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Devshayani Ekadashi 2025: अगर भगवान विष्णु सो रहे हैं, तो हमारी प्रार्थना कौन सुन रहा है?

Updated at : 29 Jun 2025 12:09 AM (IST)
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Devshayani Ekadashi 2025

Devshayani Ekadashi 2025

Devshayani Ekadashi 2025 : सोचना कि भगवान सो गए हैं, और हमारी प्रार्थना व्यर्थ है – यह एक अधूरा दृष्टिकोण है. ईश्वर सर्वव्यापक और सर्वसंपन्न हैं, उनकी कृपा, ध्यान और ऊर्जा हर क्षण जगत में व्याप्त रहती है — चाहे वो योगनिद्रा में ही क्यों न हों.

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Devshayani Ekadashi 2025 : देवशयनी एकादशी, जिसे ‘हरिशयनी एकादशी’ भी कहा जाता है, हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है. इस दिन से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और चातुर्मास आरंभ होता है. धार्मिक मान्यता है कि श्रीहरि चार माह तक क्षीर सागर में विश्राम करते हैं. ऐसे में श्रद्धालुओं के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है “जब भगवान विष्णु सो रहे हैं, तो हमारी प्रार्थना कौन सुन रहा है? जानें इस सवाल का जबाब :-

– भगवान विष्णु की ‘योगनिद्रा’ एक प्रतीकात्मक अवस्था है, पूर्ण निद्रा नहीं

भगवान की निद्रा हमारी तरह शारीरिक नहीं होती. इसे ‘योगनिद्रा’ कहा गया है – जो एक आध्यात्मिक अवस्था है. इस अवधि में वे संसार की गतिविधियों से अलग होकर अपने भीतर स्थिर हो जाते हैं, परंतु उनकी चेतना सदा जागृत रहती है. वे भक्तों की प्रार्थनाएं सुनते हैं, पर बिना हस्तक्षेप किए सब कुछ नियति और कर्मफल अनुसार चलने देते हैं.

– भगवान शिव और देवी शक्ति इस काल में सक्रिय रूप से संचालन करते हैं

शास्त्रों में कहा गया है कि जब श्रीहरि विश्राम करते हैं, तब भगवान शिव, देवी दुर्गा और अन्य देवतागण जगत की संचालन-शक्ति संभालते हैं. इसी कारण श्रावण मास में शिवभक्ति का विशेष महत्व होता है. इसलिए इस काल में की गई प्रार्थनाएं और व्रत शिव, शक्ति एवं अन्य रूपों में स्वीकार होते हैं.

– धर्म का संचालन ‘धर्मचक्र’ के अनुसार चलता है, न कि व्यक्तिगत इच्छा के अनुसार

जब भगवान योगनिद्रा में होते हैं, तब वे संसार में होने वाली घटनाओं को कर्मचक्र और धर्मचक्र के नियमों पर छोड़ देते हैं. इसका तात्पर्य यह है कि भक्तों की प्रार्थनाएं खराब नहीं जातीं, बल्कि सही समय और सही विधि से उनका फल अवश्य मिलता है. वह फल तुरंत न सही, लेकिन नियत समय पर भगवान की कृपा से ही प्राप्त होता है.

– देवशयनी काल ‘संकल्प, साधना और तपस्या’ का समय है

चातुर्मास का अर्थ ही है – आत्मनिरीक्षण, संयम और साधना। इस समय की गई प्रार्थनाएं, व्रत, जप, दान और सेवा कई गुना पुण्य प्रदान करती हैं. ऐसा कहा गया है कि यह काल साधकों के लिए ईश्वर से जुड़ने का अद्भुत अवसर होता है – जब ईश्वर बाहर नहीं, भीतर खोजे जाते हैं.

– भगवान की कृपा सदा जागृत रहती है – वह निद्रा में भी ‘अप्रत्याशित रूप से’ कार्य करते हैं

भगवान विष्णु भले ही योगनिद्रा में हों, लेकिन उनका अनुग्रह, रक्षा और करुणा कभी शिथिल नहीं होती. उन्होंने गजेंद्र मोक्ष की कथा में यह सन्देश दिया कि जब भी सच्चा भक्त पुकारता है, वह कहीं भी हों, तुरंत सहायता करते हैं.

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इसलिए यह सोचना कि भगवान सो गए हैं, और हमारी प्रार्थना व्यर्थ है – यह एक अधूरा दृष्टिकोण है. ईश्वर सर्वव्यापक और सर्वसंपन्न हैं, उनकी कृपा, ध्यान और ऊर्जा हर क्षण जगत में व्याप्त रहती है — चाहे वो योगनिद्रा में ही क्यों न हों.

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Ashi Goyal

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By Ashi Goyal

Ashi Goyal is a contributor at Prabhat Khabar.

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