इटखोरी का भद्रकाली मंदिर: जहां आज भी मौजूद हैं प्राचीन सभ्यता के प्रमाण

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झारखंड का प्रसिद्ध मां भद्रकाली मंदिर

Bhadrakali Jayanti Temple Visit: अपरा एकादशी 2026 पर जानें झारखंड के प्रसिद्ध मां भद्रकाली मंदिर का इतिहास, तांत्रिक महत्व, भगवान बुद्ध से जुड़ी मान्यताएं और मंदिर परिसर में मौजूद अद्भुत धार्मिक धरोहरों के बारे में.

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Bhadrakali Jayanti Temple Visit: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना गया है. ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है, जिसे अचला एकादशी और कुछ क्षेत्रों में भद्रकाली एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. वर्ष 2026 में यह पावन व्रत 13 मई, बुधवार को रखा जाएगा. इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अपरा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. इस अवसर पर आज हम आपको झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 150 किलोमीटर दूर स्थित प्रसिद्ध मां भद्रकाली मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जो अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक और तांत्रिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है.

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प्राचीन इतिहास से जुड़ा है मां भद्रकाली मंदिर

मां भद्रकाली का यह प्राचीन मंदिर झारखंड के चतरा जिले के इटखोरी प्रखंड से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर भदुली गांव में स्थित है. माना जाता है कि मंदिर के नाम पर ही गांव का नाम भदुली पड़ा. यह मंदिर अत्यंत प्राचीन और ऐतिहासिक महत्व का केंद्र माना जाता है. मंदिर में स्थापित मां भद्रकाली की प्रतिमा एक ही विशाल शिलाखंड पर तराशी गई है. यह प्रतिमा लगभग साढ़े चार फीट ऊँची, ढाई फीट चौड़ी और करीब 30 मन वजनी बताई जाती है. विद्वानों के अनुसार इस प्रतिमा की स्थापना पाल काल यानी पांचवीं-छठी शताब्दी में हुई थी.

196 एकड़ में फैला है विशाल मंदिर परिसर

मां भद्रकाली मंदिर का परिसर लगभग 196 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है. मंदिर परिसर में एक विशाल यज्ञशाला भी बनाई गई है, जिसका निर्माण वर्ष 1980 में हुआ था. यह यज्ञशाला 52 फीट ऊँची, 70 फीट लंबी और 50 फीट चौड़ी है. यज्ञशाला के पूर्व दिशा में एक संग्रहालय स्थित है, जहां उत्खनन में प्राप्त 418 मूर्तियों और प्राचीन भग्नावशेषों को सुरक्षित रखा गया है.

तंत्र साधना के लिए यह स्थान विशेष रूप से प्रसिद्ध माना जाता है. यहां मां तारा की प्रतिमा इस प्रकार बनाई गई है कि साधक को माँ के पैर का अंगूठा सीधे आज्ञाचक्र यानी भृकुटी मध्य के सामने दिखाई देता है. शोधकर्ताओं का मानना है कि मगध के प्रसिद्ध शाक्त साधक भैरवनाथ ने इस स्थल को साधना के लिए चुना था.

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मंदिर परिसर में मौजूद हैं कई अद्भुत धरोहरें

मंदिर परिसर में कोठेश्वरनाथ स्तूप भी स्थित है, जिसके चारों ओर भगवान बुद्ध की मूर्तियां अंकित हैं. स्तूप के ऊपर एक छोटा गड्ढा बना हुआ है, जिसमें चमत्कारिक रूप से हमेशा पानी भरा रहता है. मान्यता है कि इस जल को पूरी तरह खाली नहीं किया जा सकता.

इसके अलावा यहां सहस्रलिंगी शिवलिंग भी स्थापित है, जिसमें 1008 छोटे-छोटे शिवलिंग उकेरे गए हैं. यह शिवलिंग श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र माना जाता है.

भगवान बुद्ध और जैन धर्म से भी जुड़ा है संबंध

ऐसी मान्यता है कि ज्ञान और शांति की खोज में निकले युवराज सिद्धार्थ ने इस स्थान पर तपस्या की थी. कहा जाता है कि जब उनकी माता उन्हें वापस ले जाने आईं और सिद्धार्थ का ध्यान नहीं टूटा, तब उनके मुख से “इत खोई” शब्द निकला, जो आगे चलकर इटखोरी कहलाया.

जैन धर्मावलंबी भी इस स्थान को पवित्र मानते हैं. मान्यता है कि जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ स्वामी की जन्मभूमि यही क्षेत्र है. साथ ही यह स्थान तपस्वी मेघा मुनि की तपस्थली भी माना जाता है.

पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है मंदिर

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा वर्ष 2011-12 और 2012-13 में यहां की गई खुदाई में कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक तथ्य सामने आए. खुदाई में नौवीं-दसवीं शताब्दी के मठ और मंदिरों के अवशेष मिले, जिन्हें आज संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है. वर्तमान समय में मंदिर प्रबंधन समिति इस प्राचीन धरोहर को उसके पुराने वैभव के साथ संरक्षित करने का प्रयास कर रही है.

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