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जिन मामलों में सजा पा चुके हैं योगेंद्र साव, उन्हें वापस लेने की हो रही तैयारी, जानिए क्या कहता है कानून

Updated at : 25 Jul 2021 8:25 AM (IST)
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जिन मामलों में सजा पा चुके हैं योगेंद्र साव, उन्हें वापस लेने की हो रही तैयारी, जानिए क्या कहता है कानून

Jharkhand: राज्य सरकार ने पूर्व मंत्री योगेंद्र साव के खिलाफ उन दो मामलों को भी वापस लेने की कवायद शुरू की है, जिनमें उन्हें सजा सुनायी जा चुकी है. इसमें से एक मामले में योगेंद्र सवा सजा काट चुके हैं, जबकि दूसरे मामले में वह जमानत पर हैं.

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Jharkhand: राज्य सरकार ने पूर्व मंत्री योगेंद्र साव के खिलाफ उन दो मामलों को भी वापस लेने की कवायद शुरू की है, जिनमें उन्हें सजा सुनायी जा चुकी है. इसमें से एक मामले में योगेंद्र सवा सजा काट चुके हैं, जबकि दूसरे मामले में वह जमानत पर हैं. नियमानुसार सीआरपीसी में निहित प्रावधानों के अनुसार, सरकार वैसे ही मुकदमे को वापस नहीं ले सकती है, जिसमें अभियुक्तों को सजा सुनायी जा चुकी हो.

खास बातें:-

  • इसमें से एक मामले में योगेंद्र सजा काट चुके हैं , जबकि दूसरे मामले में जमानत पर हैं

  • नियमत: सरकार वैसे मुकदमों को वापस नहीं ले सकती, जिसमें सजा सुनायी जा चुकी हो

गृह विभाग के अवर सचिव धनेश कुमार ने पत्र लिख कर योगेंद्र साव के खिलाफ केरेडारी थाने में दर्ज कांड संख्या 55/10 और गिद्दी थाने में दर्ज कांड संख्या 55/11 को वापस लेने को लेकर डीसी से राय मांगी है. केरेडारी थाना में एनटीपीसी के तत्कालीन जीएम राघवेंद्र कुमार सिंह ने योगेंद्र साव व अन्य के खिलाफ मारपीट सहित अन्य आरोपों में प्राथमिकी दर्ज करायी थी. दूसरी प्राथमिकी रामगढ़ स्पंज आयरन फैक्ट्री के मैनेजर वीरेंद्र कुमार राय ने दर्ज करायी थी. इसमें योगेंद्र साव पर पांच लाख रुपये रंगदारी मांगने का आरोप लगाया गया था. पुलिस द्वारा दायर आरोप पत्र के आधार पर सक्षम न्यायालयों ने दोनों ही मामलों में योगेंद्र साव को सजा सुनायी है.

केस को वापस ले सकती है सरकार, पर फैसला सुनाने से पहले : सीआरपीसी की धारा 321 में राज्य सरकार को न्यायालय में चल रहे किसी मुकदमे को जनहित में वापस लेने का अधिकार है. राज्य सरकार इस अधिकार का इस्तेमाल किसी मामले में फैसला सुनाये जाने से पहले ही कर सकती है. यानी किसी मामले में सजा सुनाये जाने के बाद उसे वापस नहीं लिया जा सकता है.

इसके बाद भी गृह विभाग ने इसे लेकर हजारीबाग डीसी को पत्र भेजकर राय मांगी है. इससे पहले योगेंद्र साव के खिलाफ बड़कागांव थाने में दर्ज सात मामलों की वापसी के मामले में भी लोक अभियोजक से राय मांगी जा चुकी है. लोक अभियोजक ने भी इस पर असहमति जतायी है. फिलहाल सात मामलों को वापस करने का मामला सरकार के पास विचाराधीन है.

गिद्दी थाने में दर्ज मामले ( 55/11 ) ढाई साल की सजा : रामगढ़ स्पंज आयरन फैक्ट्री के मैनेजर वीरेंद्र कुमार राय ने 25 अगस्त 2011 को योगेंद्र साव व रणधीर गुप्ता के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी थी. इसमें योगेंद्र साव पर फैक्ट्री के मालिक से पांच लाख रुपये रंगदारी मांगने का आरोप लगाया गया था. फैक्ट्री महावीर प्रसाद रुंगटा की है. पुलिस ने जांच के बाद 31 अक्तूबर 2011 को आरोप पत्र दायर किया. इसमें रंगदारी मांगने की घटना की पुष्टि हुई थी. हजारीबाग स्थित एडीजे के न्यायालय में मामले की सुनवाई हुई.

29 जनवरी 2015 को न्यायालय ने फैसला सुनाया. न्यायालय ने दोनो अभियुक्तों को दोषी करार देते हुए ढाई-ढाई साल के कारावास की सजा सुनायी. रंगदारी के मामले में सजा के फैसले को योगेंद्र साव ने सुप्रीम कोर्ट तक अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने योगेंद्र साव की याचिका खारिज करते हुए निचली अदालत की सजा को बरकरार रखा और सरेंडर करने का आदेश दिया. इस आदेश के आलोक में योगेंद्र साव ने न्यायालय मे सरेंडर किया और ढाई साल की सजा पूरी कर ली.

केरेडारी थाने में दर्ज मामले में (55/10 ) एक साल की सजा : एनटीपीसी के जीएम राघवेंद्र कुमार सिंह ने 17 अगस्त 2010 को योगेंद्र साव व अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी थी. इसमें आरोप लगाया गया था कि एनटीपीसी कार्यालय के उदघाटन समारोह के दौरान तत्कालीन विधायक योगेंद्र साव अपने समर्थकों के साथ पहुंचे. विधायक ने समारोह में उन्हें नहीं आमंत्रित करने का आरोप लगाया. उनके समर्थकों ने हंगामा किया. इसी दौरान मैनेजर के साथ मारपीट हुई. पुलिस ने जांच के बाद 30 अप्रैल 2011 को आरोप पत्र दायर किया.

मामले की सुनवाई के बाद न्यायिक दंडाधिकारी आरती माला ने 23 मई 2015 को योगेंद्र साव को एक साल की सजा सुनायी. योगेंद्र साव ने निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ हाइकोर्ट में अपील दायर की. न्यायमूर्ति न्यायाधीश आर मुखोपाध्याय की अदालत ने सुनवाई के बाद योगेंद्र साव को जमानत देते हुए 10-10 हजार के दो मुचलकों पर रिहा करने का आदेश दिया. साथ ही इस मामले को छह महीने के बाद पेश करने का निर्देश दिया. यह मामला फिलहाल हाइकोर्ट में विचाराधीन है.

शकील अख्तर, रांची

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Posted by: Pritish Sahay

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