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Dah Sanskar Rules: दाह संस्कार के बाद पीछे पलटकर क्यों नहीं देखना चाहिए? जानें धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

Updated at : 05 Jan 2026 4:50 PM (IST)
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Dah Sanskar Rules

दाह संस्कार

Dah Sanskar Rules: सनातन धर्म में सोलह संस्कार को लेकर कई कड़े नियम और परंपराएं बनाई गई हैं, इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण परंपरा है- दाह संस्कार. आइए जानते हैदाह संस्कार के बाद पीछे पलटकर क्यों नहीं देखना चाहिए...

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Dah Sanskar Rules: सनातन धर्म में सोलह संस्कार होते हैं, जो व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक के जीवन को पवित्र करने के लिए किए जाते हैं. सोलह संस्कार जैसे- गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन (गर्भावस्था के संस्कार), जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध (बचपन के संस्कार), विद्यारंभ, यज्ञोपवीत (उपनयन), वेदारंभ, केशांत (शिक्षाकाल के संस्कार), विवाह (गृहस्थ जीवन), वानप्रस्थ, सन्यास (वृद्धावस्था के संस्कार) और अंत्येष्टि (मृत्यु के बाद के संस्कार) किए जाते हैं.

Dah Sanskar : धार्मिक और आध्यात्मिक कारण

ज्योतिषाचार्य एवं हस्त रेखा विशेषज्ञ चंद्रशेखर सहस्त्रबाहु: ने बताया कि सनातन धर्म में सोलह संस्कार को लेकर कई कड़े नियम और परंपराएं बनाई गई हैं, इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण परंपरा है- दाह संस्कार के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना. श्मशान से लौटते समय बड़े-बुजुर्ग मना करते है कि पीछे पलटकर मत देखना. धर्म शास्त्रों के अनुसार दाह संस्कार के बाद आत्मा शरीर का त्याग कर आगे की यात्रा पर निकलती है. शरीर जलने के बाद भी आत्मा अपने परिजनों के आसपास मंडराती रहती है और उन्हें पुकारती है. माना जाता है कि पीछे पलटकर देखने पर आत्मा का मोह फिर संसार से जुड़ सकता है, जिससे उसकी आगे की गति में बाधा आती है.

मनोवैज्ञानिक कारण

दाह संस्कार के बाद पीछे मुड़कर देखने पर भय और नकारात्मक भावनाएं मन में बैठ जाती हैं. मृत्यु एक गहरा आघात होती है, दाह संस्कार के बाद पीछे मुड़कर देखना व्यक्ति की भावनाओं को और कमजोर बना सकता है, इसलिए बिना पीछे देखे लौटने की परंपरा व्यक्ति को मानसिक रूप से घटना से अलग होने में सहायक मानी जाती है.

आत्मा की शांति दाह संस्कार जरुरी

मृत शरीर को अग्नि के माध्यम से पंचतत्व में विलीन किया जाता है. यह सोलह संस्कारों में अंतिम संस्कार है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, मृत्यु के बाद आत्मा सूक्ष्म यात्रा पर निकलती है. दाह संस्कार, पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध जैसे कर्म आत्मा को स्थूल जगत के बंधन से मुक्त करने के लिए किया जाता हैं.

तेरहवीं संस्कार

तेरहवीं संस्कार मृत्यु के 13वें दिन करने वाला कर्म है, जिसमें ब्राह्मण भोज और दान-पुण्य किया जाता है. तेरहवीं संस्कार करने के बाद ही परिवार सामान्य जीवन में लौटता है.

  • तेरहवीं संस्कार के नियम: तेरहवीं संस्कार व्यक्ति की मृत्यु के 13वें दिन की जाती है.
  • शुद्धता का नियम: घर में सात्विक वातावरण रखा जाता है, मांस-मदिरा वर्जित होती है.
  • भोजन के नियम: तेरहवीं के दिन ब्राह्मण भोज कराया जाता है. भोजन शुद्ध और सात्विक होना चाहिए.
  • दान-पुण्य: तेरहवीं के दिन अन्न, वस्त्र, दक्षिणा, तिल, घी, पात्र आदि का दान किया जाता है.

चंद्रशेखर सहस्त्रबाहु:
ज्योतिषाचार्य एवं हस्त रेखा विशेषज्ञ
Mo- +91 8620920581

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Radheshyam Kushwaha

लेखक के बारे में

By Radheshyam Kushwaha

पत्रकारिता की क्षेत्र में 13 साल का अनुभव है. इस सफर की शुरुआत राज एक्सप्रेस न्यूज पेपर भोपाल से की. यहां से आगे बढ़ते हुए समय जगत, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान न्यूज पेपर के बाद वर्तमान में प्रभात खबर के डिजिटल विभाग में धर्म अध्यात्म एवं राशिफल डेस्क पर कार्यरत हैं. ज्योतिष शास्त्र, व्रत त्योहार, राशिफल के आलावा राजनीति, अपराध और पॉजिटिव खबरों को लिखने में रुचि हैं.

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