यथार्थ सिद्धांत

Published at :10 Nov 2016 6:32 AM (IST)
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यथार्थ सिद्धांत

किसी विचार को दक्षतपूर्वक कार्य रूप में परिणत करना एक बात है और उसके आधारभूत मौलिक अर्थ को हृदयंगम करना एक बिल्कुल दूसरी बात है. किसी कार्य को विवशता में करना और उसको हृदय से स्वीकार करना दोनों अलग-अलग बातें हैं. वर्तमान समय में चाहे कोई राष्ट्र कपितय सिद्धांतों को कार्यान्वित करता हुआ भले ही […]

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किसी विचार को दक्षतपूर्वक कार्य रूप में परिणत करना एक बात है और उसके आधारभूत मौलिक अर्थ को हृदयंगम करना एक बिल्कुल दूसरी बात है. किसी कार्य को विवशता में करना और उसको हृदय से स्वीकार करना दोनों अलग-अलग बातें हैं. वर्तमान समय में चाहे कोई राष्ट्र कपितय सिद्धांतों को कार्यान्वित करता हुआ भले ही खुद फल-फूल रहा हो, किंतु यदि कोई राष्ट्रीय मस्तिष्क भली भांति उन सिद्धांतों को समझता नहीं है, यदि उसके पीछे कोई सुनिश्चित ठोस आधार नहीं, तो उस राष्ट्र के पतन की बराबर संभावना बनी रहती है. हर कार्य को करने के लिए उसके पीछे ठोस आधार का होना आवश्यक होता है.

इसके बिना कार्य तो होता है, परंतु उसकी परिणति उच्च नहीं हो पाती. एक श्रमिक जो किसी रासायनिक क्रिया को सफलतापूर्वक व्यवहृत करता है, वस्तुत: रसायनशास्त्रवेत्ता नहीं है. कोयला झोंकनेवाला जो सफलतापूर्वक किसी वाष्प- इंजन को चला लेता है, इंजीनियर नहीं हो सकता है, क्योंकि उसे केवल यांत्रिक अभ्यास हो गया है. आपने उस डॉक्टर की कथा पढ़ी होगी, जो शरीर के क्षत-विक्षत अंग को पूरे एक सप्ताह तक रेशमी पट्टी से बांध कर अच्छा किया करता था, किंतु उसे नित्य अपनी तलवार से छूना अनिवार्य मानता था.

पट्टी के द्वारा बाहरी गर्द से रक्षा होने के कारण घाव अच्छे हो जाते थे, किंतु वह कहता था कि उसकी तलवार के स्पर्श में ही घावों को चंगा कर देने की उद्भुत शक्ति है और ऐसा ही उसके रोगियों को विश्वास हो गया था. किंतु उसके इस अंधविश्वासपूर्वक कल्पना से बीसों रोगियों को असफलता के सिवा और कुछ न हाथ लगा, क्योंकि घाव भरने के लिए पट्टी के साथ-साथ दवा कीभी जरूरत होती है. अतएव प्रत्येक वस्तु के संपादन में यह परमावश्यक है कि यथार्थ सिद्धांत और यथार्थ व्यवहार समन्वित रहें.

सफलता का भेद एक खुला हुआ भेद है. इस विषय पर प्रत्येक व्यक्ति कुछ न कुछ कह सकता है और शायद आपने उसके साधारण सिद्धांतों की व्याख्या भी सुनी होगी. किंतु विषय इतना महत्वपूर्ण और आवश्यक है कि लोगों के हृदय में उसे भली भांति पैठाने के लिए, उस पर जितना बल दिया जाये, उतना ही थोड़ा है.

– स्वामी रामतीर्थ

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