नी को मिलती है?
प्रेमानंद जी महाराज से एक प्रश्न पूछा गया. प्रश्न था कि यदि पति बुरे कर्म करता हो, गंदा आचरण रखता हो या उससे कोई पाप हो जाए, तो क्या पत्नी को उसके बुरे कर्मों का दंड मिलेगा? इस पर प्रेमानंद जी महाराज ने उत्तर देते हुए कहा कि नहीं, पति के पापों का फल पत्नी को नहीं मिलता है. इस संसार में हर व्यक्ति को अपने कर्मों का फल स्वयं ही भोगना पड़ता है.
अच्छे कर्मों का प्रभाव
हालांकि, यदि कर्म अच्छे हों तो उनका शुभ प्रभाव पति-पत्नी दोनों को मिलता है. इसका कारण बताते हुए प्रेमानंद जी महाराज ने कहा कि जब विवाह होता है, तब महिला आपकी धर्मपत्नी बन जाती है. धर्मपत्नी शब्द में ही ‘धर्म’ जुड़ा होता है, यानी धर्म के अंतर्गत रहकर किए गए कार्यों का शुभ प्रभाव दोनों पर पड़ता है. लेकिन जब बात अधर्म या पापपूर्ण आचरण की आती है, तो उनका प्रभाव एक-दूसरे पर नहीं पड़ता.
अधर्म और पाप का असर
उनका कहना है कि यदि पत्नी गलत व्यवहार करे, अधर्म वाले कार्य करे, व्यभिचारिणी हो या शादी के बाद किसी और के साथ संबंध रखे, या पति ऐसा करे, तो दोनों को अपने-अपने कर्मों का फल स्वयं ही भोगना पड़ता है. उन्होंने कहा कि जो पति-पत्नी ऐसे कर्म करते हैं, उन्हें नरक में कठोर दंड और यातनाएं सहनी पड़ती हैं. इसलिए शादी के रिश्ते को ईमानदारी, विश्वास, सम्मान और प्रेम के साथ दोनों को निभाना चाहिए.
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