– हरिवंश –
परमहंस सत्यानंद जी ने समाधि ले ली. अगहन पूर्णिमा के दिन वह जन्मे. इस अगहन पूर्णिमा को उनके जन्मदिन पर आयोजन हुआ. पूस की चतुर्दशी को देह त्याग दिया. दो दिसंबर (योग पूर्णिमा अवसर) को दर्शन दिया. एक साधक ने बताया, वह संकेत दे चुके थे, यह उनका अंतिम दर्शन है.
इधर रिखिया जाना न हो सका. लगभग वर्ष भर से. साध थी कि वर्ष के अंत में दो दिन आश्रम में रहना हो. संयोग रहा, तो परमहंस के दर्शन भी हो जायेंगे. पर रविवार सुबह खबर आयी, परमहंस जी ने देह त्याग दिया.
परमहंस जी की उपस्थिति न भूलनेवाली थाती है. मेरे लिए. उनके लिए भी, जिन्होंने उन्हें देखा. सुना. आज उन्हें याद करते पाल ब्रंटन का कथन याद आता है. महर्षि रमण के संदर्भ में पाल ने लिखा कि उनकी उपस्थिति से ‘मैं यह कभी नहीं भूलता कि चारों ओर एक रहस्यमय प्रभाव फैला है. एक कृपापूर्ण प्रभा मेरे मन में पैठती है. महर्षि की सन्निधि में बैठने से ही मुझे एक प्रकार की आकाशीय आनंदमय, प्रशांतिमय अनुभूति का स्वाद मिलता था… उनकी बातें मुझमें नयी जान फूंक देती. (‘गुप्त भारत की खोज’ से साभार).
पाल ब्रंटन मशहूर अंगरेज पत्रकार थे. 20वीं सदी के आरंभ में वह भारत के महान साधकों, योगियों और आध्यात्मिक पुरुषों की तलाश में भारत आये. नगर, गांव, जंगल भटके. इन अद्भुत लोगों से मिले. अनेक चर्चित पुस्तकें लिखीं. ‘ए सर्च इन सीक्रेट इंडिया’ खूब चर्चित हुई. पाल अगर परमहंस सत्यानंद से मिले होते, तो उन्हें वही अनुभूति होती, जो उन्हें तिरुवन्नमलइ में हुई. क्यों?
क्योंकि परमहंस की उपस्थिति बोलती थी.
प्रखरता, तेजस्विता, देवत्व, ऊर्जा-पुंज, योगी रूप, परम साधक, मौन रह कर कर्म में डूबे, अथाह विद्वता-ज्ञान के पुंज, भव्य व्यक्तित्व… ऐसे अनेक शब्द या विशेषण उनकी पूरी झलक नहीं दे पाते. उनका मौन भी प्रखर था.
वह महान योगी थे. अपने गुरु शिवानंद जी का स्थान छोड़ा. मुंगेर आये. योग को दुनिया में प्रतिष्ठित करने का व्रत लेकर. संसार घूमे. योग को दुनिया में स्थापित करनेवाले वही हैं. वैज्ञानिक दृष्टि से. शोध करा कर. मुंगेर में अंतरराष्ट्रीय योग विश्वविद्यालय बना कर. देश-दुनिया के कोने-कोने से डॉक्टर व विशेषज्ञ आकर योग पर शोध करते हैं. वैज्ञानिक दृष्टि से. खूबी यह रही कि यह सब किया, पर योग को न उद्योग बनाया. न अपना यह प्रयास दुनिया को बताया.
पत्रकार हूं , गांधी को पढ़ा था. जिनका मानना था कि अपना काम दिखाने-बताने या प्रचार करने पत्रकारों को क्यों बुलाऊं? मेरे काम में सत्व होगा, तासिर होगी, तो दुनिया खुद देखेगी. जानेगी. गांधी को नहीं देखा. पर पत्रकार के रूप में गांधी के इस कथन पर चलते महान योगी सत्यानंद जी को पाया. प्रचार-प्रसार से दूर रहनेवाले. इसी परंपरा को बढ़ा रहे हैं, स्वामी निरंजनानंद जी, स्वामी सत्संगी जी. योग, अध्यात्म का हिस्सा है. वैज्ञानिक पद्धति है. जीने की कला है, यह तो प्रचार हो. पर यह उद्योग न बने. यह उनकी कोशिश रही. बिना बोले.
योगी सत्यानंद जी का संकल्प था, योग को दुनिया में स्थापित करना. यह काम हो गया, तो मुंगेर छोड़ दिया. स्वामी निरंजनानंद जी को सौंपा. फिर नये रास्ते पर. त्रयंबकेश्वर (नासिक) पीठ पर संदेश मिला. रिखिया जाने का. वहां गये. अद्भुत साधना की. पंचाग्नि के बीच तपे. घोर तप किया. साधना के शीर्ष पर पहुंचे.
ख्याति दुनिया में पायी. रिखिया में दुनिया के कोने-कोने से महान हस्तियां आयीं. कोई सेना प्रमुख बना, तो पहले दर्शन करने रिखिया आया. पर परमहंसजी निर्लिप्त. जब-जब उन्हें बोलते सुना, हतप्रभ हुआ. अधुनातन ज्ञान, प्राचीन बातें, हर परंपरा, संस्कृति की बारीक चीजें पता. कई-कई भाषाओं का ज्ञान. देश के कोने-कोने की बातें. तिब्बत, काबुल से लेकर रंगून (बर्मा). और श्रीलंका की यात्रा की बातें. उनकी पुस्तकें पढ़ कर, उनके ज्ञान संसार की झलक मिलती है. भारतीय अध्यात्म, योग, संस्कृति, इतिहास व विज्ञान की गहरी बातें. सटीक व्याख्या, नयी दृष्टि.
उनके सानिध्य में स्वामी सत्संगी जी ने रिखिया व आसपास के गांवों में प्रयोग किया. शिक्षा का. अंग्रेजी पढ़ाने का. कंप्यूटर सिखाने का. भारतीय संस्कृति-संस्कार से रू-ब-रू कराने का. इसका अद्भुत प्रभाव हुआ है. गांव के बच्चे-बच्चियों का आत्मविश्वास देख यकीन नहीं होगा. पर यह सब काम बिना प्रचार. यह कर्मयोगियों की दुनिया है.
परमहंस सत्यानंद जी का जाना, पिछले माह अचानक प्रभाष जोशी जी का न रहना, यह निजी दुख नहीं बंटनेवाला. पर यही संसार का लय है.
महर्षि अरविंद के संदर्भ में दिनकर जी ने लिखा ‘जीवन, निद्रा और मृत्यु ये चेतना मार्ग पर स्टेशन मात्र हैं. सारी सृष्टि चित का विलास है. मृत्यु जीवन की अस्वीकृति नहीं, उसकी प्रक्रिया है.’
यह सृष्टि चक्र या भवसागर चक्र समझने की जो दृष्टि परमहंस सत्यानंद जी देते थे, वही आलोक पथ शेष है. पाथेय है. प्रेय है.
दिनांक : 7-12-09
