Astrology: सनातन संस्कृति में मृत्यु को जीवन का अंत नहीं है, बल्कि आत्मा की एक महत्वपूर्ण यात्रा का चरण माना गया है. देह नष्ट होती है, किंतु आत्मा, मन और संस्कारों से युक्त सूक्ष्म शरीर अपनी यात्रा जारी रखता है. इसी सूक्ष्म यात्रा को शांति, दिशा और तृप्ति प्रदान करने हेतु हमारे शास्त्रों ने अनेक संस्कार और परंपराएं निर्धारित की हैं. पीपल के वृक्ष पर मटका लटकाने की परंपरा भी उन्हीं गूढ़ आध्यात्मिक नियमों में से एक है. आइए जानते है ज्योतिषाचार्य वाणी अग्रवाल से इसका आध्यात्मिक महत्व के बारे में-
मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति
शास्त्रीय दृष्टिकोण- गरुड़ पुराण, मनुस्मृति और अन्य धर्मग्रंथों के अनुसार, मृत्यु के पश्चात आत्मा तत्काल मोक्ष या पुनर्जन्म प्राप्त नहीं करती. वह कुछ समय तक प्रेत अवस्था में रहती है, जहां उसे प्यास,भ्रम, अस्थिरता का अनुभव होता है.
गरुड़ पुराण स्पष्ट कहता है-
“जलदानात् प्रेततृष्णा शम्यते।”
अर्थात जलदान से प्रेत की तृष्णा शांत होती है और उसकी गति सुगम होती है.
पीपल का वृक्ष : केवल वृक्ष नहीं, दिव्य सेतु है.
भगवद्गीता (अध्याय 10) में श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं-
“अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्।”
(वृक्षों में मैं पीपल हूं )
शास्त्रों में पीपल को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त स्वरूप एवं अक्षय वृक्ष,देव, ऋषि, पितृ और यक्षों का निवास स्थान माना गया है.
गरुड़ पुराण में उल्लेख मिलता है-
“पीपल मूलं पितॄणां निवास”
अर्थात पीपल की जड़ें पितरों का स्थान हैं.
इस कारण मृत्यु संस्कार से जुड़े तर्पण, पिंडदान और जल अर्पण पीपल के समीप करना विशेष फलदायी माना गया है.
मटका और जल : प्रतीक भी, साधन भी-
पीपल पर लटकाया गया मटका केवल एक बर्तन नहीं, बल्कि गहन प्रतीकात्मक अर्थ रखता है-
मटका- स्थूल शरीर
जल- प्राण ऊर्जा और जीवन
टपकती बूंदें- निरंतर तृप्ति और स्मरण
जब मटके से बूंद- बूंद जल धरती पर गिरता है, तो यह दर्शाता है कि आत्मा को लगातार शांति, शीतलता और पोषण प्राप्त हो रहा है. यह कर्म आत्मा को यह अनुभूति कराता है कि वह अपने प्रियजनों द्वारा विस्मृत नहीं की गई है.
कब और कितने दिन मटका लटकाया जाता है?
क्षेत्रीय परंपराओं में भिन्नता होते हुए भी शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, मटका दाह संस्कार के अगले दिन या अस्थि-संचय के दिन या तेरहवीं तक लटकाया जाता है.
अवधि- सामान्यतः 10 दिन
कई स्थानों पर 13 दिन
कुछ परंपराओं में पिंडदान तक
शास्त्रों के अनुसार, 10–13 दिन आत्मा की प्रेत अवस्था मानी जाती है, और इस काल में जलदान अत्यंत आवश्यक होता है.
लोक परंपराएं और शास्त्र : विरुद्ध नहीं है, ग्रामीण और लोक मान्यताओं में यह विश्वास प्रचलित है कि मटका न लटकाने से आत्मा प्यास से व्याकुल रहती है. आत्मा को दिशा भ्रम हो सकता है. परिवार में अशांति और नकारात्मक प्रभाव बढ़ सकते हैं. वास्तव में लोक परंपराएं शास्त्रों की ही सरल और व्यवहारिक अभिव्यक्ति हैं.
पिंडदान, तर्पण और पीपल पूजा
एक ही आध्यात्मिक श्रृंखला, कर्म उद्देश्य-
पिंडदान, सूक्ष्म शरीर को बल, तर्पण, आत्मा की तृप्ति, पीपल पूजा, स्थिरता और मार्गदर्शन देता है.
ये तीनों कर्म अलग नहीं, बल्कि आत्मा को मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करने वाली एक ही श्रृंखला के अंग हैं.
नकारात्मक शक्तियों से रक्षा और वातावरण की शुद्धि इसका ध्येय हो सकता है.
गरुड़ पुराण में चेतावनी दी गई है-
“जलदानाभावे प्रेतत्वं भवेत्.”
अर्थात जलदान न मिलने पर आत्मा प्रेत योनि में भटकती है.
पीपल पर जल अर्पण
प्रेत बाधा से मुक्ति ,परिवार की रक्षा,वातावरण की शुद्धि में सहायक माना गया है.
निष्कर्ष
पीपल के वृक्ष पर मटका लटकाने की परंपरा अंधविश्वास नहीं है,बल्कि वेद, स्मृति और पुराणों में निहित गहन अध्यात्म का प्रतीक है,यह परंपरा हमें यह स्मरण कराती है कि मृत्यु के साथ हमारे कर्तव्य समाप्त नहीं होते है. आत्मा की शांति ही परिवार की शांति, समाज का संतुलन और जीवन की पूर्णता का आधार है.

