शीर्ष से संन्यास

Updated at :17 May 2015 6:52 AM
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शीर्ष से संन्यास

-हरिवंश- कवर ने ध्यान खींचा. बिना कुछ कहे, बहुत कुछ बताती कवर की पेंटिंग. किताब पर एक युवा संत की कमंडल लटकाये आगे जाते तसवीर. अज्ञात, अदृश्य, अंजान भविष्य की अनिश्चित दुनिया में एक युवा के उठते पांव. जीवन का मर्म जानने, रहस्य समझने के लिए प्रतीकात्मक पेंटिंग. पुस्तक के अंत में, लेखक यानी युवा […]

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-हरिवंश-

कवर ने ध्यान खींचा. बिना कुछ कहे, बहुत कुछ बताती कवर की पेंटिंग. किताब पर एक युवा संत की कमंडल लटकाये आगे जाते तसवीर. अज्ञात, अदृश्य, अंजान भविष्य की अनिश्चित दुनिया में एक युवा के उठते पांव. जीवन का मर्म जानने, रहस्य समझने के लिए प्रतीकात्मक पेंटिंग. पुस्तक के अंत में, लेखक यानी युवा संत ओम स्वामी ने कवर डिजाइनर अलेक्जेंडर वान नेस के प्रति आभार व्यक्त किया है. साथ ही कलाकार मिन वे अंग को इस पेंटिंग के इस्तेमाल की अनुमति देने के प्रति कृतज्ञता भी. पुस्तक का कवर, बिना कहे-बोले पुस्तक की विषयवस्तु के बारे में बहुत कुछ स्पष्ट करता है.

कवर की कलाकृति अर्थपूर्ण है. इस भागती भीड़ या मशीन बन चुकी दुनिया में जीवन का अर्थ तलाशती पुस्तक. आधुनिक भागती दुनिया के एक युवा की प्रेरक अनुभव यात्रा. हाल ही में बुद्ध पर एक पुस्तक पढ़ी. बुद्ध के जीवन के तीन पड़ाव हैं. युवा सिद्धार्थ, राजकुमार सिद्धार्थ, फिर भिक्षु गौतम. कठिन तप-साधना के बाद बुद्धत्व की प्राप्ति! शायद प्रकृति ने हर इंसान में सिद्धार्थ को जन्म दिया है. जीवन क्यों? या महर्षि रमण का यह सवाल कि मैं कौन हूं? जीवन का मकसद क्या है? ये सवाल जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर मिलते ही हैं. युवा ओम स्वामी भी बचपन से ही इन सवालों से घिरे थे. यह पुस्तक (इफ ट्रथ वी टोल्ड ए मांक’स मेमोयर, प्रकाशक – हार्पर एलिमेंट, कीमत 499 रुपये) अपने होने का अर्थ जानने को बेचैन एक आधुनिक सफल युवा का जीवन विवरण है. आधुनिक यानी मौजूदा दौर, जिसमें हर युवक कैरियर, सफलता और भौतिक उपलब्धियों को ही जीवन का चरम मानता है. लगभग 250 पेज की इस पुस्तक में 15 अध्याय हैं.

पुस्तक की शुरुआत में ऋग्वेद का एक मंत्र है, जिसका अर्थ है कि हम हमेशा अपने कानों से अच्छी चीजें सुनें. अपनी आंखों से अच्छी चीजें देखें. हे परमात्मा! हम एक संतोष का जीवन जीये. स्वस्थ जीवन जीयें और जो जीवन हमें मिला है, उसमें ईश्वर के यशस्वी चीजों का गुणगान करें. स्पष्ट है, ईश्वर की तलाश. यही इस पुस्तक का विषय है. यह एक सामान्य बालक की महज कथा नहीं है, जो धर्म, आध्यात्म और जीवन को समझना चाहता है या भौतिक चीजों के प्रति जिसकी रुचि नहीं है, या जो खुद अपनी तकदीर की अलग कहानी लिखना चाहता है. यह एक साधारण परिवार में जन्मे बच्चे की कथा है, जो अपने होने का अर्थ तलाश रहा है. नब्बे के दशक में अट्ठारह वर्ष का एक लड़का ऑस्ट्रेलिया की धरती पर पांव रखता है. भौतिक सपनों को साकार करने के लिए. पास में मामूली पैसा है. अपनी राह बनाने के लिए कठिन संघर्ष ही एकमात्र विकल्प है.

दो वर्षों तक लगातार संघर्ष, श्रम, तप और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण से वही लड़का, महज 26 वर्ष की उम्र में ढाई लाख डॉलर सालाना आमदनी कमाने लगता है. वह करोड़ों-करोड़ का मालिक बन जाता है. जिसके पास अपने जीवन को रास्ते पर लाने के लिए मामूली पैसे, मामूली पूंजी नहीं थी, दो वर्षों में वह अपने श्रम से ढाई लाख डॉलर कमाने लगा, यह आसान चीज नहीं. यह पुरुषार्थ और अटूट संकल्प से संभव हुआ. पर, यह सफलता भी उस बच्चे के जीवन की अंतिम मंजिल नहीं है. आठ वर्ष की उम्र में ही इस बच्चे को सपने में झलक मिलती है. एक ऐसी अनुभूति, जिससे गहरा आनंद और शांति का एहसास होता है. यह सपना अज्ञात की खोज, ईश्वर की तलाश, आध्यात्म की खोज के प्रति लालसा पैदा करती है. बच्चा शुरू से ही तंत्र, ज्योतिष, गहरी साधना, ध्यान में डूबता है, पर उसे कहीं ईश्वर दिखाई नहीं देते. इन चीजों से निराश होकर वह भौतिक उपलब्धि पाने की दिशा में अग्रसर होता है, पर अंदर बेचैनी बनी रहती है. वर्षों तक अच्छा जीवन जीने के बाद भी यह बेचैनी कायम रहती है. सिलिकॉन वैली, अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड में वह अपनी पहचान बनाता है.

अपने बूते सबकुछ पाने में सफल होता है. कम उम्र में बड़ी भौतिक उपलब्धि. गाड़ी, घर, डिजाइनर कपड़े, आलिशान होटलों में रहना, जीवन का यह चरम सुख आज हर युवा की ख्वाहिश है. कम उम्र में सबकुछ पाने का अरमान. पर, यह पा कर भी शून्यता का बोध, एक वीतरागी भाव और फिर भारत लौट कर सबकुछ छोड़ देने का संकल्प. फिर संन्यास तक का सफर. बनारस पहुंच कर गुरु की तलाश, ईश्वर को जानने की दिशा में एक निर्णायक कदम. बाबाओं के संसार से दरस-परस. तरह-तरह के अनुभव. फिर बनारस में एक बाबा से मुलाकात. उनसे दीक्षा. पर उनके मन-मिजाज अलग थे. सांसारिक थे. इस बेचैन युवा का अत्यंत संकीर्ण, अत्यंत स्वार्थ से भरे लोगों से साबका हुआ. पाया कि आध्यात्म की दुनिया में जाकर गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल होता है. इस युवा साधक का मन टूटता है. फिर भी इस युवा का समर्पण अद्भुत है. गुरु के इस ढंग की बातचीत- व्यवहार के बावजूद यह युवक अपने समर्पण के प्रति ईमानदार है.खाने-रहने में बहुत कठिनाई. जिस व्यक्ति ने भौतिक सुख का चरम देखा हो, वह अत्यंत असुविधाओं के बीच गंदी जगह रहे, सोने में असुविधा हो. बिच्छुओं का हमला, अंधेरे में चलना. ऐसी अनेक कठिन चुनौतियों के बीच भी अपने गुरु के प्रति समर्पण कायम रखना, मामूली चीज नहीं है. अपने ध्येय, प्रतिबद्धता के प्रति एकनिष्ठ समर्पण. गुरु के संग गांव का जीवन मिलता है. गंदगी, अव्यवस्था के बीच, गाली-गलौज करनेवाले गुरु यानी बाबा को आंखें बंद कर, पास जो भी धन है, उसे देना. व्यावहारिक तौर पर खुद भूखों रहना, यह गुरु भाव है. गुरु के साथ वृंदावन यात्रा. उधर, मन में लगातार यह सवाल कि इसी परिवेश के लिए सबकुछ छोड़ा? मन टूटने पर बद्रीनाथ की अकेली यात्रा. भटकाव. इसी क्रम में एक भैरवी से मुलाकात. साध्वी भैरवी का इस युवा के भविष्य के बारे में बहुत कुछ कहना. फिर इस युवा की घोर तपस्या. हिमालय के जंगलों में, हिमालय की गुफाओं में, घोर अस्त-व्यस्त जीवन, लगातार साधना और फिर पुरी की यात्रा. लौट कर पुन: हिमालय की कंदराओं में कठिन साधना. लगातार असुविधाओं के बीच ध्यान. फिर देवी दर्शन की अनुभूति का अद्भुत एहसास. अंदर से इस दर्शन-अनुभूति के बाद ऊर्जा का प्रस्फुटन. उस पर नियंत्रण. फिर कामाख्या दर्शन. बड़े साधु-तांत्रिकों से मुलाकात. फिर परिवार से मिलना और हिमालय की तराइयों में संन्यास लेकर जीवन गुजारना. घर छोड़ना, पश्चिम में पायी पूरी सफलता छोड़ना. धन-दौलत, पूरा पैसा, पूरी संपत्ति, सबकुछ एक झटके में त्याग कर.

आज बाजार की दुनिया में, भोग के संसार में युवावस्था में इतनी संपत्ति और ऐसी सफलता हो, तो लोग कृत्रिम स्वर्ग में होने का बोध पालते हैं. इस शीर्ष से चीजों को ठुकरा कर, हिमालय में रहने की कामना. जीवन का मर्म-अर्थ ढूंढ़ने की लालसा. तप, त्याग और साधना के पथ पर. जीवन डाल देना. यही युवा आज ओम स्वामी के नाम से अपना ब्लॉग लिखते हैं. हर साल करीब एक करोड़ से अधिक लोग पढ़ते हैं, यह कोई मामूली बात नहीं. मनुष्य की आदिम भूख यह जानने की रही है कि हम इस धरती पर आते क्यों है? पैदा क्यों होते हैं? बड़े क्यों होते हैं? क्या संसार बसाना और फिर चले जाना, यही जीवनचक्र है? या जीवन का कोई और अर्थ या मकसद भी है? जन्म, मृत्यु क्या यही भवसागर का चक्र है? ओम स्वामी इसी पुरातन खोज की एक आधुनिक कड़ी हैं. भौतिक सुख, उपलब्ध संपदा, कामनाओं के बीच होकर भी इनसे आगे निकल जाना. युवापन में ही इन सब चीजों को छोड़ कर जीवन का अर्थ तलाशने के पंथ पर यात्रा, एक सामान्य निर्णय नहीं है. इस असामान्य कदम की कहानी, जो लगातार मन को छूती-भाती है, कुछ अलग सोचने को विवश करती है, यही इस पुस्तक की विषयवस्तु और सार है. शुरू से अंत तक बांधे रखनेवाली किताब.

पिछले कुछेक वर्षो में बाबाओं और आध्यात्म को व्यवसाय बनानेवालों के बारे में हमने बहुत कुछ देखा-पढ़ा, और जाना है. ऐसी घटनाएं, जो विश्वास तोड़ती हैं. उस माहौल में एक सच्चे युवा साधक की आस्था का वृत्तांत है, यह पुस्तक. इस जिज्ञासु या लेखक से बिना मिले, यह वृत्तांत पढ़ कर लगता है कि आज के भौतिक दौर में भी, जीवन के यक्ष सवाल या मूल प्रश्न यथावत हैं. और यह तलाश सबसे बड़ी जीवन साधना.

(लेखक, राज्यसभा सांसद (जदयू) हैं.)

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